Fourt Phase voting in WB

Assembly Polls : पश्चिम बंगाल (WB) का जातीय समीकरण!

POLITICS आलेख
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अक्षत मित्तल
भारत में अभी चार राज्यों में विधान सभा चुनाव (Assembly Polls)चल रहे हैं। जिन राज्योंमें चुनाव चल रहे हैं, वे हैं; असम, तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल (WB)। इनमें से सबसे दिलचस्प चुनाव शायद पश्चिम बंगाल में ही हो रहे हैं।

पश्चिम बंगाल (WB) में 27 मार्च से 29 अप्रैल तक आठ चरणों में चुनाव होने हैं। सवाल यह है कि क्या सच में चुनाव लड़ने या जीतने के लिए सिर्फ लोकतान्त्रिक भावनाएं, विकास, नौकरी आदि जैसे मुद्दे पर्याप्त हैं? नहीं। इनके अलावा एक और मुद्दा ऐसा है, जो संभवतः ऊपर दिए गए मुद्दों से भी अधिक प्रभावशाली है और यह मुद्दा है जाति। भारत में जाति और राजनीति को पृथक नही किया जा सकता। बीतते समय के साथ भारत में जाति व्यवस्था और भी विकराल रूप धारण करती जा रही है और भारतीय राजनीति में जाति का प्रभाव कम होने की जगह बढ़ता ही चला जा रहा है। वर्ष 1995 में एक भारतीय राजनीतिज्ञ ने इस बढ़ती हुई जाति व्यवस्था पर टिप्पणी की थी कि “भारत में आप मत नहीं डालते, बल्कि अपनी जाति को चुनते हैं।”

इस बार का बंगाल चुनाव ममता बनर्जी (Mamta Banerjee) के राजनीतिक जीवन का सबसे मुश्किल और कठिन चुनाव है। ऐसे में बंगाल की लड़ाई अन्य तीन राज्यों से ज्यादा रोचक है। जब चुनाव इतना मुश्किल हो तो राजनीतिक पार्टियां जाति का सहारा लिये बिना चुनाव कैसे लड़ सकती हैं। अगर हम पश्चिम बंगाल का जातीय समीकरण देखें तो पाएंगे कि पश्चिम बंगाल में सबसे मुखर लड़ाई मुस्लिम वोट के लिए है, जिनका 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य की आबादी में 27 प्रतिशत का हिस्सा है। राज्य की आबादी में दूसरा सबसे बड़ा हिस्सा अनुसूचित जातियों का है। इनका हिस्सा राज्य की कुल आबादी में 23.51 प्रतिशत का है। यह वोट हमेशा से निर्णायक रहे हैं, लेकिन राज्य की वाम-प्रभुत्व वाली राजनीति ने इन्हें लंबे समय तक नजरअंदाज किया है। इन जातियों को सबसे पहले भाजपा ने एक गेम-चेंजर के रूप में देखा और अब टीएमसी भी डैमेज-कंट्रोल करने में जुट गई है।

पश्चिम बंगाल अपनी जनसंख्या के अनुपात में एससी आबादी के मामले में देश में तीसरे स्थान पर है। बंगाल के 60 मान्यता प्राप्त एससी समूह नौ से अधिक जिलों में 25 प्रतिशत से अधिक आबादी रखते हैं। इन नौ जिलों में 127 विधानसभा सीटें हैं। अन्य छह जिलों में जहां 78 विधानसभा सीटें हैं वहां भी एससी आबादी 15-25 प्रतिशत तक है। 2019 के लोकसभा चुनावों में 18 सीटें जीतने वाली भाजपा ने राज्य के कुल 68 एससी-आरक्षित विधानसभा क्षेत्रों में से 33 पर जीत दर्ज की थी। इनमें से 26 मतुआ बहुल हैं। टीएमसी ने 34 पर और लेफ्ट-कांग्रेस ने केवल तीन ही क्षेत्रों में बढ़त हासिल की थी। यह परिणाम 2016 के विधानसभा चुनावों से विपरीत भाजपा के पक्ष में थे। 2016 में टीएमसी ने इन आरक्षित सीटों में से 50 पर लेफ्ट ने 10 पर, कांग्रेस ने आठ पर और भाजपा ने शून्य सीटों पर जीत हासिल की थी।

राजबंशी समूह 18.4 प्रतिशत हिस्से के साथ बंगाल का सबसे बड़ा एससी समूह है। इसके बाद 17.4 प्रतिशत पर नामशूद्र समूह राज्य की एससी आबादी का दूसरा सबसे बड़ा हिस्सा रखता हैं। भाजपा (BJP) नामशूद्रों (मतुआ सबसे बड़ा समूह) को लुभाने में लगी है, जिसकी 42 सीटों पर जोरदार उपस्थिति है और लगभग 1.5 करोड़ मतदाता हैं। पीएम मोदी ने मतुआ समाज के आध्यात्मिक गुरु हरिचंद ठाकुर के जन्म स्थान पर एक मंदिर में बांग्लादेश की यात्रा के दौरान प्रार्थना की थी। मतुआ समाज मूल रूप से पूर्वी पाकिस्तान के हैं, जो बांग्लादेश के निर्माण के बाद भारत आ गए। हालांकि, इसमें से एक बड़ी संख्या को अभी नागरिकता नहीं मिली है। सीएए का वादा एक बड़ा कारण था कि 2019 में मतुआ समाज एनडीए (NDA) के साथ आ गया। हालांकि फिलहाल भाजपा सीएए के विषय पर राज्य में मौन है।

ममता सरकार ने भी अपनी ओर से नामशूद्रों के लिए विकास बोर्ड गठित किए हैं और 244 शरणार्थी कॉलोनियों को नियमित किया है। वर्तमान विधानसभा चुनावों में, टीएमसी ने कुल एससी-आरक्षित से 11 ज्यादा यानी 79 एससी उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है। इसके अलावा ममता सरकार ने उत्तर बंगाल में राजबंशियों के लिए नारायणी बटालियन का गठन किया है। साथ ही ममता सरकार ने कुर्मी, कामी और बगदी समुदायों के अलावा राजबंशी समुदाय के लिए भी एक अलग विकास बोर्ड का गठन किया है।सच है, आज राजनीति जाति से पृथक नहीं पनप सकती। जाति कई मामलों में इतनी ताकतवर है कि यह कई मुद्दों को प्रभावित कर देती है।

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