-आनंद सिंह
BJP भी अब कांग्रेस के रास्ते पर है। जिस प्रकार कांग्रेस में गुटबाजी होती रहती है, वैसे ही BJP में भी होने लगी है, खास बात यह कि यह सबसे ज्यादा बड़ी पार्टी और तथाकथित अनुशासन को मानने वाली पार्टी है।
अगर सब कुछ ठीक रहा तो उत्तर प्रदेश में मार्च या अप्रैल 2022 में चुनावी दुदुंभी बज सकती है। मई में सरकार का गठन होना है। संभावना यही है कि चुनाव आयोग समय से चुनाव करवा लेगा। इस बीच, जून माह जब खत्म हो रहा है तो प्रदेश में माननीय अब नजर आने लगे हैं। विधायक और सांसद का स्टिकर लगे वाहन शहरों में देखे जा रहे हैं। अप्रैल-मई में इन माननीयों का चेहरा बेचारे मतदाताओं को खोजने से भी नहीं दिख रहा था। टीवी चैनलों या अखबारों के पन्नों पर भी नहीं। शुक्र है कि अब ये दिख रहे हैं।
इस चुनाव को लेकर हर पार्टी अपनी नयी तैयारी में लग गई है। प्रायः परिदृश्य से गायब रहने वाली बहन मायावती खूब ट्वीट कर रही हैं। प्रेस कांफ्रेंस भी कर रही हैं। हैदराबाद वाले असउद्दीन ओवैसी भी मीडिया में छाये हुए हैं। ओम प्रकाश राजभर भी कहां पीछे रहने वाले थे। वह भी मीडिया में हैं। कहने का मतलब, सभी बड़े-छोटे नेता अब दिखने लगे हैं। अगर ये दिख रहे हैं तो समझ लें, चुनाव नजदीक ही है।
सबसे ज्यादा चर्चा जिस पार्टी की हो रही है, वह है समाजवादी पार्टी। भाजपा तो खैर सत्तारूढ़ पार्टी है। उसकी चर्चा भी आज कल खूब हो रही है पर ये चर्चा चुनाव किसके नेतृत्व में होगा, कौन सा धड़ा हल्का है, कौन सा भारी जैसे नकारात्मक चीजों को लेकर ही ज्यादा है। दरअसल, भाजपा भी अब कांग्रेस के रास्ते पर है। जिस प्रकार कांग्रेस में गुटबाजी होती रहती है, वैसे ही भाजपा में भी है। खास यह कि यह सबसे ज्यादा बड़ी पार्टी और तथाकथित अनुशासन को मानने वाली पार्टी है। अब इस पार्टी में कितने लोग अनुशासन में रहते हैं, कितने लोग अनुशासन को तोड़ते हैं, यह देखने वाली बात है। तो, सभी पार्टियां चुनाव में धीरे-धीरे उतर रही हैं। नेता-नेत्री दिखने लगे हैं। कोविड किस बिल में घुस गया, पता नहीं चल रहा है।
माना जा रहा है कि इस बार का चुनाव थोड़ा अलग होगा। अलग होने के कई कारण हैं। कोविड सबसे बड़ा कारण है, पर कोविड इस चुनाव में मुद्दा बनता है या नहीं, देखने वाली बात होगी। प्रदेश में कोविड के कारण हजारों लोगों की मौत हो गई। अस्पतालों में बदइंतजामियां देखी गयीं। ऑक्सीजन के लिए हाहाकार देखा गया। फिर, गंगा के किनारे शवों को गाड़ने वाला मामला भी अभी तक गर्म है।
दूसरा, यह चुनाव इसलिए भी अलग होगा, क्योंकि सरकार के मंत्री ही आपस में एक नहीं हैं। उनकी अपनी डफली और अपना राग है। कुछेक लोग मुख्यमंत्री से नाराज हैं तो मुख्यमंत्री भी कुछेक मंत्रियों-विधायकों से नाराज बताये जाते हैं। नाराजगी की बातें पब्लिक डोमेन में हैं और उसका असर चुनाव पर पड़ेगा, यह कहा जा सकता है।
“उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर के कई हिस्सों में विकास तो करवाया पर आज भी बारिश का पानी नहीं निकल पाता है। गोलघर पार्ट आफ द सिटी है। वहां भी जलजमाव की समस्या बदस्तूर है। अब तो तारामंडल के कई इलाकों में भी घंटों पानी जमा रहता है। सड़कों की हालत पहले से सुधरी है पर पुराने गोरखपुर की बात करें तो वहां की हालत खराब है। साफ-सफाई की व्यवस्था भी प्रायः खत्मप्राय है।”
तीसरा और अहम कारण है सपा द्वारा सरकार की किलेबंदी। अखिलेश ने ऐलान कर दिया है कि वह बड़े दलों या पार्टियों के साथ नहीं जाकर इस बार छोटे दलों के साथ गठबंधन करेंगे। अगर ऐसा हो जाता है तो चुनाव बेहद ही रोचक हो जाएंगे।
इस बार के चुनाव में कई नए खिलाड़ी भी भाग्य आजमाने के लिए आ रहे हैं। इसमें ओवैसी प्रमुख हैं। ओवैसी के साथ ही चंद्रशेखर रावण भी इस बार ताल ठोकने जा रहे हैं।
गौरतलब है कि अगर अपने वादे के अनुरूप ओवैसी 100 उम्मीदवार उतारते हैं तो जाहिर तौर पर मुसलमान वोट बंटेंगे। अगर मुसलमान वोट बंटेंगे तो सबसे बड़ा नुकसान अखिलेश को होगा क्योंकि आज भी यूपी में सपा को ही सबसे ज्यादा मुसलमान वोट मिलते हैं। अगर उसमें बंटवारा हो गया तो भाजपा की लाटरी खुल जाएगी, क्योंकि वोटों के ध्रुवीकरण में भाजपा का कोई जोड़ नहीं।
रावण भी चुनाव लड़ने के लिए मैदान में कूद रहे हैं। यह तो पता नहीं है कि वह कितनी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेंगे पर जितने भी उतारेंगे, दलित वोटों का बंटवारा ही करेंगे। अभी तक यह माना जाता है कि गैर जाटव हो या जाटव, सबसे ज्यादा दलित वोट मायावती को ही मिलते रहे हैं। अब अगर रावण उसमें अपनी भूमिका खोजते हैं तो बहन जी का नुकसान होना तय है। बेशक, दोनों को सीटों का नुकसान भी उठाना पड़ेगा।
यूपी में कांग्रेस भगवान भरोसे है। प्रियंका गांधी ने अवश्य ही कुछ इलाकों में मेहनत की है, पर वह ऊंट के मुंह में जारी है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का भविष्य क्या होगा, उस पर कोई भी कुछ भी साधिकार नहीं बोल सकता और न ही भविष्यवाणी कर सकता है, क्योंकि यह पार्टी फिलहाल सुषुप्तावस्था में है। जब यह जागृत होगी, जब कभी होगी, तब की तब देखी जाएगी।
सत्तारूढ़ भाजपा के पास चुनाव में जाने के लिए राम नाम सबसे बड़ा सहारा है। लेकिन, अगर राम नाम को छोड़ दें तो पार्टी के पास आपसी सिरफुटौव्वल एक ऐसा मसला है जो लखनऊ से लेकर दिल्ली तक को परेशान कर चुका है। शासन की योजनाओं की डिलीवरी को लेकर पब्लिक डोमेन में जो बातें हैं, वह अनायास ही नहीं है। पार्टी का संगठन बिखरा हुआ है। महीनों से बड़ी बैठकें नहीं हुई हैं। यह तो भला हो संघ का जो अपने अभियान में लगा हुआ है अन्यथा जिस तरह की चीजें बाजार में चल रही हैं, उन्हें देखने के बाद तो यकीन करना मुश्किल होता है कि यह सब भाजपा के साथ हो रहा है। भाजपा में जिस तरह से गुटबाजी चल रही है और जो हालात बन गए हैं उन्हें बयान करना मुश्किल है। अविश्वास कूट-कूटकर भरा हुआ है। प्रदेश अध्यक्ष कहते हैं कि योगी जी के चेहरे पर चुनाव लड़ेंगे और 300 सीटें जीतेंगे। उप मुख्यमंत्री कहते हैं कि चुनाव किसके चेहरे पर लड़ा जाएगा, यह केंद्रीय नेतृत्व तय करेगा। इस बीच एक धमाका राजनाथ सिंह करते हैं। उनका बयान था कि योगी जी ने प्रदेश को बहुत अच्छे से चलाया और 2022 का विधानसभा चुनाव योगी जी के चेहरे पर ही लड़ा जाएगा। योगी खेमा में इस बयान को लेकर जबरदस्त हलचल है कि राजनाथ सिंह ने यह बयान क्यों दिया, क्योंकि माना जाता है कि योगी-राजनाथ में कभी नहीं बनी।
कुल मिलाकर 2022 में जो चुनाव होना है, वह कई मायनों में भाजपा का भाजपा से ही चुनाव है। सपा, बसपा, रालोद और अन्य पार्टियां तो बाद में आएंगी। गुटबाजी के भयंकर मकड़जाल में फंसी प्रदेश भाजपा 2022 का रण तभी जीत सकेगी, जब भाजपा के भीतर, भाजपा को हराने वालों को चुनाव पूर्व ही हरा दिया जाए।