अक्षत मित्तल
मैंने अपने कई लेख महंगाई और अर्थव्यवस्था पर लिखे हैं। एक बात तो साफ है कि इतिहास के किसी भी कालखंड में यह कल्पना नहीं की गई होगी कि भारत में लोग 90 रुपये लीटर पेट्रोल खरीदेंगे, जबकि कच्चे तेल की कीमत मंदी से जूझ रही होगी। सच कहते थे थॉमस जेफरसन कि हमारा कुल इतिहास सरकारों की सूझबूझ का लेखा-जोखा है। आज इस लेख में आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण दो मुद्दों पर चर्चा होगी। पहला- महंगाई और दूसरा बढ़ती बाल कुपोषण की समस्या।
इस महामंदी के बीच भारत में बढ़ती कीमतें मंदी के प्रभाव को और तीव्र बनाए दे रही हैं। आर्थिक उत्पादन के आंकड़े मांग की तबाही के सबूत हैं, बेरोजगारी बढ़ रही है और वेतन घट रहे हैं फिर भी खुदरा महंगाई छह माह के अपने सर्वोच्च स्तर पर है। सीमेंट छह महीने में 7 प्रतिशत (दक्षिण भारत में 18 प्रतिशत) महंगा हो चुका है। दो माह में मिल्क पाउडर की कीमतें 20 प्रतिशत बढ़ी हैं यानी पैकेट बंद दूध महंगा होने जा रहा है। फोन दरों में भी कई कंपनियों ने 6 से 8 प्रतिशत की बढोतरी की है। चौथी बार मोबाइल फोन सेट की कीमत बढ़ने वाली है। डीजल महंगा होने से ट्रकों के किराये 10-12 प्रतिशत तक बढ़ गये हैं।
इसके अलावा पिछले छह महीने में स्टील 30 प्रतिशत, एल्युमिनियम 40 प्रतिशत और तांबा 70 प्रतिशत तक महंगा हुआ है। दरअसल मांग की कमी के बावजूद भी कीमतें इसलिए बढ़ रही हैं क्योंकि कंपनियों को अर्थव्यवस्था में ग्रोथ जल्दी लौटने की उम्मीद नहीं है। लिहाजा जो बिक रहा है, उसे महंगा कर घाटे कम किए जा रहे हैं और इसे आर्थिक मूल्यवृद्धि कहा जा रहा है। दूसरी तरफ बहुत सारे उत्पादों पर इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाकर और आयात में सख्ती से सरकार ने लागत बढ़ा दी है। जीएसटी के मासिक संग्रह में दिख रही बढ़त बिक्री नहीं, कीमतें बढ़ने से आई है, क्योंकि अधिकांश उत्पादों पर मूल्यानुसार टैक्स लगता है।
आने वाले समय में हो सकता है कि जीएसटी का घाटा पूरा करने के लिए सरकार ने जो कर्ज लिया है, उसे चुकाने के लिए राज्य-स्तरीय टैक्स एवं बिजली-पानी की दरें बढ़ जाएं। क्रिसिल के मुताबिक अगर खुदरा महंगाई एक प्रतिशत बढ़े तो जीने की लागत 1.53 लाख करोड़ रुपये बढ़ जाती है। वहीं खाद्य महंगाई के एक प्रतिशत बढ़ने से खाने पर खर्च करीब 0.33 लाख करोड़ रुपये बढ़ जाता है। शायद यह समझना मुश्किल नहीं कि कम आय वाले लोग महंगाई से किस कदर गरीब हो रहे होंगे। सोने पे सुहागा यह कि बचत पर भी हम कमा नहीं, गंवा रहे हैं क्योंकि बैंकों में एफडी पर औसत ब्याज दर (4.5-5.5 फीसद) महंगाई दर से करीब दो से ढाई फीसद कम है।
यह तो रही मंहगाई की बात। अब उस ज़हर पर बात करते हैं जो धीमे-धीमे देश की अर्थव्यवस्था को खोखला कर रहा है- बाल कुपोषण। वर्ष 2012 के एक अध्ययन के परिणामों के अनुसार, बाल स्टंटिंग को कम करने के लिए खर्च किए गए प्रत्येक डॉलर से दुनिया को 30 डॉलर का लाभ हुआ। भारत में इस लक्ष्य की ओर एक डॉलर खर्च करने के लाभ अधिकांश देशों की तुलना में अधिक हैं। भारत में, बाल स्टंटिंग को कम करने की दिशा में खर्च किए गए प्रत्येक डॉलर से हमें 45 से 139 डॉलरके बीच लाभ होता है। उन बच्चों को भविष्य में प्रति व्यक्ति आय के रूप में लाभ मिलेगा जो स्टंटिंग से बच गए हैं। यह किसी भी प्रकार के निवेश के लिए एक शानदार रिटर्न दर है।
जॉन होडिनडॉट अपनी पुस्तक- ‘इकनोमिक कॉस्ट ऑफ मॉलन्यूट्रिशन’ में लिखते हैं कि दुनिया में हर जगह स्कूली शिक्षा और संज्ञानात्मक कौशल श्रम बाजार में सफलता के लिए महत्वपूर्ण कारक हैं। स्कूली शिक्षा के प्रत्येक अतिरिक्त ग्रेड की बदौलत आठ से 12 प्रतिशत की मजदूरी बढ़ जाती है। तो इस तरह के कौशल के बिना और कम स्कूली शिक्षा वाले व्यक्ति कम मजदूरी कमाते हैं, जिससे यह अधिक संभावना है कि वे गरीब होंगे। करोडों दावों के बीच हालिया आंकड़ों से पता चलता है कि भारत के कई हिस्सों में 2014 और 2019 के बीच पैदा हुए बच्चे पिछली पीढ़ी की तुलना में अधिक कुपोषित हैं। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, 2019 में भारत में पांच वर्ष से कम आयु के आठ लाख से अधिक बच्चों की मृत्यु हो गई। और अब महामारी प्रतिकूल प्रभाव के कारण यह आंकड़ा अधिक हो सकता है। सोचने वाली बात है हम किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।