अक्षत मित्तल
Gandhi : आज 2 अक्टूबर है, गांधी जयंती। आज फिर कहीं मालाएं चढ़ाई गई होंगी, फिर कहीं झाड़ू चलाई गई होगी, फिर कहीं बापू का जयकारा लगाया गया होगा और फिर कहीं बापू के नाम पर राजनीति की गई होगी। शायद यह बहस महत्वपूर्ण नहीं! महत्वपूर्ण यह है कि आज से 152 वर्ष पूर्व 2 अक्टूबर को ही देश में उस उर्जा ने जन्म लिया था जो भारत को युगों-युगों तक रोशनी प्रदान करती रहेगी। आज गांधी जयंती के अवसर पर बापू के संघर्षो को संक्षिप्त में समझते हैं।
2 अक्टूबर 1869 को पोरबंदर में जन्में मोहनदास करमचंद गांधी जब राजकोट और लंडन से शिक्षा पूर्ण करने के बाद मई 1893 में दक्षिण अफ्रीका पहुंचे तब उन्होंने भारतीयों के साथ हो रहे अत्याचार को देखा। यहीं पर विश्व प्रसिद्ध “सत्याग्रह” के विचार का जन्म हुआ। भारतीयों को हक दिलाने का यह आंदोलन सितंबर 1906 से चालू हुआ। 8 सालों के कड़े आंदोलन और गांधी की लंबी गिरफ्तारियों से आखिरकार दक्षिण अफ्रीकी सरकार और अफ्रीका के प्रमुख राजनीतिज्ञ और प्रधानमंत्री रहे जेन स्मट्स को झुकना ही पड़ा। जनवरी 1914 में आए “इंडियन रिलीफ बिल” ने सभी शरीयत और हिन्दू विवाहों को वैध मान लिया, भारतीयों पर लगने वाले तीन पाउंड के दंडात्मक कर को भी समाप्त कर दिया गया।
अफ्रीकी प्रधानमंत्री रहे जेन स्मट्स के मन में गांधी का खौफ इतना घर कर गया था कि जब 18 जुलाई 1914 को गांधी डरबन से निकले तो स्मट्स ने कहा कि “संत ने हमारे तटों को छोड़ दिया है, मुझे पूरी आशा है कि हमेशा के लिए।” यह तो तात्कालिक प्रतिक्रिया थी, लेकिन सत्य यह है कि स्मट्स का गांधी को लेकर यह डर सालों बाद भी कम नहीं हुआ। 7 अगस्त 1942 को जब स्मट्स ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल के साथ डिनर कर रहे थे, उस वक्त “भारत-छोड़ो” आंदोलन के आह्वान ने सुर्खियां बटोर रखी थीं, स्मट्स ने चर्चिल से कहा कि, वह कभी भी गांधी को कम न समझें, उन्होंने कहा, “गांधी भगवान के आदमी हैं। आप और मैं सांसारिक लोग हैं। गांधी ने धार्मिक उद्देश्यों के लिए अपील की है। आपने ऐसा कभी नहीं किया और यहीं आप असफल हुए।”
गांधी 1915 में वापस भारत आ गए थे और गोपाल कृष्ण गोखले के कहे अनुसार उन्होंने साल भर पूरे भारत की यात्रा की। गांधी हमेशा तृतीय श्रेणी में यात्रा किया करते थे। भारत में गांधी की पहली बड़ी सार्वजनिक उपस्थिति फरवरी 1916 में बीएचयू के उद्घाटन के समय हुई। उस वक्त के कांग्रेसी नेताओं के बंद गले के भारतीय परिधान या पश्चिमी पोशाक और रहन-सहन के उलट गांधी की धोती और साधारण रहन-सहन भारतीय बहुतायत का प्रतीक बन गया।
1917 में शुरू हुआ भारत का पहला चंपारण “सत्याग्रह”। इसके बाद “रोलेट-सत्याग्रह” ने गांधी को राष्ट्रवादियों का नायक बना दिया। इसके बाद “असहयोग-आंदोलन” की मांग के चलते छात्रों ने सरकारी विश्वविद्यालयों का, वकीलों ने कोर्ट का और श्रमिक-वर्ग ने हड़ताल कर ब्रिटिश हुकूमत का बहिष्कार किया। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 1921 में 396 हड़तालें हुईं जिसमें 6 लाख से भी ज्यादा कामगारों ने हिस्सा लिया और लगबघ 70 लाख कार्य दिवसों का नुक्सान हुआ। 1857 के बाद पहली बार ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ें हिलीं थीं। इसके बाद 1930 में हुए “दांडी-मार्च” जिसमें गांधी समेत तकरीबन 60000 गिरफ्तारियां हुईं, उसने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और गांधी को पश्चिमी प्रेस में पहली बार विस्तार से जगह दिलाई और ब्रिटिश-साम्राज्य का भारत पर लम्बे समय तक राज करने का सपना ध्वस्त हो गया।
इसके बाद लंदन में “गोल-मेज सम्मेलनों” की श्रंखला हुई और “भारत-सरकार अधिनियम (1935)” ने भारतीयों की सत्ता पर हिस्सेदारी बढ़ा दी। 1937 तक 11 में से 8 प्रान्तों पर ब्रिटिश गवर्नर के अंदर भारतीयों का कब्जा था, लेकिन गांधी इतने से नहीं माने, उन्होंने 1929 में हुए कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में “पूर्ण-स्वराज” का प्रस्ताव पारित करा दिया था और तबसे हर साल राष्ट्रवादी 26 जनवरी को अपना स्वतंत्रता दिवस मनाते आ रहे थे। गांधी इस लक्ष्य को लेकर प्रतिबद्ध रहे।
कितने लोग ही ये जानते होंगे कि 6 दिसम्बर 1946 वाला लंदन घोषणापत्र गांधी को अप्रैल 1947 तक नही दिखाया गया था। गांधी बंटवारे से इतना आहत थे कि उन्होंने 15 अगस्त दिल्ली से दूर कलकत्ता में उपवास कर मनाया था। एक बार माउंटबैटन से बात करते वक्त बंटवारे के ख्याल से ही गांधी की आंखों में आंसू आ गए थे। कितने लोग यह जानते होंगे कि देश को बंटवारे से बचाने के लिए आखिरी प्रयास भी गांधी ने ही किया था। कितनों को पता होगा कि माउंटबैटन ने गांधी के लिए कहा था कि “पंजाब में 5000 लोगों की सेना होने के बावजूद हम दंगों को नहीं रोक पा रहे हैं और नोआखली में तो एक आदमी (गांधी) ने ही शांति कायम करवा ली है।“
1932 में पिछड़ों को हिन्दुओं से हमेशा के लिए अलग करने वाले अलग निर्वाचक मंडल के प्रस्ताव को गांधी ने पूना जेल में आमरण अनशन कर बर्खास्त करा दिया। भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत में ही गांधी को गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ गांधी का यह आखिरी प्रहार भी उतना ही तीव्र था। लोग कहेंगे अहिंसक आंदोलन से हमें क्या मिला? मैं कहूंगा दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र। सवाल यह भी हो सकता है कि अन्य एशियाई देश जैसे चीन के जापान के खिलाफ संघर्ष में माओ ज़ेडोंग और चियांग-काई-शेक या वियतनाम के हो-ची-मिंह का फ्रांस के खिलाफ या इंडोनेशिया के सुकार्नो जैसा और सिंगापुर के ली-कुवान-यू के द्वारा अपनाया गया खूनी संघर्ष का रास्ता क्यों हमारे देश का विकल्प नहीं था? जवाब सरल है कि उन देशों में हिंसक वामपंथ आंदोलन से गृह-युद्धों का सिलसिला आम हो गया। यह सवाल शायद आज हम पूछ भी नहीं पाते यदि गांधी भी माओ कि तरह ही कोई “रेड-फ़ोर्स” बना लेते।
30 जनवरी 1948 को गांधी की हत्या कर दी गई, लेकिन गांधी विश्व भर में अमर हो गए। गांधी के निधन पर शायद सबसे यादगार श्रद्धांजलि जॉर्ज बर्नार्ड शॉ की तरफ से आई थी जिन्होंने कहा था कि “गांधी की हत्या बताती है कि अच्छा होना कितना खतरनाक भी हो सकता है।” कुलदीप नय्यर कहते हैं कि, उस दिन मानों ऐसा लगा कि कोई हाथ सर से उठ गया हो। अमरीकी पत्रकार विंस्टन शीन ने लिखा कि- “वो खादी कि शॉल ओढ़े एक बूढ़ा शख्स ही तो था, लेकिन जब वो मरा तो पूरी मानव जाति अपने आंसू नहीं रोक पाई।“ विश्व प्रसिद्ध फोटोग्राफर मार्गरेट बॉर्के-व्हाइट ने जब उस असाधारण दृश्य की तस्वीरें उतरना शुरू किया तो उन्होंने पाया कि- “वो इस दुनिया में अब तक की जमा सबसे बड़ी भीड़ को अपने कैमरे में कैद कर रही हैं।” देश उस दिन अपने सबसे बड़े नायक को अंतिम विदाई दे रहा था। अपने “सबसे बड़े” महानायक की अंतिम यात्रा में मानों समस्त मानव-जाति सड़कों पर उतर आई हो।
152 वर्ष पूर्व आज ही दिन 2 अक्टूबर 1869 को जन्मी वह ऊर्जा देश को युगों-युगों की रोशनी प्रदान कर हमेशा के लिए चली गई। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी मानो देश को एक नई चेतना प्रदान कर गए हों।
आप सभी को गांधी जयंती की हार्दिक शुभकामनायें एवं बापू को शत-शत नमन।
जय हिंद