Economic liberalisation भारतीय आर्थिक क्रांति का युग

फीचर राष्ट्रीय
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अक्षत मित्तल

“Economic Liberalisation का युग आजादी के कई दशक बाद भारत में शुरू हुआ और वही वह दौर था, जब देश में आर्थिक क्रांति शुरू हुई।”

भारत को आजादी 1947 में मिल गई थी, लेकिन उसके काफी सालों बाद तक भारत में मुक्त अर्थव्यवस्था की बात करने वालों की आवाज को गंभीरता से नही लिया गया। हालांकि मुक्त अर्थव्यवस्था के कुछ पक्षधर उस वक्त भी मौजूद थे। साल 1954 में बंबई के एक अर्थशास्त्री ए.डी. श्रॉफ ने “फ्री इंटरप्राइजेज” नाम के एक मंच की स्थापना की। आर्थिक विकास को लेकर इस संस्था के विचार उस जमाने में भारत सरकार के योजना आयोग के विचारों से बिल्कुल उलट थे। यह संस्था मुक्त उद्यमों के पक्ष में थी। इस संस्था ने भारत सरकार की उद्यमियों के प्रति भेदभाव भरी नीति की आलोचना की।

श्रॉफ के अलावा पत्रकार फिलिप स्प्रैट भी मुक्त उद्यमों के पक्ष में लेख लिखते आ रहे थे। एक सत्य यह भी है कि नेहरु के वक्त देश ने शिक्षा, विज्ञान और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में भरसक कामयाबी हासिल की थी। जब साल 1966 में रुपये का अवमूल्यन किया गया तो ऐसा लगा कि सरकार व्यापारिक नियमों में ढील देने की तरफ बढ़ेगी और लाइसेंस देने की प्रक्रिया में भी कुछ उदारता अपनाई जाएगी, लेकिन जब 1969 में कांग्रेस में विभाजन हुआ तो इंदिरा गांधी सरकार ने वाम झुकाव का प्रदर्शन करते हुए नए उद्योगों का राष्ट्रीयकरण कर दिया और आर्थिक तानाशाही की तरफ बढ़ गईं। फिर 1970 के दशक के आखिर में जनता सरकार ने आईबीएम और कोकाकोला जैसी विदेशी कंपनियों को धमाकेदार तरीके से भारत से निकाल बाहर कर दिया।

अस्सी के दशक में भारत सरकार ने मुक्त अर्थव्यवस्था के प्रति जरूर अपना विरोध भाव कुछ कम किया, लेकिन भारतीय राजतंत्र उस दिशा में आगे तभी बढ़ पाया जब एक आर्थिक संकट देश के सामने आ खड़ा हुआ। यह संकट विदेशी कर्ज से संबंधित था। 1991 की गर्मियों में देश का कर्ज 70 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया, जिसमें करीब 30 फीसदी हिस्सा निजी कर्जदाताओं का था। एक ऐसा भी वक्त आया जब देश का विदेशी मुद्रा भंडार महज इतना ही रह गया, जिससे सिर्फ दो सप्ताह तक के लिए आयात किया जा सके। यह तो थी संकट की कहानी, लेकिन जून महीने की भीषण गर्मी में एक कहानी राजधानी दिल्ली में भी लिखी जा रही थी।

आज से तीस साल पहले, कांग्रेस संसदीय दल ने सर्वसम्मति से पीवी नरसिम्हा राव को अपना प्रधानमंत्री नामित किया। सेंट्रल हॉल में हुई बैठक के बाद राव, अर्जुन सिंह के साथ सरकार बनाने का दावा पेश करने के लिए सीधे राष्ट्रपति भवन गए। 20 जून 1991 एक ऐतिहासिक दिन था। इसी दिन नामित प्रधानमंत्री राव ने एक विवादास्पद आईएमएफ ऋण स्वीकार कर लिया और इस प्रकार देश के आर्थिक उदारीकरण का मार्ग प्रशस्त हुआ। असल में यह ऐतिहासिक घटना बेहद नाटकीय माहौल में घटी। राष्ट्रपति का सरकार बनाने के लिए निमंत्रण मिलने के बाद राव के तीन मूर्ति लेन आवास पर कांग्रेस नेता और मंत्री पद के उम्मीदवार बड़ी संख्या में एकत्र होने लगे। मनोनीत प्रधानमंत्री सबसे पहले 10 जनपथ जाकर सोनिया गांधी से मिले।

वहां से लौटते वक्त राव को कैबिनेट सचिव नरेश चंद्रा का संदेश मिला। उन्होंने तत्काल मिलने का वक्त मांगा। यह साधारण ब्रीफिंग का मामला नहीं था। बैठक में वित्त सचिव और फाइलों के साथ वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे। वित्त सचिव की प्रस्तुति लगभग 90 मिनट तक चली, और पार्टी के सभी नेता राव की वापसी के लिए उत्सुकता से तीन मूर्ति लेन पर प्रतीक्षा करते रहे। यह महत्वपूर्ण 90 मिनटों ने 1991 में भारत के आर्थिक उदारवाद का मार्ग प्रशस्त किया। राव को विदेशी मुद्रा भंडार के संकट की जानकारी दी गई। जिसने वित्त मंत्रालय को एसबीआई की तिजोरियों में पड़े 47 टन सोने को गिरवी रखने के लिए मजबूर किया। रेटिंग एजेंसियों ने भी भारत को ‘खतरनाक’ स्तर पर डाउनग्रेड कर दिया था। विदेशी ऋण जीडीपी का लगभग 22 प्रतिशत और आंतरिक सार्वजनिक ऋण जीडीपी के 56 प्रतिशत तक हो चुका था।

अधिकारियों ने खुलासा किया कि उन्होंने वाशिंगटन में आईएमएफ के साथ 20 महीने की अवधि के लिए 2.3 मिलियन डॉलर के अतिरिक्त ऋण के लिए प्रारंभिक बातचीत शुरू कर दी है। इसके लिए आईएमएफ ने कुछ लिखित और अलिखित शर्तें रखी हैं। कैबिनेट सचिव बोले कि अब राजनीतिक नेतृत्व को यह तय करना है कि वार्ता को आगे बढ़ाया जाए या नहीं। राव ने कुछ स्पष्टीकरण मांगे और उन्होंने कैबिनेट सचिव को बातचीत आगे बढ़ाने का निर्देश दिया। इसके बाद राव ने नरेश चंद्रा के साथ 10 मिनट की अलग से मुलाकात की। सनद रहे कि राव ने इस वक्त तक पीएम पद की शपथ नहीं ली थी।

इसके बाद राव तीन मूर्ति लेन पर वापस पहुंचे और प्रतीक्षारत शुभचिंतकों से मिले। बाद में राव ने अर्जुन सिंह, प्रणब मुखर्जी और एमएल फोतेदार जैसे वरिष्ठ नेताओं के साथ विचार-विमर्श किया। इस वक्त तक उनमें से किसी को भी आईएमएफ ऋण के स्वीकृत होने की जानकारी नहीं थी। जब यह राजनीतिक चर्चा चल रही थी, उस समय पीसी अलेक्जेंडर ने आईजी पटेल से संपर्क किया और पूछा कि क्या वह वित्त मंत्री के रूप में पदभार संभाल सकते हैं। बीमार और कमजोर पटेल ने कहा कि वह ऐसा करने की स्थिति में नहीं हैं। इसके बाद अलेक्जेंडर ने मनमोहन सिंह को फोन मिलाया, जिन्होंने इस प्रस्ताव को गंभीरता से नहीं लिया। उन्होंने इसे तभी स्वीकार किया जब राव ने खुद व्यक्तिगत अनुरोध किया।

राव ने मनमोहन सिंह को खुली छूट दे दी। अशोका हॉल में शपथ लेने के तुरंत बाद मनमोहन सिंह ने पीएम को एक हस्तलिखित नोट दिया। इसमें पहला सुझाव यह था कि सुधार संबंधी मामलों को कैबिनेट की बैठकों में न रखा जाए, जहां सहयोगी निश्चित रूप से इसे रोकेंगे। इस नोट में आईएमएफ की शर्तों को पूरा करने के लिए चरण-दर-चरण उपाय शामिल थे। योजना के अनुसार, उस वर्ष 30 जून को रुपये के 9 प्रतिशत और 2 जुलाई को 11.83 प्रतिशत के अवमूल्यन की घोषणा की गई। अगले दिन, वाणिज्य मंत्री पी चिदंबरम ने नई व्यापार नीति की घोषणा की। जिसमें कोटा प्रणाली को खत्म कर दिया गया, निर्यात पर प्रतिबंध हटाया गया और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का स्वागत किया गया।

इसके अलावा घरेलू बाजार को भी मुक्त किया गया, लाइसेंस-परमिट-कोटा राज को बहुत हद तक ख़त्म कर दिया गया और सार्वजनिक क्षेत्र के विस्तार को हतोत्साहित किया गया। कुल मिलाकर आर्थिक सुधारों ने सरकारी तंत्र के भीमकाय आकार को सीमित करने का प्रयास किया। तमाम क्षेत्र जिन पर पहले राज्य का पूर्ण नियंत्रण होता था उन्हें निजी निवेश के लिए खोल दिया गया। इसमें आईएमएफ के निर्देशों के अनुसार व्यापार उदारीकरण उपायों की एक पूरी श्रृंखला शामिल थी। अपने पहले सुधार बजट में, मनमोहन सिंह ने पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की कीमतों में 26 प्रतिशत की भारी वृद्धि की, कुल 2,617 करोड़ रुपये के नए कर लगाए गए और काले धन की माफी योजना की घोषणा की गई।

इन फैसलों का जमकर राजनीतिक विरोध हुआ। अधिकांश कांग्रेसी नेताओं को भी यह रास नहीं आ रहा था। रंगराजन कुमारमंगलम और हरीश रावत ने चेतावनी दी कि इसके बाद कांग्रेस अगला चुनाव हार जाएगी। तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी और एक प्रभावशाली वर्ग ने दावा किया कि आईएमएफ की शर्तों ने भारत की संप्रभुता को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया है। 26 जून को राव ने अलग से वीपी सिंह, लालकृष्ण आडवाणी, हरकिशन सिंह सुरजीत और चंद्रशेखर को भारत द्वारा आईएमएफ की शर्तों को स्वीकार करने के बारे में जानकारी दी। अगले दिन, प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री ने विपक्षी नेताओं को आईएमएफ ऋण लेने की अनिवार्यता को समझाया। आडवाणी, जॉर्ज फर्नांडीस, मधु दंडवते, सुरजीत और यशवंत सिन्हा ने कहा कि वे सब्सिडी में कटौती जैसी शर्तों के खिलाफ हैं। 4 जुलाई 1992 को, आईएमएफ प्रमुख मिशेल कैमडेसस ने शर्तों के कार्यान्वयन पर संतोष व्यक्त किया।

अस्सी के दशक में अपनाई गईं व्यापार समर्थक आर्थिक नीति ने विकास दर में तेजी लाई और नब्बे के दशक में बाजार समर्थक नीतियों ने इसे और भी बढ़ावा दिया। भारतीय अर्थव्यवस्था के अच्छे प्रदर्शन को हम इससे समझ सकते हैं कि 1972 से 1982 के बीच जो जीडीपी विकास दर 3.5 फीसदी थी वह 1982 से 1992 के बीच 5.2 फीसदी और 1992 से 2002 के बीच बढ़कर 6.0 फीसदी तक चली गई। स्वाभाविक रूप से विकास की प्रक्रिया असमान थी। अर्थव्यवस्था के कुछ नए क्षेत्र दूसरे क्षेत्रों से बेहतर प्रदर्शन कर रहे थे।

सबसे महत्वपूर्ण विकास सेवा क्षेत्र का हुआ जिसमें पूरे नब्बे के दशक में 8.1 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इसमें सबसे ज्यादा योगदान सॉफ्टवेयर क्षेत्र का रहा जिसका राजस्व 1990 में महज 19 करोड़ 70 लाख डॉलर से 2000 तक जाते-जाते 8 अरब डॉलर तक पहुंच गया। कई साल तो ऐसे बीते जिसमें इसने पचास फीसदी से भी ज्यादा की दर से तरक्की की। इसका सबसे ज्यादा विस्तार विदेशी बाजारों में हुआ। जहां 1990 में भारतीय सॉफ्टवेयर उद्योग का निर्यात महज 10 करोड़ डॉलर था, वहीं सदी के अंत तक यह आंकड़ा 6 अरब 30 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया। साल 2000 में भारत में 3,40,000 सॉफ्टवेयर पेशेवर थे, जबकि प्रतिवर्ष 50,000 नए इंजीनियरिंग स्नातकों की नियुक्ति की जा रही थी। यह क्षेत्र का सबसे बड़ा गढ़ भारत का सिलिकॉन वैली कहा जाने वाला शहर बेंगलुरु है। एक समय पर पूरे बेंगलुरु शहर में सिलिकॉन वैली से भी ज्यादा इंजीनियर कार्यरत थे।

इस क्षेत्र के अलावा भी कई क्षेत्रों, जैसे मेडिकल, संचार, बीमा, विमानन- ने आर्थिक सुधारों के बाद से काफी तरक्की की है। एक और क्षेत्र जिसने दर्ज करने योग्य तरक्की की है, वह है कॉल सेंटर जिसने 2000 के दशक में एक वक्त पर 71 फीसदी सालाना की आश्चर्यजनक दर से तरक्की की। भारत में आर्थिक तरक्की का यह सफर बदस्तूर जारी रहा। उस संकट की घड़ी में डॉ सिंह द्वारा पेश किये गए बजट को “द एपोखल बजट” कहा जाता है “एपोखल” का मतलब होता है “महत्वपूर्ण”। यह बजट महत्वपूर्ण के साथ-साथ भारतीय अर्थव्यवस्था में क्रांति लाने वाला भी था।

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