
GDP: अभी जब यह ऐतिहासिक खबर आई कि भारत ने जापान को पछाड़ दिया है और अब दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है, तो यह खुश होने का अवसर था। लेकिन कुछ चेहरों पर उदासी थी। कुछ लोगों को जैसे पनीर की सब्जी में भी कांटे चुभने लग गए थे। अब भी चुभे ही जा रहे हैं। इन चेहरों पर चिंता नहीं थी, बल्कि कुढ़न थी। देश की जीडीपी अब जापान से ऊपर है। फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देशों से पहले ही ऊपर निकल चुकी है। जल्दी ही जर्मनी से भी ऊपर निकल जाएगी। मगर इन महापुरुषों को याद आ रही है प्रति व्यक्ति आय। अब इन्हें कौन समझाए कि भाईसाहब, अभी तो हम थाली में पनीर तक पहुँचे हैं, आगे रसगुल्ले की बारी भी आएगी।
जीडीपी बढ़ी है, लेकिन…
भारत का सकल घरेलू उत्पाद अब लगभग 4 ट्रिलियन डॉलर के पार निकल चुका है। चीन के बाद एशिया में दूसरा और दुनिया में चौथा स्थान। दुनिया में हमसे आगे सिर्फ अमेरिका, चीन और जर्मनी। साल-दो साल में जर्मनी भी पीछे रहेगा। यह उपलब्धि केवल आँकड़ों की बाजीगरी नहीं है। यह बीते कई दशकों की मेहनत, उदारीकरण की नीतियों, बढ़ते बुनियादी ढाँचे, स्टार्टअप कल्चर और डिजिटलीकरण की देन है। लेकिन इस बात को मान लेने में विघ्नसंतोषियों की आत्मा कुर्सी से गिर जाती है। उनकी सबसे प्रिय पंक्ति है- “जीडीपी बढ़ा है, लेकिन…”। इसके बाद जो आता है, वह किसी रोते हुए कवि की पंक्तियों जैसा होता है। कभी कहते हैं कि अमीर-गरीब की खाई बढ़ गई है, कभी कहते हैं कि खेतों में किसान आत्महत्या कर रहा है और कभी यह कि “हमारे पड़ोसी बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति आय ज्यादा है।” अब बताइए!
प्रति व्यक्ति आय: विघ्नसंतोष का ब्रह्मास्त्र
हर बार जब भारत की अर्थव्यवस्था नई ऊँचाई छूती है, तो यह ‘प्रति व्यक्ति आय’ वाला ब्रह्मास्त्र जरूर निकाला जाता है। जैसे किसी शादी में सब लोग ढोल-नगाड़े पर झूम रहे हों, और कोई दूर बैठकर कहे- “लेकिन लड़के की नौकरी तो सरकारी नहीं है।” अरे भैया, अभी तो शादी हो रही है, मिठाई खाओ, जश्न मनाओ।
नौकरी का पोस्टमार्टम कल कर लेना
यह बात सही है कि भारत की प्रति व्यक्ति आय अभी अमेरिका, जापान या जर्मनी से बहुत पीछे है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस कारण से 4 ट्रिलियन डॉलर की जीडीपी की सफलता को नकार दिया जाए? यह वैसा ही है जैसे कोई कहे- “तुम्हारे पास कार तो है, लेकिन वो बीएमडब्ल्यू नहीं है।” हाँ, नहीं है। लेकिन अब है तो सही! पैदल से कार तक का सफर प्रगति नहीं तो और क्या है?
राष्ट्र की सफलता कोई व्हाट्सऐप स्टेटस नहीं
जीडीपी कोई फिल्मी हीरो की बॉडी नहीं है, जिसे देख के तुरंत तालियाँ बजें। यह सालों की नीति, श्रम, निवेश और राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिणाम है। जब भारत 1991 में आर्थिक संकट के गर्त में था, तब किसे उम्मीद थी कि एक दिन हम जापान से आगे निकलेंगे? लेकिन आज वो दिन है। यह कोई छोटी बात नहीं। लेकिन फिर वही – “हाँ, लेकिन अमीरों का अमीर होना ही तो है!” जैसे कोई कहे कि बारिश इसलिए नहीं अच्छी, क्योंकि उससे छत पर ज्यादा पानी भर जाता है। अब विकास में असमानता की समस्या है। इसमें दो राय नहीं। लेकिन क्या किसी देश में ऐसा नहीं है? अमेरिका को देखिए। वहाँ भी वॉलमार्ट के पीछे गरीब बसते हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वॉलमार्ट को बंद कर दिया जाए।
अमेरिका तो मुश्किल से अब 2 फीसदी भी बढ़ पाता है, तब ऐसा हाल है! हम कई सालों से लगातार 6-7 फीसदी से बढ़ रहे हैं। दुनिया में सबसे तेज गति से तरक्की करने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था हमारी है। और अर्थशास्त्र का इतिहास बताता है कि जब तेज तरक्की होती है, अमीरी-गरीबी की खाई बढ़ती है। यह स्वाभाविक बात है। और इतनी ही स्वाभाविक बात ये भी है कि कुछ समय खाई बढ़ने के बाद फिर स्वत: इसकी पाटें करीब आने लगती हैं। अमीरी-गरीबी का अंतर कम होने लगता है। अभी हमने 80 करोड़ को भीषण गरीबी से बाहर निकाला है। अब हमारे यहाँ भुखमरी नहीं है। आगे इन्हें भीषण गरीबी से निकालकर मध्यम वर्ग में भी लाएंगे।
कुढ़न और विघ्नसंतोष का मनोविज्ञान
दरअसल, विघ्नसंतोष एक मानसिक अवस्था है। इसमें मनुष्य दूसरों की सफलता देखकर दुखी हो जाता है। यह एक तरह का सामाजिक ‘एसिड रिफ्लक्स’ है। देश प्रगति करे, तो पेट में जलन होती है। यह जलन पके हुए आँकड़ों से नहीं जाती, इनके लिए कोई जीडीपी न्यूट्रलाइजर की गोली नहीं बनी है। ये लोग हर चमकते हुए आँकड़े के पीछे ‘अँधेरे’ ढूँढते हैं। जीडीपी बढ़ा तो कहेंगे- “हाँ, लेकिन शिक्षा व्यवस्था देखो।” शिक्षा सुधार हुआ तो कहेंगे- “लेकिन स्वास्थ्य सेवा?” स्वास्थ्य सुधरी तो- “लेकिन लोकतंत्र खतरे में है।” इनका मूल सिद्धांत है- “विकास दिखे, तो उससे आँख फेर लो।”
लेकिन आलोचना भी जरूरी है, ना?
बिलकुल जरूरी है। आलोचना लोकतंत्र का प्राण है। पर आलोचना और कुढ़न में फर्क होता है। आलोचक कहता है- “बहुत कुछ अच्छा हुआ है, लेकिन यहाँ सुधार की गुंजाइश है।’’ कुढ़ने वाला कहता है- “कुछ अच्छा हो ही नहीं सकता, क्योंकि इससे मुझे कोई फायदा नहीं हुआ।”
जीडीपी के बढ़ने का लाभ सीधे हर जेब में नहीं गिरता। यह समझने की बात है। यह लाभ बुनियादी ढाँचे, विदेशी निवेश, नौकरियों के सृजन और सरकार की क्रेडिट रेटिंग के जरिए आता है। अगर देश की आर्थिक स्थिति मजबूत होती है, तो उसकी वैश्विक हैसियत बढ़ती है। और जब दुनिया निवेश करती है, तब आम नागरिक को रोजगार, शिक्षा, चिकित्सा (और पनीर भी) सब मिलना शुरू होता है।
लेकिन रसगुल्ला अभी दूर है
अब अगर आप कहें कि “पनीर की सब्जी तो मिल गई, लेकिन रसगुल्ला क्यों नहीं?”, तो यह भी ठीक है। पर उसके लिए प्रधानमंत्री को दोष देना वैसा ही है, जैसे किसी बारात में मिठाई खत्म हो जाने पर दूल्हे को थप्पड़ मार दिया जाए। रसगुल्ला आएगा। थोड़ा इंतजार करना होगा। जब थाली में चावल, दाल, रोटी, सब्जी सब आ जाएँ, तब गुलाब जामुन भी परोसा जाएगा। जीडीपी अभी जिस मुकाम पर है, वहाँ से प्रति व्यक्ति आय की चाल भी तेज होगी। बशर्ते हम केवल कुर्सी पर बैठकर आँकड़ों पर रोते न रहें, बल्कि मेहनत करें, स्किल बढ़ाएँ, उत्पादन करें। सिर्फ 15 साल पहले हमारी प्रति व्यक्ति आय 1,350 डॉलर से भी कम थी। अभी 2,900 डॉलर है। आगे 5-10 हजार डॉलर भी होगी। 1990 में हम विदेश से सामान खरीदने के लिए अपना सोना गिरवी रखने पर मजबूर थे। आज हमसे ज्यादा विदेशी मुद्रा भंडार सिर्फ 3 देशों ‘चीन, जापान और स्विट्जरलैंड’ के पास है। हमने इतना सफर तय किया है। आसान ये भी नहीं था, लेकिन हमने किया न! आगे का भी सफर आसान नहीं है, लेकिन हम करेंगे।
अंत में: राष्ट्रवाद कोई आँख मूंद लेना नहीं
राष्ट्रवाद का मतलब यह नहीं कि हर चीज को ‘सब चंगा’ कहकर आँखें मूँद लें। लेकिन राष्ट्रवाद यह जरूर कहता है कि जब देश कोई ऊँचाई छुए, तो उसका स्वागत करें। देश के बढ़ते कदमों से कदम मिलाएँ। और आलोचना जरूर करें, कुढ़ने से बचते हुए। साहित्य में आलोचना और बुराई का अंतर बताया जाता है। आलोचना बुराई नहीं है। और बुराई भी आलोचना नहीं है। आप कुछ न कर पा रहे हैं तो आलोचना में ही ईमानदार हो जाएँ। फिर हम आगे का सफर भी तय कर लेंगे।
और हाँ, अगली बार जब कोई कहे कि “जीडीपी तो बढ़ गई, लेकिन…”, तो उसके हाथ में एक कटोरी रायता दीजिए और कहिए- “ठंड रखिए, अभी रसगुल्ला भी आएगा।”