सुभाष कुमार सुमन: भारत के अग्रणी कारोबारी गौतम अदाणी को निशाना बनाने से चर्चा में आयी अमेरिकी कंपनी हिंडेनबर्ग (Hindenburg) रिसर्च बंद हो गयी है। दुनिया भर में कारोबारियों और कंपनियों को निशाना बनाने के लिए कुख्यात इस कंपनी के बंद होने का ऐलान संस्थापक नाथन एंडरसन ने 15 जनवरी को किया। हिंडेनबर्ग रिसर्च किसी कंपनी के खिलाफ रिपोर्ट जारी करने से पहले उसके शेयरों को शॉर्ट करती थी। उसके बाद जब रिपोर्ट सामने आती थी, संबंधित कंपनी के शेयरों के भाव गिर जाते थे और इस तरह से हिंडेनबर्ग रिसर्च को मोटी कमाई हो जाती थी। इसके चलते हिंडेनबर्ग रिसर्च पूरी दुनिया में बदनाम हो चुकी थी और भारत से लेकर अमेरिका तक बाजार नियामकों की निगाहों में आ चुकी थी।
एंडरसन ने हिंडेनबर्ग रिसर्च को बंद करने का ऐलान करते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि उन्होंने पिछले साल के अंत में इस बारे में अपना मन बनाया था। उसके बाद उन्होंने हिंडेनबर्ग रिसर्च को बंद करने की अपनी योजना से परिजनों, दोस्तों और टीम के सहयोगियों को बता दिया था। उनकी योजना कंपनी को बंद करने से पहले मौजूदा परियोजनाओं को पूरा करने की थी। कंपनी एक अंतिम परियोजना पर काम कर रही थी, जिसे 15 जनवरी को पूरा कर लिया गया और उसके बारे में नियामक को अवगत करा दिया गया। हालाँकि जिस तरह से हिंडेनबर्ग रिसर्च को बंद करने का ऐलान हुआ, उसने कई सवालों को जन्म दे दिया। एंडरसन ने कंपनी को अचानक बंद करने के फैसले के कारण के बारे में अपनी ओर से कुछ खास नहीं बताया। इस विषय पर एंडरसन ने लिखा- मुझे कोई खतरा नहीं है, स्वास्थ्य से जुड़ी कोई दिक्कत नहीं है, कोई बड़ा व्यक्तिगत कारण भी नहीं है। मैं पहले अपने लिए कुछ साबित करना चाहता था। अब मुझे लगता है कि मेरे जीवन का केंद्र बिंदू हिंडेनबर्ग नहीं है, बल्कि यह सिर्फ एक अध्याय था। अब मैं अपने परिवार के साथ समय व्यतीत करना चाहता हूँ, घूमना-फिरना चाहता हूँ और अपने शौक पूरा करना चाहता हूँ।
लेकिन एंडरसन मामले को जितना साफ बताना चाह रहे हैं, उतना साफ है नहीं। विश्लेषक इसे कई चीजों से जोड़कर देख रहे हैं। सबसे पहले तो हिंडेनबर्ग रिसर्च को बंद करने के ऐलान के समय से सवाल खड़े हो रहे हैं। एंडरसन ने यह ऐलान अमेरिका में नयी सरकार के गठन से ऐन पहले किया। कंपनी बंद करने का ऐलान हुआ 15 जनवरी को, जब सिर्फ 5 दिन बाद डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के नये राष्ट्रपति के रूप में शपथ लेने वाले थे। पिछले साल हुए अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार थे। उन्होंने मौजूदा राष्ट्रपति जो बाइडेन की डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार कमला हैरिस को मात दी। नवंबर के पहले हफ्ते में चुनाव परिणाम सामने आने के बाद 19 जनवरी 2025 तक बाइडेन सरकार ही सत्ता में रही। 20 जनवरी 2025 से डोनाल्ड ट्रंप की सरकार का कार्यकाल शुरू हो गया। यह डोनाल्ड ट्रंप की सरकार का दूसरा कार्यकाल है।
अमेरिका में हुए इस राजनीतिक बदलाव के तार दुनियाभर के कई घटनाक्रमों से जुड़े हुए हैं। कई विश्लेषक हिंडेनबर्ग के अचानक बंद होने के लिए भी इस राजनीतिक बदलाव को प्रमुख कारण के रूप में गिनते हैं। यह अनायास नहीं है। ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के सांसद लांस गुडेन ने कुछ समय पहले ही हिंडेनबर्ग के मामले में हस्तक्षेप किया था। गुडेन अमेरिकी संसद की कानूनी समिति के सदस्य हैं। उन्होंने अमेरिका के कानून मंत्रालय से कहा था कि वह अदाणी से जुड़े मामले में सभी दस्तावेजों को सुरक्षित रखे। उन्होंने अमेरिकी कानून मंत्रालय द्वारा चयनित तरीके से मुकदमेबाजी शुरू करने के रवैये पर भी सवाल किया था और पूछा था कि कहीं इसका जॉर्ज सोरोस के साथ कोई लेना-देना तो नहीं है। जॉर्ज सोरोस का नाम पूरे प्रकरण में बहुत अहम कड़ी बन जाता है। सोरोस का नाम वैश्विक राजनीति में उसी तरह कुख्यात है, जैसे कारोबार की दुनिया में हिंडेनबर्ग रिसर्च और उसके संस्थापक नाथन एंडरसन का नाम। हिंडेनबर्ग पर ये आरोप भी लगते आये हैं कि वह ‘सुपारी किलर’ की तरह किन्हीं खास इशारों पर कंपनियों को निशाना बनाती थी। जैसे गौतम अदाणी और उनके कारोबारी समूह को निशाना बनाया गया।
गौतम अदाणी हालिया कुछ सालों के दौरान बहुस्तरीय हमलों के निशाने पर आये। एक तरफ हिंडेनबर्ग रिसर्च ने अदाणी के खिलाफ मोर्चा खोला और हाथ धोकर पीछे पड़ गयी। दूसरी ओर हिंडेनबर्ग के आरोपों पर भारत में राजनीतिक बयानबाजियाँ होने लगीं। फिर 2024 के अंत में एक अहम मोड़ आया, जब अमेरिका में कानून मंत्रालय और बाजार नियामक एसईसी द्वारा अदालत में सौंपे दस्तावेजों में अदाणी की कंपनियों का नाम आया। इस पूरे प्रकरण को विश्लेषकों ने दो तरह से देखा। पहला- अदाणी 2023 की शुरुआत में दुनिया के शीर्ष 5 अमीरों में शामिल हो गये थे। यह पहली बार था, जब किसी उभरती अर्थव्यवस्था से कोई कारोबारी अग्रिम कतार में शामिल हुआ। अदाणी ने बीते कुछ सालों में वैश्विक स्तर पर कारोबार का आक्रामक विस्तार किया। श्रीलंका से लेकर इजरायल तक उनकी कंपनियों ने बड़े बंदरगाहों का परिचालन अधिकार हासिल किया। अदाणी का नाम खराब करने से भारत की छवि भी खराब की जा सकती है, ऐसी सुनियोजित योजना से अदाणी पर चौतरफा हमले किये गये। हिंडेनबर्ग ने जब अपनी एक रिपोर्ट में अदाणी के साथ भारतीय बाजार नियामक सेबी को जोड़ने का प्रयास किया, उसने इन संदेहों को पुख्ता किया। सोरोस का नाम लंबे समय से भारत को राजनीतिक रूप से अस्थिर करने के प्रयासों में आता रहा है। दूसरा- श्रीलंका में अदाणी के बंदरगाह कारोबार के विस्तार से चीन को सीधी चुनौती मिली। इस कारण हिंडेनबर्ग के प्रयासों के पीछे सोरोस या चीन का हाथ होने की बातें उठने लगीं। सोरोस और चीन दोनों ही ट्रंप को पसंद नहीं हैं। ट्रंप के प्रमुख सहयोगी के रूप में उभरे कारोबारी एवं दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति एलन मस्क अक्सर सोरोस की साजिशों की मुखर आलोचना करते आये हैं। इन सब कारणों से विश्लेषक मान रहे हैं कि ट्रंप सरकार के गठन से पहले हिंडेनबर्ग ने अपना कारोबार समेट लिया, क्योंकि उसे ट्रंप की नयी सरकार में जाँच और कार्रवाइयों का सामना करना पड़ सकता था। अगर यह बात सच है तो कह सकते हैं कि हिंडेनबर्ग जिस पारदर्शिता का एजेंडा बनाकर चयनित एक्टिविज्म कर रही थी, उसी पारदर्शिता के डर से उसने अपना कारोबार ही समेट लिया।
बाजार विशेषज्ञ एवं अनुभवी निवेशक अजय बग्गा भी हिंडेनबर्ग रिसर्च के बंद होने के पीछे कुछ ऐसे कारण होने की बात गिनाते हैं। उन्होंने हिंडेनबर्ग रिसर्च के अचानक बंद होने के कुछ कारण गिनाये हैं। वे कहते हैं कि हिंडेनबर्ग ने हमेशा नकारात्मक काम किया। उसने शॉर्ट पोजिशंस लेकर नकारात्मक रपटें पेश कीं। कई बार हेज फंडों के जरिये शॉर्ट पोजिशन लिए गये, जो अपनी पोजिशंस का खुलासा नहीं करते हैं। इस तरह के शॉर्ट सेलर कभी बहुत अच्छा लाभ नहीं कमा पाते हैं। गिने-चुने शॉर्ट सेलर ही अच्छा लाभ कमा पाने में कामयाब होते हैं और इसी कारण उनका खूब नाम लिया जाता है। एक कारण नियामकीय कार्रवाइयों के चलते जुर्माने से बचने का भी हो सकता है। हो सकता है चुपचाप कारोबार समेटने का समझौता हो चुका होगा। हिंडेनबर्ग ने अपने काम में लाभ कमाने के लिए चुनकर कंपनियों को निशाना बनाया, जिसमें कंपनियों, प्रवर्तकों और बाजार का नुकसान हुआ। यह कोई सत्य की खोज करने वाला अभियान नहीं था, बल्कि कंपनियों और उसके प्रवर्तकों की छवि खराब करने वाले आरोप लगाकर शेयरों की शॉर्टिंग से पैसे कमाने का तरीका भर था। हिंडेनबर्ग को कोई याद नहीं करने वाला है।
हिंडेनबर्ग की कहानी बंद करने के लिए एक बड़ा कारण भारतीय नियामक सेबी भी है। कई विश्लेषक मानते हैं कि हिंडेनबर्ग ने अदाणी का शिकार करने के प्रयास में अपनी ही सुपारी ले ली। दरअसल हिंडेनबर्ग ने जनवरी 2023 में जब पहली बार अदाणी को निशाना बनाया, तो खूब हंगामा हुआ। उसकी तपिश बाजार से लेकर संसद तक महसूस की गयी। बाजार में उस रपट के बाद अदाणी के शेयरों का पतन शुरू हो गया। लगभग एक महीने तक रोज ही अदाणी के शेयरों पर लोअर सर्किट लगता रहा। देखते-देखते अदाणी समूह की कंपनियों के बाजार पूँजीकरण में 7 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की गिरावट आ गयी। यानी अदाणी के शेयरों में निवेशकों के 7 लाख करोड़ रुपये डूब गये। हिंडेनबर्ग ने अदाणी समूह पर उस समय कई गंभीर आरोप लगाये थे। उसने कहा था कि अदाणी के शेयरों के भाव गलत तरीके से चढ़ाये गये हैं। साथ ही अदाणी पर मुखौटा कंपनियों के माध्यम से पैसों का हेर-फेर करने का भी आरोप लगाया गया था। हिंडेनबर्ग ने उसे कॉरपोरेट इतिहास का सबसे बड़ा घोटाला करार दिया था। मामला तूल पकड़ने पर सेबी ने इसकी जाँच शुरू की। सेबी की जाँच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, नयी परतें खुलने लगीं। सेबी ने इस संबंध में हिंडेनबर्ग को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया। हिंडेनबर्ग ने कारण बताओ नोटिस का जवाब देने की जगह सेबी प्रमुख माधबी पुरी बुच और उनके पति धवल बुच पर कीचड़ उछालने का प्रयास किया। इस खुलासे में हिंडेनबर्ग ने आरोप लगाया कि माधबी बुच और उनके पति के अदाणी के साथ व्यावसायिक हित जुड़े हुए हैं। हालाँकि इस आरोप का अदाणी समूह और सेबी प्रमुख दोनों ने खंडन किया।
अब सेबी द्वारा पिछले साल 26 जून को भेजे गये नोटिस को देखें। सेबी ने हिंडेनबर्ग रिसर्च के साथ नाथन एंडरसन, मार्क ई किंगडॉन, किंगडॉन कैपिटल मैनेजमेंट, किंगडॉन ऑफशोर मास्टर फंड और के-इंडिया अपॉर्च्यूनिटीज फंड को भी नोटिस भेजा था। यहाँ किंगडॉन का नाम महत्वपूर्ण कड़ी बन जाता है। हिंडेनबर्ग ने अदाणी पर रपट को प्रकाशित करने से पहले किंगडॉन मैनेजमेंट के साथ साझा किया था और किंगडॉन ने कोटक महिंद्रा बैंक के जरिये अदाणी के शेयरों का शॉर्ट-ट्रेड किया था। किंगडॉन चीन के साथ संबंधों के लिए बदनाम कारोबारी है। ऐसे दावे किये जाते रहे हैं कि किंगडॉन की पत्नी अन्ला चेंग के संबंध सीधे चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से हैं। वरिष्ठ वकील एवं भाजपा के राज्यसभा सांसद महेश जेठमलानी तो आरोप लगाते हैं कि चेंग वास्तव में चीन की खुफिया एजेंट है। जेठमलानी का कहना है कि किंगडॉन ने अदाणी को बदनाम करने का काम हिंडेनबर्ग को दिया।
डोनाल्ड ट्रंप अपने चुनावी अभियान में अमेरिकी कानून विभाग पर हमलावर रहे हैं। खुद ट्रंप के खिलाफ पिछले 4 साल के दौरान कानून विभाग ने कई मुकदमे खोले। ट्रंप ने वादा किया है कि उनकी सरकार बनने पर बाइडेन सरकार के कार्यकाल में अमेरिकी कानून विभाग द्वारा खेले गये मुकदमों की जाँच की जायेगी। जिन मामलों की जाँच करने की बात कही जाती रही है, उनमें अदाणी का मामला भी शामिल है। दूसरी ओर सेबी द्वारा कारण बताओ नोटिस से आगे की कार्रवाई का खतरा भी तेज हो चुका था। बाजार नियामक जुर्माना व प्रतिबंध लगाने से पहले संबंधित निकायों को कारण बताओ नोटिस जारी करता है। संतोषजनक जवाब नहीं मिलने पर नियामक द्वारा कार्रवाई की जाती है। चूँकि हिंडेनबर्ग ने जवाब नहीं दिया था, उसके ऊपर सेबी द्वारा कार्रवाई की मजबूत संभावनाएँ बन रही थी। इसे भी हिंडेनबर्ग के अचानक बंद होने का एक कारण माना जा रहा है।
इरोज इंटरनेशनल (2017 – 2019), भारत/अमेरिका: अदाणी से पहले भी हिंडेनबर्ग रिसर्च ने एक भारतीय कंपनी को निशाना बनाया था और वह कंपनी है इरोज इंटरनेशनल, जो अमेरिका स्थित न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज पर सूचीबद्ध थी। यह किसी सूचीबद्ध कंपनी के खिलाफ हिंडेनबर्ग का पहला प्रमुख मामला था। खुलासे के बाद जाँच हुई। भारत में सेबी ने कंपनी के प्रवर्तकों पर धोखाधड़ी के लिए जुर्माना लगाया। उधर अमेरिका में कंपनी को 2023 में न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज से हटा दिया गया।
ओप्को हेल्थ (2017), अमेरिका: हिंडेनबर्ग ने ओप्को हेल्थ में अपराधिक गतिविधियों और उत्पाद विफलताओं के संबंध को उजागर किया। उसके बाद 2018 में एसईसी ने कंपनी पर धोखाधड़ी के आरोप लगाये, जिनका बाद में निपटारा हुआ।
यांग्त्जी रिवर पोर्ट एंड लॉजिस्टिक्स (2018), चीन/अमेरिका: हिंडनबर्ग की रिपोर्ट ने दिखाया कि कंपनी की एक मुख्य संपत्ति मौजूद नहीं है। इस मामले में हिंडेनबर्ग पर भी कानूनी कार्रवाई हुई। वहीं कंपनी को भी भारी नुकसान हुआ। उसका बाजार पूँजीकरण 99% कम हो गया। उसे नास्डैक से भी हटा दिया गया।
ब्लूम एनर्जी (2019), अमेरिका: हिंडनबर्ग ने ब्लूम एनर्जी में छिपायी गयी देनदारियों को उजागर किया, जिसके चलते 2020 में कंपनी के वित्तीय स्टेटमेंट्स में संशोधन किया गया।
एससी वर्क्स (2020), अमेरिका: हिंडनबर्ग ने एससी वर्क्स द्वारा कोविड-19 टेस्ट किट के एक झूठे सौदे का खुलासा किया। एसईसी ने 2020 में कार्रवाई की। कंपनी और उसके सीईओ पर निवेशकों को गुमराह करने के आरोप लगे।
सोरेंटो फार्मास्यूटिकल्स (2020), अमेरिका: महामारी से लाभ कमाने के झूठे दावों के आरोपों ने सोरेंटो को 2023 में दिवालिया घोषित करा दिया।
निकोला कॉरपोरेशन (2020), अमेरिका: हिंडनबर्ग की रिपोर्ट ने निकोला की धोखाधड़ी को उजागर किया, जिसमें एक नकली प्रमोशनल वीडियो शामिल था। इसके चलते संस्थापक को इस्तीफा देना पड़ गया। उसके ऊपर आपराधिक मुकदमे चले और 2022 में दोषी ठहराया गया।
जेऐंडजे पर्चेजिंग (2022), अमेरिका: हिंडनबर्ग ने छिपे हुए सर्विलांस फुटेज का उपयोग करके एक 40 करोड़ डॉलर की पोंजी योजना को उजागर किया। इसमें एफबीआई और एसईसी ने कार्रवाइयाँ की।
इबिक्स इंक (2022 – 2023), अमेरिका: हिंडनबर्ग ने इबिक्स के बढ़े राजस्व और कर्ज पर चेतावनी जारी की। बाद में कंपनी दिवालिया हो गयी।
आईकान एंटरप्राइजेज (2023 – 2024), अमेरिका: इस कंपनी पर खुदरा निवेशकों को गुमराह करने का आरोप लगा। इसके कारण 2024 में एसईसी ने अघोषित ऋणों के आरोप लगाए और 20 लाख डॉलर का जुर्माना लगाया।
वैग्स कैपिटल (2024), अमेरिका: हिंडनबर्ग ने कंपनी द्वारा गलत जानकारी देने और निवेशकों के फंड का गलत उपयोग करने का खुलासा किया। मामले में नवंबर 2024 में इसके प्रमुख अधिकारियों की गिरफ्तारी हुई।