Healthcare ही बने चुनावी मुद्दा

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आनंद सिंह

मेरा व्यक्तिगत तौर पर मानना है कि प्रदेश के विधानसभा चुनाव सिर्फ एक ही मुद्दे पर फोकस्ड हों। यह है हेल्थ (Health)।

यह सवाल जरा काल्पनिक है, पर है तो आखिर सवाल ही। उत्तर प्रदेश में 2022 में जो विधानसभा के चुनाव होने हैं, वह किन मुद्दे पर होंगे? आप कह सकते हैं कि अभी कोरोना से आदमी परेशान है और मैं बात कर रहा हूँ चुनाव की। आप यह भी कह सकते हैं कि जब चुनाव तय हो जाएंगे तब नेता लोग खुद ही मुद्दा खोज लेंगे। या, फिर आप यह भी कह सकते हैं कि अभी तो साल भर से ज्यादा का वक्त है। अभी से चुनाव की बात क्यों की जाए, क्यों चुनावी मुद्दों पर ख्वाहमख्वाह चर्चा हो! दरअसल, इस पर अभी से सोचने, मनन करने और फिर इसे मूर्त रूप देने के लिए वक्त चाहिए। रातोंरात कोई क्रांति नहीं हुई है। मेरा व्यक्तिगत तौर पर मानना है कि प्रदेश के विधानसभा चुनाव सिर्फ एक ही मुद्दे पर फोकस्ड हों। यह है हेल्थ (Health)।
क्या बताने की जरूरत है कि सरकारी अस्पतालों की क्या दुर्दशा हो गई है? इलाज का क्या स्तर है? कितने लोग इस कोरोना से असमय काल के गाल में समा गए? सरकारी स्तर पर इलाज में लापरवाही का क्या सबब रहा? निजी हॉस्पिटल्स ने मरीजों को कैसे लूटा? छह सौ रुपये की सुई कैसे लाखों में ब्लैक हुई? मरीजों की क्या सेवा हुई? ऑक्सीजन, आईसीयू, सीसीयू के कितने बेड थे? मरीजों की संख्या कितनी थी? आप आंकड़ों पर जाएंगे तो गश खाकर गिर जाएंगे। चौबीस करोड़ की आबादी के लिए जो मेडिकल सुविधाएं राज्य में होनी चाहिए, जैसी होनी चाहिए, वे नहीं हैं। मैं आपको 50 उदाहरण दे सकता हूँ कि कैसे लोग अस्पताल में जगह न होने के कारण गेट पर ही एड़ियां रगड़-रगड़ कर मर गए। क्यों? जो मर गए, उनकी ज़िंदगी की कोई कीमत नहीं थी? थी, हमने उनकी ज़िंदगी की कीमत को समझा ही नहीं।
खुद से सवाल कीजिये कि बीते 10 वर्षों में मेडिकल के क्षेत्र में प्रदेश की सरकारों ने कितनी घोषणाएं कीं और धरातल पर क्या दिख रहा है? अगर सरकारों को आपकी ज़िंदगी की चिंता नहीं तो चिंता करने का, मनन करने का काम भी अब हमारा आपका ही हो गया! उन जन प्रतिनिधियों के नाम रजिस्टर में दर्ज कर लें, जिन्होंने इस संकट की घड़ी में अपना चेहरा तक आपको न दिखाया हो, आपकी तकलीफ न समझी हो, आपका हालचाल न लिया हो। जब वे वोट मांगने आएं तो उन्हें सार्वजनिक तौर पर बेइज़्ज़त कीजिये और पूछिये जरूर कि संकट काल में आप कहाँ मुंह छिपाये बैठे थे?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) कहता है कि हर राज्य/देश को अपनी कुल घरेलू सकल आय का 15 फीसद हेल्थ (Health) पर खर्च करना चाहिए। भारत सरकार (Union of India) ने इस बजट वर्ष में लगभग सात फीसद धन खर्च करने का इरादा जाहिर किया है पर यह तो आदर्श आंकड़े से भी आठ फीसद कम है। तभी तो कोरोना हमारे लोगों को खा रहा है। अपने सूबे में इस साल हेल्थ सेक्टर के लिए बजट में जो धनराश दी गई है, वह महज चंद हज़ार करोड़ रुपये की है, जबकि प्रदेश का कुल बजट साढ़े पांच लाख करोड़ रुपये का है। WHO के फार्मूले से चलें तो इसका 15 फीसद हेल्थ पर खर्च होना चाहिए, लेकिन यहां 15 फीसद से बेहद कम, कोई छह फीसद राशि ही हेल्थ बजट पर खर्च की जा रही है। इसलिए, किसी भुलावे में आने की जरूरत नहीं। हेल्थ टॉप पर रखिये। ज़िंदा रहेंगे हम आप तो सरकार भी चलेगी, तरक्की भी होगी, पूजा पाठ भी हो जाएगा। जब कोरोना ही हमें खत्म कर देगी तो…? इसलिए चिंतन कीजिये, मनन कीजिये, अपना एजेंडा खुद से तय कीजिये और हां, इन राजनेताओं को यही पता है कि आम हिन्दुस्तानी एक नम्बर के भुलक्कड़ होते हैं। इस गलतफहमी को भी इस बार दूर कर दीजिए। इसी में सभी की भलाई है।

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