आनंद सिंह
Corona ने भारतीयों की ज़िंदगी बदल कर रख दी है। सामान्य आचार व्यवहार से लेकर खान पान तक लोगों का बदल गया है। जो लोग कभी किसी भोज्य पदार्थ को वर्जित समझते थे, वे अब उस वर्जित पदार्थ को ग्रहण करने में संकोच नहीं कर रहे हैं। ये उन लोगों की कहानी है जो कभी कोरोना काल में बीमार पड़े थे। अब ठीक हो गए हैं पर कमजोरी के शिकार हैं। ये लोग ज्यादा मात्रा में वर्जित भोज्य पदार्थ ग्रहण कर रहे हैं।
गत सप्ताहांत अरसे बाद मटन लेने गोरखपुर के हंसुपुर गया। जिस परिचित की दुकान में गया, वहां पहले से ही 8 से 10 लोग खड़े थे। उनमें मटन लेने वाला सिर्फ मैं ही था। बाकी लोग क्यों थे वहां? बाकी लोग वहां कलेजी और बकरे की गोडी (खुर) लेने आये थे। हमने पूछा कि एकदम से खुर की डिमांड क्यों बढ़ गई? दुकानदार ने बताया कि जो लोग कोरोना से बच गए हैं, उनमें कमजोरी है। कई डॉक्टरों ने भी इन मरीजों को खुर का सूप पीने को कहा है। इससे कमजोरी तो दूर होती ही है, इम्यून सिस्टम भी मजबूत होता है।
गोरखपुर के हर बड़े मीट व्यवसायी का व्यवसाय जोरों पर है। सामान्य लोग भी मटन के साथ खुर ले रहे हैं ताकि खुर का जूस पीकर इम्यून सिस्टम को मजबूत किया जाए।
पूर्वांचल के प्रमुख शहरों में से एक गोरखपुर में मटन, मछ्ली, मुर्गा, अंडा आदि की खपत बहुत ही ज्यादा है। 2007 में एक बड़े अखबार ने एक सर्वे कराया था जिसमें यह तथ्य सामने आया था कि साग सब्जी से दोगुनी खपत गोरखपुर में नॉन वेज की है।
पूरे पूर्वांचल में हर बिरादरी के लोग नॉन वेज खूब चाव से खाते हैं। नॉन वेज में भी मटन लोगों की पसंद में नंबर-1 है।
मोटे तौर पर गोरखपुर जिले में प्रतिदिन नॉन वेज का व्यापार 4 करोड़ रुपये से ज्यादा का होता है। कोरोना काल में खपत तो बढ़ गई पर अनेक किस्म की पाबंदियां लगने के कारण पूर्ति बेहद कम है। चूंकि डिमांड ज्यादा और सप्लाई कम है, लिहाजा नॉन वेज (Non-veg) की कीमतें आसमान छू रही हैं। इसमें दुकानदार मनमानी भी कर रहे हैं। यहां मटन 650 रुपये से लेकर 900 रुपये प्रति किलो तक बिक रहा है।