Economy: आर्थिक मोर्चों को भी संभालने की जरूरत!

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अक्षत मित्तल
अन्य देशों की तरह भारत में भी कोविड (COVID) की दूसरी लहर ज्यादा तबाही करने वाली साबित हुई है, लेकिन, चीन जैसे देश जहां वायरस पर जल्दी काबू पा लिया गया, या अमेरिका और यूके, जहां कोविड द्वारा भयानक तबाही मचाने के बावजूद अपने लोगों की आजीविका की रक्षा करने के लिए वित्तीय संसाधन थे, उनकी तुलना में भारत आज एक अति-गंभीर स्थिति में खड़ा हो गया है। COVID मामलों में इतनी बड़ी उछाल ने पिछले एक साल में सरकार की तैयारी की कमी को सकल और अपर्याप्त साबित कर दिया है।

गिरती अर्थव्यवस्था (Economy) का मतलब है कि लाखों लोग न केवल अपने सभी मौजूदा आय, बल्कि अपनी आय अर्जित करने के साधन भी खो देंगे। भारत की अर्थव्यवस्था महामारी से पहले ही नीचे जा रही थी जिसकी वजह से लोगों के पास लंबे समय तक लड़ने के लिए बचत नहीं है। पिछले महीने, अमेरिका स्थित प्यू रिसर्च सेंटर ने इस संबंध में कुछ सटीक आंकड़े दिये। महामारी से पहले, यह अनुमान लगाया गया था कि भारत में 9.9 करोड़ लोग 2020 में वैश्विक मध्यम वर्ग के होंगे। महामारी के एक वर्ष बाद, यह संख्या 6.6 करोड़ होने का अनुमान है। प्यू रिसर्च रिपोर्ट में आगे कहा गया कि भारत में गरीबों की संख्या 13.4 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है, मंदी से पहले के 5.9 करोड़ के अनुमान से यह दोगुना से भी अधिक है।

तथ्य यह भी है कि 7.5 करोड़ लोग भयंकर गरीबी में धकेल दिए जाएंगे (प्रति दिन 2 डॉलर से कम रहने पर), साथ ही भारत का मध्य वर्ग एक तिहाई से कम हो जाएगा- और यह केवल पिछले वर्ष का प्रभाव है। सवाल यह भी उठता है कि आखिर मध्य वर्ग की परिभाषा क्या है? यह परिभाषा इतनी सूक्ष्म नहीं हो सकती कि जो ना गरीब है और ना अमीर वो मध्य वर्ग है। इसे आंकड़ों में परिभाषित करते हैं, 2 डॉलर या उससे कम प्रति दिन कमाने वालों को गरीब कहते हैं, 2.01 से लेकर 10 डॉलर तक कम आय वाले, 10.01 से 20 डॉलर पर मध्यम आय, 20.01 डॉलर – 50 डॉलर पर ऊपरी-मध्य आय और 50 डॉलर से अधिक पर उच्च आय वाले। लेकिन मध्यम वर्ग को उन लोगों के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जिनका खर्च औसत व्यय के 75 प्रतिशत से 125 प्रतिशत के बीच है।

इन विपरीत हालातों में इस मध्य वर्ग को संभालना सबसे जरूरी है। मध्य वर्ग सबसे बड़ा वर्ग है जो देश की अर्थव्यस्था को प्रभावित करता है। भारत में वर्षों से इस वर्ग की उपेक्षा की जाती रही है। 2017 के बाद के आंकड़े बताते हैं कि यह मध्य वर्ग भविष्य की अनिश्चितता से घिर गया है जिसके कारण अब यह व्यय से ज्यादा बचत पर ध्यान देने लगा है। एक उभरती अर्थव्यवस्था के लिए यह अच्छे संकेत नहीं हैं। सनद रहे कि यह मध्य वर्ग ही है जो बेझिझक सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक विषयों पर बोलता है जो सत्ता के दंभ में चूर सरकारों पर अंकुश लगाने का काम करता है।

मैक्स रोजर (Max Rozar) द्वारा जारी आंकड़े प्रत्येक देश में उस जनसंख्या का प्रतिशत दर्शाते हैं जो प्रति दिन डॉलर 30 से कम पर रहते हैं (लगभग 66,000 रुपये प्रति माह की आय)। भारत में, कुल जनसंख्या का 99.5 प्रतिशत इस संख्या से नीचे रहते हैं। यदि आप उस राशि से अधिक कमाते हैं, तो आप दैनिक आय के मामले में भारत में शीर्ष 0.5 प्रतिशत में शामिल हैं। सवाल यह है कि मध्य वर्ग के हालात कैसे सुधारे जा सकते हैं। एशियन डेवलपमेंट बैंक (ADB) द्वारा जारी रिसर्च पेपर के अनुसार मध्यम वर्ग के कल्याण में कारक और उनके विकास का पोषण करने वाली नीतियां केवल गरीबों पर केंद्रित नीतियों की तुलना में गरीबी को कम करने के लिए एक अधिक प्रभावी दीर्घकालिक रणनीति हो सकती हैं। ADB के पेपर में आगे कहा गया कि एक राजनीतिक और आर्थिक रूप से मजबूत मध्यम वर्ग सरकार को अधिक जवाबदेह होने पर मजबूर कर देता है, जिससे कानून का शासन, संपत्ति के अधिकारों की सुरक्षा और निरंतर आर्थिक सुधार सुनिश्चित हो जाते हैं।
विशेष तौर पर भारतीय मध्यम वर्ग के लिए करों को कम करना और लाभ मैट्रिक्स का पुन: निर्धारण करना होगा। ऐसा करने में सरकार को कर प्रणाली को और अधिक प्रगतिशील बनाने और अमीरों से उच्च कर की मांग करने की आवश्यकता होगी। इसी तरह, सरकार को मध्यम वर्ग के लिए आवास की लागत को कम करने के लिए कदम उठाने चाहिए। उदाहरण के लिए, आवास को सस्ता बनाना होगा। सबसे ज्यादा जोर नौकरियों की कमी और श्रम शक्ति की भागीदारी दर में कमी को सही करने पर होना चाहिए।

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