गुंजन मिश्रा
Green Gold: विकास के नाम पर अभी तक हमने अपनी जो स्थायी पूँजी या समृद्धि थी,उसको सतही या कृत्रिम सुख पाने के लिए बेचने व नष्ट करने का काम किया है। सोने की चिड़िया देश को इसलिए कहा जाता था क्योंकि देश में मिट्टी, पानी, हवा यानी जंगल जीवंत हुआ करते थे। हमारे पूर्वज इनको ही स्थायी संपत्ति मानते थे, न कि कागज़ के छोटे व बड़े टुकड़ों को। इस बात के कई उदाहरण मौजूद हैं कि प्रकृति की रक्षा के लिए लोगें ने क्या-क्या नहीं किया। जैसे उत्तराखंड के चमोली जिले में एक गावं द्रोणागिरि है। इस गांव के लोग सदियों या सहस्राब्दियों से पर्वत की देवता की तरह पूजा करते आये हैं । इस पर्वत देवता को द्रोणागिरि पर्वत के नाम से जाना जाता है । माना जाता है कि द्रोणागिरि वही पर्वत है जहां से हनुमानजी संजीवनी बूटी लाये थे । गांव वालों का मानना है, कि संजीवनी के साथ हनुमानजी जो पर्वत उखाड़ कर ले गए वह वास्तव में उनके पर्वत देवता की एक भुजा थी । गांव के लोगों ने इस काम के लिए कभी हनुमानजी को माफ नहीं किया और आज तक उनसे नाराज हैं। यानी हनुमान जी की पूजा इस गांव में नहीं होती है। इसके अलावा उत्तराखंड का ही चिपको आंदोलन एवं राजस्थान के विश्नोई समाज के कार्य आदि कई मुद्दे जो पर्यावरण संरक्षण से जुड़े है, हमारे सामने है।
आज अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी का एक कारण यह भी है कि अस्पतालों की परिधि में पेड़ पौधे मरीज़ों की संख्या से हिसाब से न के बराबर है। एक मानव एक वर्ष में लगभग 9.5 टन हवा में सांस लेता है, लेकिन ऑक्सीजन केवल द्रव्यमान से उस वायु का लगभग 23 प्रतिशत होता है, और हम प्रत्येक सांस से ऑक्सीजन का एक तिहाई से थोड़ा अधिक ही निकालते हैं। अतः यह प्रति वर्ष कुल 740 किलोग्राम ऑक्सीजन होती है । इतनी ऑक्सीजन मोटे तौर पर सात या आठ पेड़ों से प्राप्त हो सकती है। इससे हम अनुमान लगा सकते हैं कि किस जगह कितने पेड़ पोधों की जरूरत होगी। अस्पतालों में ऑक्सीजन की आवश्यकता इसलिए भी अधिक होती है क्योंकि वाणिज्यिक स्थानों व कार्यालयों की तुलना में अस्पताल में अधिक बार वायु परिवर्तन की आवश्यकता होती है। कारण अस्पतालों में सफाई के लिए बहुत ज्यादा रासायनिकों का इस्तेमाल होता है।
अस्पतालों में पेड़ पौधों का होना इसीलिए भी जरूरी है, क्योंकि पेड़ पौधों से फाइटोनासाइड्स रोगाणुरोधी एलेलोकेमिक वाष्पशील कार्बनिक यौगिक निकलते हैं। फाइटोनसाइड्स में एंटीबैक्टीरियल और एंटीफंगल गुण होते हैं। जब लोग इन रसायनों में सांस लेते हैं, तो हमारे शरीर एक प्रकार की श्वेत रक्त कोशिका की संख्या और गतिविधि को बढ़ाकर प्रतिक्रिया करते हैं जिसे प्राकृतिक कोशिका हत्यारा या एनके कहा जाता है। ये कोशिकाएं हमारे शरीर में ट्यूमर और वायरस से संक्रमित कोशिकाओं को मार देती हैं। एनके सेल गतिविधि बढ़ने के कारण प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया भी मजबूत होती है। पेड़ पौधों द्वारा हज़ारों तरह के दिखाई न देने वाले फाइटोनसाइड्स निकलते हैं, यह तक की सब्जियों के पौधों से भी ये कार्बनिक यौगिकों का उत्सर्जन होता है। ये तनाव, तंत्रिका तंत्र, अवसादरोधी, नींद, रक्त शर्करा आदि में भी फायदा पहुंचते हैं। वैसे भी भारत में हर एलोपैथिक डॉक्टर कम से कम 1,511 लोगों की सेवा करता है, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के हर 1,000 लोगों पर एक डॉक्टर के मानदंड से बहुत अधिक है। प्रशिक्षित नर्सों की कमी और भी विकट है, जिसमें नर्स-से-जनसंख्या अनुपात 1:670 है, जो डब्ल्यूएचओ के 1:300 के मानदंड के विपरीत है। मानव विकास रिपोर्ट 2020 से पता चला है कि अस्पतालों में बेड की उपलब्धता के हिसाब से 167 देशों में से भारत का स्थान 155 पर है। यानी पांच बेड 10 हजार लोगों पर। इससे देश के नीति निर्माताओं के बारे में पता चलता है कि किस तरह उन्होंने देश को विकास के पथ पर ले जाने का खांका खींच रखा था। यही कारण है कि आज देश में सिर्फ 28 पेड़ प्रति व्यक्ति है,जबकि चीन में 102, ब्राज़ील में 1,494, कनाडा में 8,953, अमेरिका में 716 एवं ऑस्ट्रेलिया में 3,266 पेड़ प्रति व्यक्ति है,यानी देश को विकास के पथ पर ले जाने वाले लोगों ने विकसित देशों की नक़ल भी सही तरह से नहीं कर पायी। विकास के लिए निर्धारित नीतियों का ही परिणाम है कि आज हम ऑक्सीजन के लिए परेशान है। जिस देश की राजधानी में प्रति व्यक्ति एक पेड़ भी न हो, जो दुनिया के सबसे अधिक वायु प्रदूषित शहरों में एक हो,जिस शहर के बच्चे भी अस्थमा से पीड़ित हो वहाँ पर नई इमारतों के लिए हज़ारो पेड़ों की बलि दी जा रही हो, इससे बढ़िया विकास का मॉडल मैंने नहीं देखा। अब तो डॉक्टर्स भी मरीज़ो को के लिए फॉरेस्ट बाथिंग की सलाह देते है। अभी सांसों के लिए ऑक्सीजन के लिए परेशान है, कल पानी के लिए और यही हाल रहा तो भविष्य में अनाज के लिए मारामारी होगी। अतः जिस तरह वर्षा जल संरक्षण के लिए नियम बनाये गए, उसी को ध्यान में रखते हुए अस्पतालों में 33 प्रतिशत से ज्यादा जगह पेड़-पौधों के लिए निर्धारित की जाये, क्योंकि देश में ग्रीन बिल्डिंग कानून के तहत किस तरह ग्रीन हॉस्पिटल बनाये जाते है, एवं किस तरह आईएसओ सर्टिफिकेट लिये जाते हैं, ये सबको मालूम है।
आज जिस अदृश्य व बहुरूपिये वायरस के कारण कोरोना मरीज़ों के शरीर में ऑक्सीजन की कमी के कारण जो मौतें हो रही हैं, उनको लेकर न्यायालयों का सरकारों के लिए शुतुरमुर्ग, नरसंहार जैसे शब्दों का प्रयोग उचित है या अनुचित यह नीति निर्माताओं के विचार करने का प्रश्न है। आज पूरी दुनिया में जब मानवता की रक्षा के लिए इकोसाइड जैसे कानूनों की मांग होने लगी है, तब नदियों के गठजोड़, सड़कों, बांधों, खदानों आदि के नाम पर लाखों हेक्टेअर जंगलों को नष्ट करते जा रहे हैं। आज जरूरत है, ईकोसाइड का आकलन करने की एवं प्राकृतिक संसाधनों के साथ स्थाई विकास के राह पर चलने की। यानी बड़ी बड़ी परियोजनाओं में पैसा न लगाकर छोटी छोटी विकास की वो योजनाए लागू हो जिनसे प्रकृति का सहअस्तिव्त का सिंद्धांत न वाधित हो, तभी मानव सुखपूर्वक इस धरती पर जीवनयापन कर सकेगा।
(लेखक पर्यावरणविद् हैं।)