अक्षत मित्तल
सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (एमओएसपीआई) द्वारा जारी हालिया आंकड़े बताते हैं कि इस वित्त वर्ष की दूसरी (जुलाई-सितंबर) तिमाही में भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 7.5 प्रतिशत की गिरावट आई है। इससे पिछली तिमाही में गिरावट 23.9 प्रतिशत की थी। इसके साथ ही भारतीय अर्थव्यवस्था ने पहली बार तकनीकी मंदी में प्रवेश किया है। अर्थशास्त्र में, जब जीडीपी की वृद्धि दर लगातार दो तिमाहियों या उससे अधिक के लिए नकारात्मक होती है तो इसे मंदी कहा जाता है।
इससे पहले अप्रैल-जून तिमाही के दौरान जीडीपी में जो 23.9 प्रतिशत की गिरावट आई थी वह भारतीय अर्थव्यवस्था के इतिहास में सबसे बुरी गिरावट थी, जिसका मुख्य कारण कोविड-19 के रोकथाम के लिए लगा एक सख्त राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन था। हाल ही में आरबीआई के गवर्नर शक्तिकांत दास ने कहा है कि अर्थव्यवस्था ने रिकवरी में उम्मीद से ज्यादा तेजी दिखाई है, लेकिन उन्होंने मांग की स्थिरता को लेकर चेतावनी दी है। दिलचस्प बात यह है कि आरबीआई ने कहा था कि इस तिमाही के लिए जीडीपी 8.6 प्रतिशत की नकारात्मक दर दर्ज करेगी। आरबीआई ने यह उम्मीद भी जताई है कि इस वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में विकास दर सकारात्मक हो जाएगी।
इसके अलावा सरकारी आंकड़े बताते हैं कि दूसरी तिमाही में सकल मूल्य वर्धित (जीवीए) 2011-12 के मूल्यों के आधार पर 7.0 प्रतिशत घटा है। मौजूदा कीमतों पर जीवीए की कीमत इस तिमाही 4.2 प्रतिशत घट गई है।इसके अलावा इस तिमाही में विनिर्माण उद्योग में 0.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई जिसमें पिछली तिमाही 39.3 प्रतिशत की गिरावट देखी गई थी। इसी तरह, बिजली, गैस, पानी की आपूर्ति और अन्य उपयोगिता सेवाओं के सेगमेंट में पिछली तिमाही में 7 प्रतिशत की गिरावट थी जिसने इस बार 4.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है। कृषि, वानिकी और मत्स्य उद्योग में दूसरी तिमाही में 3.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो पिछली तिमाही जैसी ही है। इसके अलावा होटल, परिवहन, संचार और सेवाएं इस तिमाही 15.6 प्रतिशत गिरीं और निर्माण क्षेत्र में भी 8.6 प्रतिशत का संकुचन दर्ज किया गया। सरल में समझें तो भारतीय अर्थव्यवस्था दिसंबर 2017 वाली स्थिति में पहुंच चुकी है।
हालांकि यह बात तो सच है कि भारतीय अर्थव्यवस्था ने कुछ तेजी पकड़ी है, लेकिन जैसा अर्थशास्त्री कहते हैं कि इसपर अभी कोई निर्णय पर पहुंचना सही नहीं होगा। इस पर अभी से कुछ कहना जॉन केनेथ गैलब्रेथ की बात को सच कर देगा, जिन्होंने कहा था कि दो तरह के भविष्यवक्ता होते हैं- पहले जो कुछ नहीं जानते और दूसरे जो यह नहीं जानते कि वे कुछ नहीं जानते। जहां एक तरफ हम आशावादी बात कर रहें हैं वहीं हमें यह भी याद रखना चाहिए कि आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा अब बढ़कर 9.53 लाख करोड़ रुपये जितना ज्यादा हो गया है, जो इस वित्त वर्ष के अक्टूबर के अंत में वार्षिक बजट अनुमान का लगभग 120 प्रतिशत है।
इसी के साथ एक व्यापक उम्मीद का जन्म हो चुका है कि भले ही भारतीय अर्थव्यवस्था इस वित्त वर्ष में 10 प्रतिशत कम हो, लेकिन यह शायद अगले वित्त वर्ष में लगभग उसी प्रतिशत की वृद्धि दर्ज करे, लेकिन यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि ऐसे स्टार्क संकुचन और विकास के समय में, किसी को न केवल जीडीपी की वृद्धि दर पर ध्यान देना चाहिए, बल्कि जीडीपी के पूर्ण स्तर (रियल या अब्सोल्यूट) जीडीपी पर भी ध्यान देना चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि किसी अर्थव्यवस्था का जीडीपी 10 प्रतिशत घटा और 100 से 90 पर आ गया। इसके बाद वह वर्ष 1 में और फिर वर्ष 2 में 10 प्रतिशत बढ़कर 90 से 99 तक हो जाता है, तो दूसरे वर्ष के अंत में, जीडीपी का पूर्ण स्तर अभी भी दो साल पहले की तुलना में कम होगा।
ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स ने भारतीय अर्थव्यवस्था के साथ कुछ ऐसा ही होने की बात कही है। इसके मुताबिक भारत की संभावित वृद्धि दर 2020-25 के बीच औसत 4.5 प्रतिशत रहने की संभावना है, जो पहले के पूर्वानुमान में 6.5 प्रतिशत थी। सनद रहे कि 1992 में आर्थिक उदारीकरण के बाद से औसत वार्षिक वृद्धि (6.8 प्रतिशत) की तुलना में 6.5 प्रतिशत दर पहले से ही कम है। ऑक्सफोर्ड के अनुसार इस गिरावट का मुख्य कारण भारत की कमजोर राजकोषीय प्रतिक्रिया है। दूसरे शब्दों में, क्योंकि भारत सरकार ने अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए प्रत्यक्ष रूप से पर्याप्त खर्च नहीं किया है, इसलिए रिकवरी धीमी होगी। ठीक कहते थे फ़्रांसिस बेकन कि आशावाद एक अच्छा नाश्ता हो सकता है, लेकिन इससे पेट नहीं भरता।