सुप्रीम कोर्ट ने कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के लिए लोगों पर रोगाणुनाशक छिड़काव और अल्ट्रा वायलट किरणों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध करने के बारे में केंद्र सरकार को एक महीने के भीतर निर्देश जारी करने को कहा है।
न्यायमूर्ति अशोक भूषण, न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी और न्यायमूर्ति एम आर शाह की खंडपीठ ने गुरसिमरन सिंह नरुला की जनहित याचिका पर गुरुवार को अपने फैसले में कहा कि केंद्र सरकार एक महीने के भीतर इस बारे में निर्देश जारी करे।
शीर्ष अदालत ने रोगाणुओं से मुक्त करने के लिए बनाये जा रहे टनल के प्रयोग, लोगों पर रासायनिक छिड़काव एवं उसके उत्पादन पर तत्काल प्रतिबंध लगाने के लिए सरकार को निर्देश दिया। न्यायालय ने कहा कि लोगों पर कृत्रिम पराबैगनी किरणें डालने पर रोक के बारे में भी इसी तरह के निर्देश जारी किये जायें।
खंडपीठ ने अपने 37 पन्नों के फैसले में कहा कि हालांकि सरकार ने इस पर परामर्श जारी किया था, जिसमें कहा गया था कि कोविड-19 के रोगाणुओं से मुक्त करने के लिए मनुष्य पर अल्ट्रा वायलट किरणों के इस्तेमाल की सलाह नहीं दी जाती है, लेकिन इसके बाद इसकी रोकथाम के लिए आगे कोई कदम नहीं उठाये गये थे।
न्यायालय ने कहा कि जनता के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए जरूरी है कि यह कवायद एक महीने के भीतर पूरी की जाये। न्यायालय ने कहा, ‘‘हमारा विचार है कि मानव शरीर पर रोगाणुनाशक रसायन का छिड़काव या धुआं छोड़ना या परागामी किरणों के प्रयोग को नियंत्रित करने की जरूरत है, जब केन्द्र का स्वयं का मानना है कि इसके उपयोग की सलाह नहीं है।”
खंडपीठ ने कहा कि केन्द्र आपदा प्रबंधन कानून, 2005 के तहत प्रदत्त अधिकार का इस्तेमाल करके रोगाणुनाशक टनल से छिड़काव या रासायनिक धुआं छोड़ने को नियंत्रित या प्रतिबंधित करने के लिए आवश्यक निर्देश जारी करने पर विचार कर सकता है।
कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के दौरान सात सितंबर को केन्द्र से सवाल किया था कि कोविड-19 के दौरान रोगाणुओं से मुक्त करने वाले रसायन का लोगों पर छिड़काव हानिकारक होने के बावजूद उसने अभी तक रोगाणुओं से मुक्त करने वाले टनल के प्रयोग पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया है?