अक्षत मित्तल
“GDP में वर्ष 1980 में 5.2 प्रतिशत की तीव्र गिरावट देखी गयी थी, आज उस बात को चार दशक से भी अधिक का समय बीत चुका है, इस बीच नकारात्मक GDP वृद्धि दर नहीं देखी गयी थी, लेकिन ……”
साल था 1979 का, भारत का अधिकांश हिस्सा भयंकर सूखे की चपेट में था। दूसरी तरफ ईरानी क्रांति के कारण खाड़ी देशों में तनाव था। जिसके कारणवश आपूर्ति में व्यवधान ने कच्चे तेल की कीमतें लगभग दोगुनी कर दीं। उस वक्त भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में आजादी के बाद की सबसे बड़ी गिरावट देखी गई थी। वित्त वर्ष 1980 में भारत के जीडीपी में 5.2 प्रतिशत की तीव्र गिरावट देखी गई थी। आज उस बात को चार दशक से भी अधिक का समय बीत चुका है और इन चार दशकों में भारतीय अर्थव्यवस्था ने कभी नकारात्मक जीडीपी वृद्धि दर नहीं देखी थी, लेकिन राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) ने जो 31 मई को वित्त वर्ष 2021 की अंतिम तिमाही के आंकड़े जारी किए, उनसे हमें यह पता चलता है कि भारत के GDP में पिछले एक साल में 7.3 प्रतिशत की गिरावट आई है। यह आजादी के बाद से भारत की सबसे बड़ी गिरावट है।हालांकि यह आंकड़े अनुमानित आठ प्रतिशत की गिरावट से कुछ बेहतर हैं, लेकिन यह उस अर्थव्यवस्था के लिए शायद ही किसी राहत की बात होगी जिसके मौजूदा वित्त वर्ष के अनुमानित वृद्धि के आंकड़े कोविड की दूसरी लहर के करणवश घटाए जा रहे हैं। एनएसओ के मुताबिक वित्त वर्ष 2021 की अंतिम तिमाही (जनवरी-मार्च) में भारत का जीडीपी 1.6 प्रतिशत बढ़ा। यह अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में भी 0.5 प्रतिशत की दर से बढ़ा था।
वित्त वर्ष 2021 में स्थिर कीमतों (2011-12) पर भारत के जीडीपी का अब 135.13 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है, जो पिछले वित्त वर्ष में 145.69 लाख करोड़ रुपये था। गौर करने वाली बात यह है कि भारत का जीडीपी इस वक्त 2018-19 वाले स्तर से भी नीचे है। दूसरी तरफ जीवीए यानी सकल मूल्य वर्धित (जीडीपी माइनस कुल उत्पाद कर) जो आपूर्ति में वृद्धि को दर्शाता है, उसने 2020-21 में 6.2 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की है, जबकि पिछले वर्ष में इसके 6.5 प्रतिशत और 4.1 प्रतिशत की वृद्धि के अनुमान थे। वहीं नॉमिनल जीडीपी (रियल जीडीपी माइनस मुद्रास्फीति) ने भी 3.0 प्रतिशत का संकुचन देखा है। हालांकि यह संकुचन दूसरे एडवांस अनुमान के अनुमानित 3.8 प्रतिशत के संकुचन से बेहतर है, लेकिन पिछले वर्ष के 7.8 प्रतिशत की वृद्धि से बेहद कम है।
निरपेक्ष रूप से, विनिर्माण और निर्माण क्षेत्रों के लिए जीवीए में वृद्धि देखी गई है। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर जनवरी-मार्च में 6.9 प्रतिशत बढ़ा, जो पिछली तिमाही में 1.7 प्रतिशत बढ़ा था और पिछले साल की अंतिम तिमाही में 4.2 प्रतिशत घटा था। वहीं निर्माण क्षेत्र में 14.5 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई जो पिछली तिमाही में 6.5 प्रतिशत और पिछले वर्ष की अंतिम तिमाही के 0.7 प्रतिशत की वृद्धि से बेहतर है। अन्य क्षेत्रों की बात करें तो जनवरी-मार्च में कृषि वृद्धि धीमी होकर 3.1 प्रतिशत रह गई, जो अक्टूबर-दिसंबर में 4.5 प्रतिशत और पिछले वर्ष की अंतिम तिमाही में 6.8 प्रतिशत थी। खनन और व्यापार, होटल एवं परिवहन क्षेत्रों ने क्रमशः 5.7 प्रतिशत और 2.3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।

अगर हम राजकोषीय घाटे पर नजर डालें तो पाएंगे पिछले वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटा जीडीपी के 9.3 प्रतिशत (18,21,461 करोड़ रुपये) जितना ज्यादा हो गया। हालांकि फरवरी में केंद्रीय बजट के संशोधित अनुमानों (9.5 प्रतिशत) से यह कुछ कम है। सरकार को 2020-21 के दौरान 16,89,720 करोड़ रुपये (कुल प्राप्तियां) प्राप्त हुए। इस राशि में 14,24,035 करोड़ रुपये का कर राजस्व, 2,08,059 करोड़ रुपये गैर-कर राजस्व और 57,626 करोड़ रुपये गैर-ऋण पूंजीगत प्राप्तियां (ऋण की वसूली और विनिवेश) शामिल हैं। 2020-21 के दौरान केंद्र सरकार द्वारा करों के हिस्से के रूप में कुल 5,94,997 करोड़ रुपये राज्य सरकारों को हस्तांतरित किए गए, जो पिछले वर्ष की तुलना में 55,680 करोड़ रुपये कम है। जबकि केंद्र सरकार द्वारा किया गया कुल व्यय 35,11,181 करोड़ रुपये था। इस कुल राशि में से 30,86,360 करोड़ रुपये राजस्व खाते पर खर्च हुए और 4,24,821 करोड़ रुपये पूंजी खाते पर।
खर्च की बात करने पर हम पाएंगे कि कोविड-19 महामारी के परिणामस्वरूप वित्त वर्ष 2021 में घरेलू खर्च में रिकॉर्ड अंतर से कमी आने के बावजूद, सरकारी खर्च में वृद्धि जारी रही।जीडीपी में सबसे महत्वपूर्ण घटक, निजी अंतिम उपभोग व्यय (पीएफसीई) वित्त वर्ष 2021 में 9.1 प्रतिशत गिरकर 75.6 लाख करोड़ रुपये से नीचे आ गया जो वित्त वर्ष 2020 में 83.2 लाख करोड़ रुपये था। यह गिरावट भारत के इतिहास में सबसे बड़ी थी। पीएफसीई का भारत की जीडीपी में हिस्सा 56 प्रतिशत का रह गया जो पिछले वर्ष 57 प्रतिशत से ऊपर था। दूसरी ओर, सरकारी अंतिम उपभोग व्यय (जीएफसीई) 2.91 प्रतिशत बढ़कर वित्त वर्ष 2021 में 15.86 लाख करोड़ रुपये हो गया जो एक साल पहले 15.41 लाख करोड़ रुपये था। इसका मतलब सरकारी व्यय में वृद्धि तो हुई पर उतनी नहीं जितनी जरूरी थी। सकल अचल पूंजी निर्माण जनवरी-मार्च में 10.9 प्रतिशत बढ़ा है।
यह हालिया आए आंकड़े हैं, जो शायद डरा सकते हैं, लेकिन इस बात में शायद ही कोई शंका है कि यह आंकड़े प्रत्यक्ष रूप से कोविड की देन हैं। शायद से भारतीय अर्थव्यवस्था की उन्नति या दुर्गति इन आंकड़ों से बताना बैमानी होगी। हम इस नकारात्मक दर की जीडीपी वृद्धि को दूसरे तरीके से देखते हैं। दूसरा तरीका यह होगा कि इस संकुचन को पिछले एक दशक में भारतीय अर्थव्यवस्था के साथ क्या हो रहा है के संदर्भ में देखा जाए। पिछले एक दशक में भारत की अर्थव्यवस्था ने तेजी से आकाश की बुलंदियां छुईं और फिर उतनी तेजी से वह अर्श से फर्श पर आ गई। अब जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार अपने सात साल पूरे कर चुकी है। तब आइए इन सात सालों में अर्थव्यवस्था ने कैसा प्रदर्शन किया, इस पर नजर डालते हैं।
पिछले एक दशक में भारत की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर काफी हद तक एक उल्टे वी आकार की रही है। हम अक्सर नेताओं को यह आश्वासन देते हुए सुनते हैं कि “अर्थव्यवस्था की नींव मजबूत है” (Fundamentals of the economy are sound), अब सवाल यह है कि आखिर अर्थव्यवस्था की नींव है क्या? दरअसल अर्थव्यवस्था में बढ़त या नुकसान को देखने का सबसे अच्छा तरीका शायद तथाकथित “अर्थव्यवस्था के मूल सिद्धांत” ही हैं। चलिए हम अर्थव्यवस्था की कुछ नींवों पर नजर डालते हैं और परखते हैं कि वो कितनी मजबूत हैं।

सकल घरेलू उत्पाद (GDP)
जीडीपी की वृद्धि दर प्रधानमंत्री मोदी के इन 7 वर्षों के कार्यकाल में से पिछले 5 वर्षों से लगातार गिरती जा रही है। सनद रहे कि कोविड से पहले ऐसी कोई बड़ी आपदा नहीं आई थी जिससे अर्थव्यवस्था प्रभावित होती। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की वित्त वर्ष 2021 की वार्षिक रिपोर्ट भारत की विकास कहानी में महत्वपूर्ण मोड़ को दर्शाती है। इसमें दो बातें गौर करने वाली हैं। पहली कि वैश्विक वित्तीय संकट के कारण आई गिरावट के बाद, भारतीय अर्थव्यवस्था ने मार्च 2013 से फिर से उछाल मारना शुरू किया।

लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह रिकवरी 2016-17 की तीसरी तिमाही (अक्टूबर से दिसंबर) के बाद से मंदी में बदल गई। सनद रहे कि इसी समय 8 नवंबर, 2016 को रात भर में भारत की 86 प्रतिशत मुद्रा को बंद करने के सरकार के फैसले को कई विशेषज्ञ ट्रिगर के रूप में देखते हैं जिसने भारत की वृद्धि को मंदी में बदल दिया।नोटबंदी की तबाही और खराब तरीके से डिजाइन और जल्दबाजी में लागू किया गया गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) एक ऐसी अर्थव्यवस्था में फैल गया जो पहले से ही बैंकिंग प्रणाली में बड़े पैमाने पर खराब ऋणों से जूझ रही थी। इसका नतीजा यह हुआ कि जो जीडीपी विकास दर वित्त वर्ष 2017 में आठ प्रतिशत थी, वह वित्त वर्ष 2020 तक आधी होकर मात्र 4 प्रतिशत रह गई, यह कोविड-19 के देश में आने से ठीक पहले का समय था।
जनवरी 2020 में, जब जीडीपी (नॉमिनल) वृद्धि दर अपने 42 साल के सबसे निचले स्तर पर थी, तब प्रधानमंत्री मोदी ने आशावाद व्यक्त किया था कि भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूत क्षमता अर्थव्यवस्था की बुनियादी नींव की ताकत है और इसे वापस उछालने की क्षमता को दर्शाती है। लेकिन जैसा कि फ्रांसिस बेकन कहते थे कि “आशावाद एक अच्छा नाश्ता है, लेकिन इससे पेट नहीं भरता”। असल में तो भारतीय अर्थव्यवस्था के मूल तत्व पिछले साल जनवरी में भी काफी कमजोर थे। सनद रहे कि यह महामारी से बहुत पहले का वक्त था।
प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी)

कागजों पर प्रति व्यक्ति जीडीपी हमें अर्थव्यवस्था में एक औसत व्यक्ति की आय के बारे में बताता है। मैं व्यक्तिगत तौर पर प्रति व्यक्ति जीडीपी के पक्ष में नहीं। मेरा निजी तौर पर मानना है कि प्रति व्यक्ति जीडीपी हमें बस इतना बताता है कि मुकेश अंबानी और एक मनरेगा मजदूर की आय एक बराबर है। यह एक ऐसा समय है जब भारतीय अर्थव्यवस्था में असमानताएं अपने चरम पर हैं। 2020 में कॉरपोरेट मुनाफे में फिर से 20-25 प्रतिशत की वृद्धि हुई और भारत दुनिया का तीसरा सबसे ज्यादा अरबपतियों वाला देश बन गया। दूसरी तरफ भारत के मध्यम वर्ग के एक तिहाई कम होने की संभावना है और लगभग 7.5 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे धकेल दिए गए हैं।
भारत का प्रति व्यक्ति जीडीपी मात्र 99,700 रुपये रह गया है, जो 2016-17 के स्तर पर है। प्रति व्यक्ति जीडीपी के मामले में बांग्लादेश ने भी भारत को पीछे छोड़ दिया है। सनद रहे कि भारत दुनिया का पहला देश है जिसने 2006 से 2016 के बीच करीब 27 करोड़ जितने ज्यादा लोगों को गरीबी से बाहर निकाला था, लेकिन 2019 में आई यूएन की एक रिपोर्ट ने गरीबों की संख्या में कमी नहीं बढ़त की ओर इशारा किया, तब तक भारत में 36.4 करोड़ लोग गरीब हो गए थे। अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के एक शोध से पता चलता है कि महामारी के समय अब भारत में 23 करोड़ और लोग गरीबी रेखा के नीचे चले गए हैं। सवाल बड़ा जटिल है कि अगर अमीरों की कमाई बढ़ रही थी (डी-स्ट्रीट इस बात की गवाह है), तो किसकी आय में कमी आने की वजह से भारत का प्रति व्यक्ति जीडीपी इतना गिर गया?
यह सवाल जितना जटिल है, इसका जवाब उतना ही सरल।वास्तव में गरीबों और मध्यम वर्ग की कमाई गिरने की वजह से भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी इतनी कम हो गई है। किसी भी अर्थव्यवस्था में ऐसे क्षण बहुत कम ही आते हैं जब साल बीतते हुए वहां के लोग गरीब हो जाते हैं। सीएमआईई के आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि भारत में 97 प्रतिशत लोग पिछले साल के स्तर से गरीब हुए हैं।
बेरोजगारी दर

यह भारत की अर्थव्यवस्था की वो नींव है जिसने संभवत: सबसे खराब प्रदर्शन किया है। 2017-18 में सरकार के अपने सर्वेक्षणों के हवाले से यह खबर आई कि भारत की बेरोजगारी दर अपने 45 साल के सर्वोच्च स्तर पर है। यह नोटबंदी के एक साल बाद और जीएसटी लागू होने वाला साल था। इसके बाद 2019 में इससे भी ज्यादा चिंताजनक खबर आई कि 2012 और 2018 के बीच नियोजित लोगों की कुल संख्या में 90 लाख की गिरावट आई। यह आजाद भारत के इतिहास में कुल रोजगार में गिरावट का ऐसा पहला उदाहरण था। 2-3 प्रतिशत की बेरोज़गारी दर की परम्परा के विपरीत, भारत ने नियमित रूप से 6-7 प्रतिशत के करीब बेरोज़गारी दर देखना शुरू कर दिया। बेशक, अब इसे कोविड महामारी ने और बदतर बना दिया है।उदाहरण के लिए अकेले मई 2021 में ही 1.53 करोड़ नौकरियां ख़त्म हो गईं।
यह बात तो तय है कि कमजोर विकास संभावनाओं के साथ, बेरोजगारी सरकार के लिए अपने मौजूदा कार्यकाल में सबसे बड़ा सिरदर्द है।
मंहगाई दर
अर्थविद मिल्टन फ्रीडमैन कहते थे कि महंगाई कानून के बिना लगाया जाने वाला टैक्स है। मोदी सरकार के पहले तीन वर्षों में सरकार को कच्चे तेल की बहुत कम कीमतों से बहुत लाभ हुआ। 2011 से 2014 के दौरान 110 डॉलर प्रति बैरल के करीब रहने के बाद, तेल की कीमतें (इंडियन बास्केट) 2015 में तेजी से गिरकर सिर्फ 85 डॉलर प्रति बैरल और 2017 और 2018 में और कम होकर 50 डॉलर प्रति बैरल हो गईं। एक ओर, तेल की कीमतों में अचानक आई तेज गिरावट ने सरकार को देश में उच्च खुदरा मुद्रास्फीति को पूरी तरह से नियंत्रित करने में मदद की, और दूसरी ओर, इसने सरकार को ईंधन पर अतिरिक्त कर एकत्र करने की छूट भी दी।

लेकिन 2019 की अंतिम तिमाही के बाद से, भारत लगातार उच्च खुदरा मुद्रास्फीति का सामना कर रहा है। यहां तक कि 2020 में लॉकडाउन के कारण मांग में गिरावट भी मुद्रास्फीति की वृद्धि को नहीं घटा सकी। भारत उन कुछ उन्नत और उभरती अर्थव्यवस्थाओं में से एक था, जिसने 2019 के अंत से लगातार मुद्रास्फीति को आरबीआई की सीमा से ऊपर या उसके नजदीक ही देखा है।
राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit)
राजकोषीय घाटा हमें सरकारी वित्त के स्वास्थ्य की जानकारी देता है और उस राशि के बारे में बताता है जिसे सरकार को अपने खर्चों को पूरा करने के लिए बाजार से उधार लेना पड़ता है। आमतौर पर, उच्च राजकोषीय घाटे के दो नुकसान होते हैं। पहला कि सरकारी उधारी निजी व्यवसायों को उधार देने के लिए उपलब्ध राशि को कम करती है; और इससे ऐसे ऋणों की ब्याज दर भी बढ़ जाती है।
और दूसरा कि अतिरिक्त उधारी उस समग्र ऋण को बढ़ाती है जिसे सरकार को चुकाना होता है। उच्च ऋण स्तर सरकारी करों को अक्सर बढ़ा देता है। ऋण का उच्च स्तर भी उच्च स्तर के करों को लगाने का संकेत है। कागज पर, भारत के राजकोषीय घाटे का स्तर निर्धारित मानदंडों से थोड़ा ही अधिक था, लेकिन, वास्तव में कोविड-19 से पहले भी राजकोषीय घाटा सरकार द्वारा सार्वजनिक रूप से बताए गए आंकड़ों से कहीं अधिक था। इस साल केंद्रीय बजट में, सरकार ने माना कि वह भारत के जीडीपी के लगभग 2 प्रतिशत राजकोषीय घाटे को अंडर रिपोर्ट कर रही थी।
रुपया बनाम डॉलर
अमेरिकी डॉलर के साथ घरेलू मुद्रा की विनिमय दर अर्थव्यवस्था की शक्ति जानने के लिए एक मजबूत कारक है। 2014 में जब नई सरकार ने कार्यभार संभाला था तब एक अमेरिकी डॉलर की कीमत 59 रुपये थी। आज सात साल बाद, यह 73 रुपये के करीब है। रुपये की सापेक्ष कमजोरी भारतीय मुद्रा की कम क्रय शक्ति को दर्शाती है। हैरानी की बात यह है कि एक तरफ भारत का विदेशी मुद्रा भण्डार रिकॉर्ड स्तर तक बढ़ चुका है वहीं दूसरी तरफ रुपया लगातार गिर रहा है। यह अच्छे संकेत नहीं हैं।
ग्रोथ को लेकर क्या है आउटलुक?
भारत में विकास का सबसे बड़ा इंजन आम लोगों द्वारा अपनी निजी क्षमता में किया जाने वाला खर्च है, जो 2016-17 में अंतिम बार देखे गए स्तरों तक नीचे गिर गया है। इसका मतलब है कि अगर सरकार मदद नहीं करती है, तो भारत की जीडीपी आने वाले कई वर्षों तक पूर्व-कोविड स्थिति में वापस नहीं आ पाएगी। सनद रहे कि आरबीआई, मूडीज़, फिच समेत ज्यादातर संस्थाओं ने भारत के इस साल के वृद्धि अनुमानों (ग्रोथ आउटलुक) को अपने पिछले अनुमानों की तुलना में कम कर दिया है।
Bahut Badhiya lekh hai ye. Congrats.
Zabardast
hi, bahut achchha