विश्लेषण / अक्षत मित्तल
अंतरराष्ट्रीय विज्ञान के छात्रों के लिए मध्य-पूर्व का इजरायल-फ़लस्तीन विवाद (Israel-Palestine Crisis) संभवतः सबसे रोचक विषयों में से एक होगा। यह विवाद दो देशों के बीच चलने वाला सबसे लंबा विवाद है। हाल ही में यह विवाद फिर बढ़ गया जिसके कारण सीज़फायर ना लागू होने तक गाजा से लेकर पूर्वी यरुशलम तक भरसक तबाही हुई। लेकिन अपनी समस्याओं से घिरे भारत के आंतरिक दृष्टिकोण से इस वक्त शायद यह मामला इतना मायने नहीं रखता। हालांकि, मायने रखता है भारत का फ़लस्तीन से पुराना दोस्ताना और इजरायल के साथ स्थापित होता नया रिश्ता।
शायद इसी वजह से संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि टीएस तिरुमूर्ति ने पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में इजरायल-फ़लस्तीन के मध्य बढ़ती हिंसा पर “खुली बहस” में एक सावधानीपूर्वक तैयार किया गया बयान दिया, जिसमें फ़लस्तीन के साथ भारत के ऐतिहासिक संबंधों और इजरायल के साथ खिलते संबंधों के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया गया। हमारे लिए यह जानना ज्यादा जरूरी है कि भारत के इजरायल और फ़लस्तीन के साथ कैसे संबंध हैं और भारत के नज़रिये से इस मसले का अंतरराष्ट्रीय गणित क्या है? दरअसल एक स्वतंत्र देश बनने के वक़्त में भारत और इजरायल के बीच महज नौ महीने का फ़र्क़ है। 15 अगस्त, 1947 को भारत एक स्वतंत्र देश बना तो 14 मई, 1948 को इजरायल।

अरब देशों की कड़ी आपत्ति के बीच इजरायल का जन्म एक स्वतंत्र देश के रूप में हुआ था। इजरायल को दुनिया भर में अपने अस्तित्व की स्वीकार्यता हासिल करने के लिए काफ़ी संघर्ष करना पड़ा है। 14 मई, 1948 को इजरायल की घोषणा हुई और उसी दिन संयुक्त राष्ट्र संघ ने उसे मान्यता दे दी। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी एस ट्रूमैन ने भी इजरायल को उसी दिन मान्यता दे दी। डेविड बेन ग्युरियन इजरायल के पहले प्रधानमंत्री बने। ग्युरियन को ही इजरायल का संस्थापक भी कहा जाता है। उस वक्त भारत इजरायल के गठन के ख़िलाफ़ था। भारत को फ़लस्तीन में इजरायल का बनना रास नहीं आया और उसने संयुक्त राष्ट्र में इसके ख़िलाफ़ वोट किया था। भारत उन 13 देशों में एकमात्र गैर-अरब-राष्ट्र था, जिसने संयुक्त राष्ट्र महासभा में फ़लस्तीन की विभाजन योजना के खिलाफ मतदान किया था।
संयुक्त राष्ट्र ने इजरायल और फ़लस्तीन, दो राष्ट्र बनाने का प्रस्ताव पास किया और इसे दो तिहाई बहुमत मिला। दरअसल 2 नवंबर 1917 को बलफोर घोषणापत्र आया था। यह घोषणापत्र ब्रिटेन की तरफ़ से था, जिसमें कहा गया था कि फ़लस्तीन में यहूदियों का नया देश बनेगा। इस घोषणापत्र का अमरीका ने भी समर्थन किया था। हालांकि बाद में अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलीन डी रुजवेल्ट ने 1945 में आश्वासन दिया था कि अमरीका अरबी लोगों और यहूदियों से परामर्श के बिना किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं करेगा। भारत के इजरायल के गठन के खिलाफ होने के अपने कारण थे, मसलन धार्मिक आधार पर भारत का अपना विभाजन, फ़लस्तीनीयों के बेदखल किए जाने का डर,कश्मीर पर भारत को अलग-थलग करने की पाकिस्तान की योजना को विफल करना और बाद में, अरब देशों पर भारत की ऊर्जा निर्भरता और भारत के अपने मुस्लिम नागरिकों की भावनाएं।
आख़िरकार, भारत ने 17 सितंबर, 1950 को आधिकारिक रूप से इजरायल को एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता दे दी, लेकिन लंबे समय तक, द्विपक्षीय संबंधों के लिए केवल 1953 में स्थापित मुंबई में एक वाणिज्य दूतावास था, जो मुख्य रूप से भारतीय यहूदी समुदाय और ईसाई तीर्थयात्रियों को वीजा जारी करने के लिए था। यह भी 1982 में बंद हो गया, जब भारत ने एक अखबार के साक्षात्कार में भारत की विदेश नीति की आलोचना करने के लिए महावाणिज्य दूत को निष्कासित कर दिया। इसके छह साल बाद इसे फिर से खोलने की अनुमति दी गई। भारत ने 1992 तक इजरायल के साथ राजनयिक संबंधों को बहाल नहीं किया। भारत और नेहरू का रुख़ इस मामले में गोपनीय नहीं था। तब नेहरू को दुनिया के जाने-माने वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन (जो खुद एक यहूदी थे) ने चिट्ठी लिखकर इजरायल के समर्थन में वोट देने की अपील की थी। हालांकि आइंस्टाइन की बात को भी नेहरू ने स्वीकार नहीं किया था।

लेकिन साल 1992 में भारत ने इजरायल के साथ संबंधों को सामान्य करना शुरु किया, इसका प्रमुख कारण सोवियत संघ का विघटन और 1990 में प्रथम खाड़ी युद्ध के कारण पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में बड़े पैमाने पर आया बदलाव था। दूसरी तरफ फ़लस्तीनी लिबरेशन ऑर्गनाइज़ेशन (पीएलओ) ने कुवैत के कब्जे में इराक और सद्दाम हुसैन का साथ देकर अरब दुनिया में अपना अधिकांश प्रभाव खो दिया। दरअसल 1970 के दशक में, भारत ने पीएलओ और उसके नेता यासर अराफात को फ़लस्तीनीयों का एकमात्र वैध प्रतिनिधि मान लिया था।
जनवरी 1992 में तेल अवीव में एक भारतीय दूतावास का उद्घाटन हुआ और चार दशकों से इजरायल से ठंडे पड़े रिश्तों में गरमाहट आ गई। वर्ष 1992 से अब तक, भारत-इजरायल संबंध विशेषकर रक्षा सौदों, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और कृषि जैसे क्षेत्रों के माध्यम से बढ़ते रहे, लेकिन भारत ने कभी भी इस रिश्ते को पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया। इस दौरान कुछ हाई-प्रोफाइल यात्राएं हुईं। साल 2000 में, एल. के. आडवाणी इजरायल की यात्रा करने वाले पहले भारतीय मंत्री बने, और उसी वर्ष जसवंत सिंह विदेश मंत्री के रूप में वहां गए। इसके बाद 2003 में, एरियल शेरोन भारत की यात्रा करने वाले पहले इजरायली प्रधानमंत्री बने। यूपीए के 10 साल के कार्यकाल के दौरान फ़लस्तीन और इजरायल के बीच संतुलन बनाने का काम तेज हो गया।
2015 में प्रणब मुखर्जी इजरायल की यात्रा करने वाले पहले भारतीय राष्ट्रपति बने और फिर फरवरी 2018 में, मोदी इजरायल की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री।
फ़लस्तीन के साथ ऐतिहासिक दोस्ती
फ़लस्तीन के साथ संबंध लगभग चार दशकों तक भारतीय विदेश नीति में आस्था का विषय था। संयुक्त राष्ट्र के 53वें सत्र में, भारत ने फ़लस्तीनियों के आत्मनिर्णय के अधिकार के मसौदा प्रस्ताव को सह-प्रायोजित किया था। वर्ष 1967 और 1973 के युद्धों में भारत ने इजरायल को आक्रमणकारी करार दिया था।
वर्ष 1975 में, भारत पीएलओ को फ़लस्तीनी लोगों के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में मान्यता देने वाला पहला गैर-अरब देश बन गया, और पीएलओ को दिल्ली में एक कार्यालय खोलने के लिए आमंत्रित किया, जिसे पांच साल बाद राजनयिक दर्जा दिया गया। वर्ष 1988 में, जब पीएलओ ने पूर्वी यरुशलम में अपनी राजधानी के साथ फ़लस्तीन के एक स्वतंत्र राज्य की घोषणा की, तो भारत ने उसे तुरंत मान्यता दे दी। यासर अराफात जब भी भारत आते थे, उन्हें राष्ट्राध्यक्ष के रूप में ही रिसीव किया जाता था।
नरसिम्हा राव सरकार द्वारा तेल अवीव में एक राजनयिक मिशन की स्थापना के चार साल बाद, भारत ने गाजा में एक प्रतिनिधि कार्यालय खोला जिसे बाद में रामल्लाह में स्थानांतरित कर दिया गया। इसका कारण हमास (जिसने गाजा पर नियंत्रण प्राप्त किया) और पीएलओ के बीच फ़लस्तीनी आंदोलन के विभाजित होना था। नई दिल्ली पीएलओ के पक्ष में मजबूती से बनी रही, पीएलओ राजनीतिक समाधान के लिए तैयार था, और इसने दो-राज्य समाधान को स्वीकार कर लिया था।
भारत ने अक्टूबर 2003 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया जो इजरायल द्वारा एक अलग दीवार के निर्माण के खिलाफ मतदान था। भारत ने 2011 में फ़लस्तीन को यूनेस्को का पूर्ण सदस्य बनाने के हक़ में वोट दिया, और इसके एक साल बाद, भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव को सह-प्रायोजित किया, जिसने फ़लस्तीन को मतदान के अधिकार के बिना संयुक्त राष्ट्र का “गैर-सदस्य” पर्यवेक्षक राज्य बनाया। भारत ने सितंबर 2015 में संयुक्त राष्ट्र परिसर में फ़लस्तीनी ध्वज की स्थापना का भी समर्थन किया।
इजरायल के साथ खिलते रिश्ते
भारत ने 1992 में इजरायल के साथ राजनयिक संबंधों को बहाल किया। इसके बाद से फ़लस्तीन को अनदेखा किए बिना इजरायल के साथ रिश्तों को सुधारने की कोशिश जारी रही। 1992 में तेल अवीव में एक भारतीय दूतावास का उद्घाटन हुआ। इसके बाद साल 2000 में दोनों देशों ने एक संयुक्त आतंकवाद विरोधी आयोग का गठन किया। सनद रहे कि इसी साल एल. के. अडवाणी इजरायल दौरा करने वाले पहले भारतीय मंत्री बने थे। यूपीए के कार्यकाल के दौरान फ़लस्तीनी प्राधिकरण के प्रमुख महमूद अब्बास ने 2005, 2008, 2010 और 2012 में भारत का दौरा किया।
एनडीए-2 के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने इजरायल के साथ संबंधों का पूर्ण मान्यता देने का फैसला किया। इस बदलाव का पहला संकेत भारत द्वारा संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में एचआरसी उच्चायुक्त की एक रिपोर्ट के प्रस्ताव के दौरान वोट ना करने पर आया। रिपोर्ट में कहा गया था कि उसके पास 2014 में गाजा के खिलाफ हवाई हमले के दौरान इजरायली बलों और हमास द्वारा किए गए कथित युद्ध अपराधों के सबूत हैं, जिसमें 2000 से अधिक लोग मारे गए थे। वोट ना करना संदेह का विषय था, क्योंकि 2014 में, भारत ने उस प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया था जिसके माध्यम से यूएनएचआरसी जांच स्थापित की गई थी। वर्ष 2016 में, भारत ने इजरायल के खिलाफ यूएनएचआरसी के एक प्रस्ताव पर फिर से भाग नहीं लिया।
बड़ा बदलाव उस ऐतिहासिक शहर पर भारत की प्रतिक्रिया थी, जिस पर इजरायल और फ़लस्तीन दोनों दावा करते हैं- पूर्वी यरुशलम। वर्ष 2017 में पीएलओ प्रमुख महमूद अब्बास की नई दिल्ली की यात्रा महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत बन गई। तब तक, विभिन्न बयानों में, “दो-राज्य समाधान” के प्रति अपने समर्थन के साथ, भारत ने हमेशा पूर्वी यरुशलम को एक फ़लस्तीनी राज्य की राजधानी स्वीकार किया था। लेकिन अब्बास की इस यात्रा के दौरान मोदी के बयान में पूर्वी यरुशलम का जिक्र नहीं था। प्रणब मुखर्जी, जो 2015 में (रामल्लाह में पहला पड़ाव) इजरायल की यात्रा करने वाले पहले भारतीय राष्ट्रपति बने, उन्होंने भी एक स्वतंत्र फ़लस्तीन की राजधानी के रूप में शहर पर भारत की स्थिति को दोहराया था।
फरवरी 2018 में, जब मोदी इजरायल की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने, तब उनकी यात्रा कार्यक्रम में रामल्लाह शामिल नहीं था। प्रधानमंत्री ने तब कहा था कि भारत ने इजरायल-फ़लस्तीन संबंधों को “डी-हाइफेनेटेड” कर दिया है, और भारत दोनों के साथ अलग-अलग बात करेगा।
दोनों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश
भारत ने अब भी इजरायल-फ़लस्तीन मुद्दे पर एक संतुलन बनाने की कोशिश जारी रखी है। उदाहरण के लिए, दिसंबर 2017 में यूनेस्को में अनुपस्थित रहने के बावजूद, भारत ने ट्रम्प प्रशासन द्वारा यरुशलम को इजरायल की राजधानी के रूप में मान्यता देने के विरोध में महासभा में आये एक प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया था।

इस साल की शुरुआत में जिनेवा में यूएनएचआरसी के 46वें सत्र में, भारत ने तीन प्रस्तावों में इजरायल के खिलाफ मतदान किया था। इन तीन प्रस्तावों में फ़लस्तीनी लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार, इजरायली समझौता नीति, और तीसरा गोलान में मानवाधिकार की स्थिति जैसे प्रस्ताव शामिल थे। जबकि चौथे प्रस्ताव जिसमें पूर्वी यरुशलम सहित फ़लस्तीन में मानवाधिकार की स्थिति पर यूएनएचआरसी की रिपोर्ट थी, उस पर भारत ने मतदान नहीं किया था।
फरवरी में, इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट ने वेस्ट बैंक और गाजा सहित फ़लस्तीनी क्षेत्र में मानवाधिकारों के हनन की जांच करना अपने अधिकार क्षेत्र का हिस्सा बताया और इजरायली सुरक्षा बलों और हमास दोनों को अपराधियों के रूप में नामित किया। इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू चाहते थे कि भारत इस मुद्दे पर आईसीसी के खिलाफ एक स्टैंड ले, लेकिन भारत के ऐसा ना करने पर वह हैरान हुए। ऐसा इसलिए क्योंकि भारत इन दोनों देशों के बीच एक संतुलनकारी रणनीति चाहता है। भारत का इजरायल-फ़लस्तीन के ताजा विवाद पर बयान भी इससे अलग नहीं है। हालांकि यह बयान फ़लस्तीन समर्थक नहीं था, लेकिन इसने शायद ही इजरायल को प्रसन्न किया हो।
शुरुआत में भारत के फ़लस्तीन का साथ देने और अरब देशों से लगाव के अपने कारण थे, जो गलत भी नहीं थे। लेकिन इस विश्वास को उस वक़्त झटका लगा जब 1965 और 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध में भारत को अरब देशों का साथ नहीं मिला और उन देशों ने एक इस्लामिक देश पाकिस्तान का साथ दिया।