COVID-19 : अव्यवस्था से जूझता भारत

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अक्षत मित्तल

भारत में उन चीजों के लिए पर्याप्त पैसा है जिनपे खर्च थोड़े समय के लिए टाला जा सकता है। हाल ही में हुए घटनाक्रमों ने यह बात साफ़ कर दी। देश फिर से एक भयावह स्थिति में आ गया है। पिछले 12 दिनों में भारत में दैनिक कोविड पॉजिटिविटी दर दोगुनी होकर 16.69 प्रतिशत हो गई है, जबकि पिछले एक महीने में साप्ताहिक पॉजिटिविटी दर बढ़कर 13.54 प्रतिशत हो गई है। हर सकारात्मक दर सकारात्मक परिणामों की ही देन हो यह जरूरी नहीं।

COVID-19 के नए आए संक्रमण में 78.56 प्रतिशत सिर्फ दस राज्यों- महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, केरल, गुजरात, तमिलनाडु और राजस्थान में आए। सनद रहे कि पिछले 12 दिनों में जो दैनिक पॉजिटिविटी दर 16.69 प्रतिशत हो गई है वह उससे पिछले हफ्ते में मात्र आठ प्रतिशत थी। साथ ही पिछले एक महीने में राष्ट्रीय साप्ताहिक पॉजिटिविटी दर जो अब 13.54 प्रतिशत है, वह पहले केवल 3.05 प्रतिशत थी। उधर दूसरी तरफ नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार का कहना है कि देश को संक्रमण की दूसरी लहर के कारण उपभोक्ता के साथ-साथ निवेशकों की भावनाओं में भी “अधिक अनिश्चितता” के लिए तैयार होने की आवश्यकता है। अधिक अनिश्चितता, यह शब्द शायद किन्हीं और हालातों में भयानक लगता है, लेकिन ऐसे समय में सरकारों के पास हमें देने के लिए अनिश्चितता के अलावा कुछ नहीं।

इतनी तबाही कम थी कि ज्यादातर राज्यों में चिकित्सा ऑक्सीजन की भी कमी हो गई है। चुनाव में व्यस्त सरकार के पास संकट को नकार देने के अलावा क्या कोई रास्ता बचा है? दिल्ली में जब स्वास्थ्य मंत्री कह रहे थे कि अब हमारे पास महामारी से निपटने का पर्याप्त अनुभव है, तो लगा कि शायद स्थितियां सुधर जाएं पर ऐसा हुआ नहीं। आंकड़ों के अंदर और भयानक सच्चाई छुपी है। गत 18 अप्रैल को भारत में 2,73,810 नए कोविड मामले आए और 1600 से भी अधिक लोगों ने अपनी जान गंवा दी।

केस लोड के प्रतिशत के हिसाब से, मौतें पिछले साल की तुलना में अब भी कम हैं, लेकिन यह शायद ही उस देश के लिए एक सांत्वना है जो तेजी से प्रतिदिन 2,000 मौतों की ओर बढ़ रहा है। ऐसी भविष्यवाणियां हैं कि भारत की दैनिक मृत्यु संख्या बढ़कर 3,000 तक पहुंच सकती है। लेकिन संक्रमण दर में कमी आने के कोई भी संकेत नहीं हैं जिसके कारण मौत की संख्या में और भी ज्यादा वृद्धि होने का अनुमान है। वास्तव में, यह बीमारी पिछली बार की तुलना में तेज दर से फैल रही है। पॉजिटिविटी दर, जो आबादी में बीमारी के प्रसार को दर्शाती है वह भी अपने उच्च स्तर पर है और बढ़ती जा रही है।

फरवरी के मध्य में शुरू हुई दूसरी लहर के दौरान काफी कम मृत्यु दर सबसे बड़ी राहत थी। अब भी, जब दैनिक मृत्यु गणना रिकॉर्ड ऊंचाई पर है, मृत्यु दर पिछले साल की तुलना में बहुत कम है। हालांकि यह बहस का विषय है कि असल में कितनी मौतें हुईं और कितनी मौतें अधिकारिक आंकड़ों में दिखाई गईं।भारत में अब तक कोविड के 26.6 करोड़ से अधिक टेस्ट किए जा चुके हैं। इनमें से, 1.47 करोड़ से अधिक टेस्ट परिणाम (लगभग 5.5 प्रतिशत) सकारात्मक रहे हैं। लेकिन पिछले एक सप्ताह में यह बढ़कर 13.5 प्रतिशत हो गया है। पॉजिटिविटी दर की औसत इससे पहले कभी इतनी अधिक नहीं रही।

केस लोड के अनुपात में मृत्यु दर जो 16 जून 2020 को 5.73 प्रतिशत थी, वह अब आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 17 अप्रैल 2021 को 1.42 प्रतिशत है। हालांकि आधिकारिक आंकड़ों कि प्रमाणिकता पर सवाल और तेजी से संक्रमण का प्रसार बढ़ना सभी तरीके के आशावाद को भस्म कर देता है। ऐसे में सवाल कई सारे उठते हैं। कोविड की पहली लहर के वक्त स्वास्थ्य क्षमताओं की कमी सबसे बड़ी चुनौती थी। अप्रैल 2020 में 15,000 करोड़ का पैकेज आया। दावे हुए कि बहुत तेजी से विराट हेल्थ ढांचा बना लिया गया है तो फिर वह सब अब कहां गया? इसके अलावा अप्रैल से अक्तूबर तक ऑक्सीजन वाले बि‍स्तरों की संख्या 58,000 से बढ़ाकर 2.65 लाख करने और आइसीयू और वेंटीलेटर बेड की संख्या तीन गुना करने का दावा हुआ था। उस दावे का क्या हुआ?

इसके अलावा स्वास्थ्यकर्मियों की कमी को क्यों ध्यान में नहीं रखा गया? दुनिया की वैक्सीन फार्मेसी में किल्लत हो गई क्योंकि अन्य देशों की सरकारों ने जरूरतों का आकलन कर दवा, वैक्सीन की क्षमताएं देश के लिए सुरक्षित कर लीं। कंपनियों से अनुबंध कर लिए। हमने ऐसा क्यों नहीं किया? सबसे बड़ा सवाल, साल बर्बाद होने के बाद भी आज हम कहां खड़े हैं?

 

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