यह लेख धरती माता की बिगड़ती स्थिति और पर्यावरणीय संकट पर एक भावपूर्ण चिंतन है। इसमें जलवायु परिवर्तन, मानव स्वार्थ, और प्राकृतिक असंतुलन को रामायण और भारतीय पौराणिक आख्यानों के प्रतीकों के माध्यम से समझाया गया है। रावण, खर-दूषण, शूर्पणखा जैसे पात्रों को आधुनिक पूंजीवाद, प्रदूषण और खनन जैसी समस्याओं से जोड़ा गया है। राम को प्रकृति रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिन्होंने वनवास के दौरान प्रकृति के विरोधियों से युद्ध किया। लेख ज्ञान और विज्ञान के अंतर को दर्शाते हुए पूरब और पश्चिम की सोच का तुलनात्मक विश्लेषण करता है, और हमें चेताता है कि यदि अब भी हम नहीं जागे, तो धरती माता को कोई बचाने वाला नहीं आएगा।
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