अक्षत मित्तल
Financial Year 2021-22 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) को लेकर हाल ही में एनएसओ द्वारा जारी किए गए आंकड़े बताते हैं कि इस अवधि में भारतीय अर्थव्यवस्था ने पिछले साल की इसी तिमाही के मुकाबले 20.1 प्रतिशत की रिकॉर्ड बढ़त दर्ज की है। पिछले साल अप्रैल-जून तिमाही में लगे कोविड-19 लॉकडाउन ने आर्थिक गतिविधियों को पूरी तरह से रोक दिया था, जिसके कारण उस वक्त सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में अब तक की सबसे बड़ी 24.4 प्रतिशत की गिरावट देखी गई थी।
गौर करने वाली बात यह है कि मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही की यह उच्च विकास दर, अप्रैल-मई में अपने चरम पर पहुंची महामारी की भयानक दूसरी लहर के बावजूद आई है। अर्थव्यवस्था के क्षेत्रों की बात करें तो विनिर्माण और निर्माण क्षेत्र अप्रैल-जून में क्रमशः 49.63 प्रतिशत और 68.3 प्रतिशत बढ़े। हालांकि सेवाएं, विशेष रूप से संपर्क-गहन क्षेत्र, समस्याओं में घिरे दिखाई दिए। व्यय की बात करने पर हम पाएंगे कि, निजी अंतिम उपभोग व्यय (पीएफसीई) यानी हमारे-आप के जैसे आम व्यक्ति के द्वारा किया गया खर्च, 19.34 प्रतिशत बढ़ा, और सकल स्थायी पूंजी निर्माण यानी निजी निवेश 55.26 प्रतिशत तक बढ़ गया।
समझने वाली बात यह है कि यह तेज बढ़त असल में 2020-21 की पहली तिमाही के निम्न आधार (लो बेस) के कारण आई है। विनिर्माण और निर्माण दोनों क्षेत्र अभी भी 2019-20 के पूर्व-कोविड स्तर तक नहीं पहुंचे हैं।
दूसरी तरफ उपभोक्ता खर्च और निजी निवेश– 2019-20 की पहली तिमाही की तुलना में अभी भी क्रमशः 11.9 प्रतिशत और 17.09 प्रतिशत कम है। जीडीपी के आंकड़ों से पता चलता है कि ‘कृषि, वानिकी और मतस्य’; और ‘बिजली, गैस, पानी की आपूर्ति और अन्य उपयोगिता सेवाओं‘ जैसे क्षेत्र पूर्व-कोविड वर्ष के स्तर से ऊपर हैं। अप्रैल-जून 2019-20 की तुलना में कृषि और बिजली क्षेत्रों में क्रमशः 8.21 प्रतिशत और 3 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
हालांकि अर्थशास्त्रियों का कहना है कि, अप्रैल-जून तिमाही में जीडीपी आरबीआई के 21.4 प्रतिशत के बढ़त के अनुमान से नीचे है, इसलिए बहुत संभव है कि आरबीआई नीतिगत दरों पर यथास्थिति बनाए रखे। जरूरी यह है कि एक पूर्ण आर्थिक सुधार के लिए राजकोषीय और मौद्रिक दोनों नीतियों के समर्थन की आवश्यकता होगी।
बात करें सरकार के अंतिम उपभोग व्यय की, तो यह अप्रैल-जून तिमाही में 4.21 लाख करोड़ रुपये रहा, जो एक साल पहले की अवधि में 4.42 लाख करोड़ रुपये से कम था, लेकिन अप्रैल-जून 2019-20 में 3.92 लाख करोड़ रुपये से अधिक था।
सकल मूल्य वर्धित (जीवीए) की बात करें जो आपूर्ति में वृद्धि को दर्शाता है, तो हम पाएंगे कि इसमें इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 18.8 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। पिछले वर्ष की पहली तिमाही में इसमें 22.4 प्रतिशत का संकुचन देखा गया था। नॉमिनल जीडीपी वृद्धि दर, अप्रैल-जून में 31.7 प्रतिशत रही, जो पिछले साल के 22.3 प्रतिशत घटी थी। इसके अलावा आंकड़े बताते हैं कि, आठ प्रमुख उद्योगों का उत्पादन जुलाई में 9.4 प्रतिशत बढ़ा, जो एक साल पहले इसी महीने में 7.6 प्रतिशत गिरा था। आंकड़े यह भी बताते हैं कि जुलाई के अंत में केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा 3.21 लाख करोड़ रुपये या बजट अनुमान का 21.3 प्रतिशत हो चुका था। हालांकि इस वित्त वर्ष में बजटीय घाटे के आंकड़े पिछले वित्त वर्ष की तुलना में काफी बेहतर नजर आ रहे हैं।
अगर पिछले वित्त वर्ष की पहली तिमाही समान्य स्थितियों से गुजरी होती, तो इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही के यह आंकड़े चमत्कार से ऊपर की बात होते। लेकिन क्योंकि पिछले वित्त वर्ष की पहली तिमाही भारत के इतिहास की सबसे खराब तिमाही थी, इसलिए यह आंकड़े बहुत उत्साह का विषय नही हैं। सवाल यह कि आखिर इन आंकड़ों को ऐसी असामान्य स्थिति में कैसे देखना चाहिए? एक सामान्य स्थिति में यह आंकड़े हमें भारत की अर्थतांत्रिक स्थिति का अंदाजा दे सकते थे। लेकिन कोविड महामारी से प्रभावित भारतीय अर्थव्यवस्था की सेहत को परखने के लिए हमें कुछ चीजों पर ध्यान देना होगा। सबसे पहले तो इस तिमाही में हमें प्रतिशत के खेल से ऊपर उठना होगा और इस तिमाही की तुलना पिछले साल की जगह, वित्त वर्ष 2020 की पहली तिमाही से करनी होगी। दूसरा हमें यह देखना होगा कि क्या अर्थव्यवस्था में निजी खपत की मांग बढ़ी है और क्या सरकार ज्यादा खर्च कर अर्थव्यवस्था को समर्थन दे रही है? तीसरा सबसे जरूरी काम हर क्षेत्र का जीवीए देखना होगा। अर्थतंत्र की सेहत को परखने का चौथा कारक यह देखना होगा कि क्या जीडीपी वृद्धि दर जीवीए वृद्धि दर से अधिक है? और अंत में हमें साल-दर-साल की जगह तिमाही-दर-तिमाही वृद्धि दर पर भी नजर डालनी होगी।
सबसे पहला सवाल तो यह कि क्या भारतीय अर्थव्यवस्था ने सच में एक “वी (V) शेप“ की रिकवरी दर्ज की है? नहीं, "निम्न आधार प्रभाव" से लाभान्वित होने वाली अर्थव्यवस्था और वी (V)-आकार की रिकवरी दर्ज करने
वाली अर्थव्यवस्था के बीच अंतर है। वी (V)-आकार की रिकवरी के लिए अर्थव्यवस्था की पूर्ण जीडीपी को संकट से पहले के स्तर पर वापस लाने की आवश्यकता होती है। कुल जीडीपी और ल जीवीए के आंकड़े कुछ और ही खेल बयां करते हैं। इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भारत का कुल उत्पादन (चाहे जीडीपी या जीवीए किसी भी माध्यम से मापा गया हो), वह 2019-20 की पहली तिमाही (महामारी से पहले का वर्ष) के आस-पास भी नहीं है। वास्तव में, दोनों चर बताते हैं कि भारत का उत्पादन स्तर 2017-18 के स्तर के करीब है। दूसरे शब्दों में, भारत ने इस वर्ष पहली तिमाही में उतनी ही मात्रा में वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन किया जितना चार साल पहले की पहली तिमाही में किया था। जीडीपी और जीवीए में उच्च वृद्धि प्रतिशत के संदर्भ में है, यह देखने में अच्छा लगता है लेकिन पिछले वर्ष की पहली तिमाही के निम्न आधार के कारण असल में यह एक सांख्यिकीय भ्रम हैं।
उदाहरण के लिए, यदि आप के पास 1000 रुपए हैं और उसमें 24 प्रतिशत रुपए कम हो गए, तो आप पास अब 760 रुपए ही बचे। अगले साल आप के इन 760 रुपए में 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई, तो अब आप पास 912 रुपए हो गए। सरल में कहें तो आपके पास अभी भी अपनी पूर्व स्थिति से 88 रुपए कम हैं। प्रतिशत का यही खेल बस आम-जनमानस को चकमा दे देता है। ठीक वैसे ही हमारी अर्थव्यवस्था जो पिछले वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 24.4 प्रतिशत संकुचित हुई थी, और इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 20.1 प्रतिशत की दर से बढ़ी, वो अभी भी कोविड पूर्व स्थिति में नहीं पहुंची है।
दूसरा सबसे महत्वपूर्ण काम निजी उपभोग व्यय और सरकारी व्यय को देखना होगा। जैसा कि जीडीपी के आंकड़े बताते हैं, निजी मांग, विकास का सबसे बड़ा इंजन है, जो मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही में लगभग उसी स्तर पर है जहां वो 2017-18 में था। अब बात सरकार की, जो हम पर कर लगाती है और सब्सिडी भी देती है। यह उल्लेखनीय है कि सरकारी व्यय वास्तव में पिछले वर्ष के स्तर से नीचे गिर गया है। यह भविष्य के विकास को धीमा कर सकता है। ऐसे समय में जब अन्य सभी क्षेत्र मांग पैदा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, सरकार से अपेक्षा की जाती है कि वह “काउंटर-साइक्लिकल” राजकोषीय नीति का सहारा लेगी और सामान्य से अधिक खर्च करेगी। बात करें व्यवसायिक निवेश की, जो अर्थव्यवस्था का दूसरा सबसे बड़ा इंजन है, वह भी 2018-19 के स्तर पर है। क्योंकि भारत निर्यात से ज्यादा आयात करता, इसलिए वो इंजन भारतीय अर्थव्यवस्था का चौथा और सबसे छोटा इंजन है।

तीसरा सबसे जरूरी काम हर क्षेत्र का जीवीए देखना होगा। इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में, केवल दो क्षेत्रों- कृषि आदि और बिजली और अन्य उपयोगिताओं का ही जीवीए 2019-20 की तुलना में अधिक था। लेकिन सबसे चिंताजनक बात यह है कि ‘व्यापार, होटल, परिवहन, संचार और प्रसारण से जुड़ी सेवाओं’ और ‘निर्माण’ का जीवीए 2017-18 की तुलना में भी कम है। सनद रहे कि ये दो क्षेत्रों ने अतीत में अकुशल और कुशल दोनों श्रमिकों के लिए बहुत सारी नौकरियां पैदा की हैं।

चौथे कारक में हमें देखना होगा कि क्या जीडीपी वृद्धि दर जीवीए वृद्धि दर से अधिक है? जीडीपी और जीवीए का अंतर समझते हैं। जीडीपी = (जीवीए) + (सरकार द्वारा अर्जित कर) – (सरकार द्वारा प्रदान की जाने वाली सब्सिडी), असल में इन दो पूर्ण मूल्यों के बीच का अंतर अर्थव्यवस्था में सरकार द्वारा निभाई गई भूमिका को दर्शाता है। यदि सरकार सब्सिडी पर खर्च की तुलना में करों से अधिक अर्जित करती है, तो जीडीपी जीवीए से अधिक होगा। दूसरी ओर, यदि सरकार अपने कर राजस्व से अधिक सब्सिडी प्रदान करती है, तो जीवीए का पूर्ण स्तर जीडीपी के पूर्ण स्तर से अधिक होगा। वर्तमान स्थिति में जीडीपी दर जीवीए दर से अधिक है, इसका अर्थ है कि सरकार अर्थव्यवस्था को उतना समर्थन नहीं दे रही है जितना अर्थव्यवस्था को जरूरत है।
अंत में हम जीडीपी वृद्धि दर को तिमाही-दर-तिमाही के हिसाब से देखते हैं। बेशक हमने यह तिमाही में पिछले वर्ष की पहली तिमाही के मुकाबले 20.1 प्रतिशत की वृद्धि दर दर्ज की है लेकिन अगर हम मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही कि तुलना पिछले वित्त वर्ष की अंतिम तिमाही (चौथी तिमाही, वित्त वर्ष 2021) से करें तो पाएंगे कि इस तिमाही में असल में हमने पिछली तिमाही के मुकाबले 16.9 प्रतिशत का संकुचन या गिरावट देखी है। अगर हम वित्त वर्ष 2020 की पहली तिमाही से इस तिमाही की तुलना करें तो अभी भी हम उस स्तर से 9.2 प्रतिशत नीचे हैं।