अक्षत मित्तल
शहर से पढ़कर आए समर से गांव के बुजुर्ग ने पूछा कि इतना पढ़े लिखे हो तो ये बताओ कि आसमान में कितने तारे हैं? समर ने चतुराई से कहा कि बाबा आसमान में 57 करोड़ 41 लाख 35 हजार 343 तारे हैं। अगर आपको मेरी बात पर यकीन नहीं तो आप खुद गिनकर देख सकते हैं। बुजुर्ग के पास इसका कोई जवाब नहीं था। या यूं कहें कि अल्पज्ञान के कारण बुजुर्ग के पास समर की बात ना चाहते हुए भी मानने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था। कुछ ऐसा ही हाल उनका है जो दूसरी तिमाही में आए अर्थव्यवस्था के आंकड़ों को चमत्कारिक बता रहे हैं।
सरकार और अधिकारी यह यकीन दिलाने में लगे हैं कि अर्थव्यवस्था सामान्य हो रही है। ठीक वैसे ही जैसे आसमान में 57 करोड़ 41 लाख 35 हजार 343 तारे हैं। जनता अल्पज्ञान के कारण आंकड़ों का यह खेल समझ नहीं पाती और उस बुजुर्ग की तरह ही उसके पास परोसे गए आंकड़ों को मानने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता है। हाल ही में आए दूसरी तिमाही के आंकड़े बताते हैं कि इस वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में भारत का जीडीपी शून्य से7.5 प्रतिशत नीचे रहा। इससे पिछली तिमाही में गिरावट 23.9 प्रतिशत की थी और इसी के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था ने पहली बार तकनीकी मंदी में प्रवेश किया है। अर्थशास्त्र में, जब जीडीपी की वृद्धि दर लगातार दो तिमाहियों या उससे अधिक के लिए नकारात्मक होती है तो इसे मंदी कहा जाता है।
यह बात तो सच है कि भारतीय अर्थव्यवस्था ने कुछ तेजी पकड़ी है। मैंने अपने पिछले लेख में दूसरी तिमाही पर विस्तार से चर्चा की थी। उसमें मैंने ऑक्सफ़ोर्ड इकोनॉमिक्स की एक रिपोर्ट का भी जिक्र किया था, लेकिन आज उन आंकड़ों पर निगाह डालना जरूरी है, जिन्हें हमने उतना खुलकर देखना पसंद नहीं किया। यह तथ्य है कि 7.5 प्रतिशत की नकारात्मक जीडीपी दर वैश्विक औसत से बेहतर है। भारतीय स्टेट बैंक की शोध टीम के विश्लेषण के अनुसार, 49 देशों ने जुलाई-सितंबर तिमाही के लिए जीडीपी डेटा की घोषणा की है। इन 49 देशों की औसत गिरावट -12.4 प्रतिशत की है। इसकी तुलना में, भारत की -7.5 प्रतिशत दर बेहतर दिखती है। लेकिन पिछली तिमाही में इन 49 अर्थव्यवस्थाओं का औसत -5.6 प्रतिशत था, जबकि भारत का लगभग -24 प्रतिशत। तब भी कहां चर्चा हुई थी?
अधिकांश विश्लेषकों को आश्चर्य है कि भारत की निर्माण फर्मों ने ऐसे कठिन समय में इतना मूल्य कैसे जोड़ा? विश्लेषक आश्चर्य में हैं कि इन फर्मों ने इतना अच्छा प्रदर्शन कैसे किया? असलियत यह है कि कंपनियों ने अधिक बेचने की बजाय कर्मचारियों की बेरहमी से छंटनी करके अपनी आय में वृद्धि की है। यह हरकत भविष्य में मांग को कम कर सकती है। आरबीआई गवर्नर भी मांग को लेकर चेतावनी दे चुके हैं। अगर हम जीडीपी के आंकड़ों को देखें, जो राष्ट्रीय आय को मापते हैं- कि किसकी मांग (खर्च) से किसी तिमाही में कितना? इसमें हम पाते हैं कि विकास के सभी इंजन सामान्य से काफी नीचे प्रदर्शन कर रहे हैं। अगर हम आंकड़े देखें तो पाएंगे कि आम जनता द्वारा किया गया खर्च मांग का सबसे बड़ा इंजन है। पिछले साल की दूसरी तिमाही में यह खर्च – 17.96 लाख करोड़ रुपये था, जो इस वर्ष की दूसरी तिमाही में पिछले साल से 11 प्रतिशत कम रहा।
अर्थव्यवस्था का दूसरा सबसे बड़ा इंजन व्यवसायों (बड़े और छोटे) द्वारा किए गए निवेश से उत्पन्न मांग है। इस इंजन की खपत इस वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में 9.59 लाख करोड़ रुपये थी जो पिछले साल की दूसरी तिमाही से सात प्रतिशत कम है। दूसरी तरफ निर्यात और आयात दोनों कम हुए हैं, लेकिन आयात, निर्यात की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक कम हुआ है। आयात की मांग में इतनी तेज गिरावट भारत जैसी बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए ठीक नहीं है। इससे भी बुरी खबर यह है कि इस वर्ष की दूसरी तिमाही में सरकार द्वारा किया गया खर्च पिछले वित्त वर्ष की इसी तिमाही से 22 प्रतिशत कम है। यह आलोचकों की अतीत में जताई गई चिंता पर मोहर लगाता है कि सरकार आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए पर्याप्त खर्च नहीं कर रही है। नतीजतन, दूसरी तिमाही का वास्तविक जीडीपी दो साल पहले से भी कम है।
मैं अक्सर फ़्रांसिस बेकन की कही गई एक बात दोहराता हूं, आज भी दोहराऊंगा कि आशावाद एक अच्छा नाश्ता हो सकता है, लेकिन इससे पेट नहीं भरता।