Population नियंत्रण कानून क्या सच में जरूरी है?

फीचर चौपाल
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अक्षत मित्तल

1980 आते-आते चीन की population सौ करोड़ होने की कागार पर थी। उस वक्त यही शियाओपिंग चीन के लिए दुनिया भर में विवादित “वन चाइल्ड पॉलिसी” लेकर आए। शियाओपिंग सोचते थे कि चीन के संसाधन इतनी बड़ी आबादी पचा जाती है और सरकार लोगों को बेहतर सुविधाएं नहीं दे पाती, लेकिन जो शियाओपिंग ने नहीं सोचा वो भयानक भविष्य बन गया।

बीसवी शताब्दी को बीतने में अभी बीस साल बचे हुए थे। चीन में माओ का दौर बीते लगभग आधा दशक बीत चुका था। डेंग शियाओपिंग अब चीन के सर्वोच्च नेता थे। शियाओपिंग की जिंदगी के कई पहलू हैं। चीन में आर्थिक तरक्की की शुरुआत करने वाले शियाओपिंग, चीन-अमरीका रिश्तों में सुधार लाने की कोशिश करने वाले शियाओपिंग, अमरीकी यात्रा करने वाले शियाओपिंग तो कभी लोकतंत्र की आवाजों का दमन करते शियाओपिंग।

1980 आते-आते चीन की आबादी सौ करोड़ होने की कागार पर थी। उस वक्त यही शियाओपिंग चीन के लिए दुनिया भर में विवादित “वन चाइल्ड पॉलिसी” लेकर आए। शियाओपिंग सोचते थे कि चीन के संसाधन इतनी बड़ी आबादी पचा जाती है और सरकार लोगों को बेहतर सुविधाएं नहीं दे पाती, लेकिन जो शियाओपिंग ने नहीं सोचा वो भयानक भविष्य बन गया। अब साढ़े तीन दशक और आगे बढ़ते हैं। चीन की सत्ता अब शी जिनपिंग के हाथ में थी। चीन की आबादी तेजी से बूढ़ी हो रही थी जिसके कारण आर्थिक विकास की गति भी धीमी होने लगी। इन सब को देखते हुए 2016 में चीन ने तत्काल रूप से “वन चाइल्ड पॉलिसी” से हटकर “टू चाइल्ड पॉलिसी” अपनाई, लेकिन इसने भी काम नहीं किया।

चीन के 2020 की जनगणना के आंकड़े इस साल मई महीने में आए। आंकड़ों से पता चला है कि 2016 की छूट के बावजूद देश की जनसंख्या वृद्धि दर में तेजी से गिरावट आई। राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो के अनुसार पिछले साल चीन में 1.2 करोड़ बच्चे पैदा हुए थे, जो 2019 में 1.465 करोड़ थे (18 प्रतिशत की गिरावट)। चीन की प्रजनन दर अब गिरकर 1.3 हो गई है, जो नई पीढ़ी को भरने के लिए आवश्यक 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर से काफी नीचे है। इस स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि यह आंकड़े आते ही चीन ने तत्काल “टू चाइल्ड पॉलिसी” को हटाकर “थ्री चाइल्ड पॉलिसी” को अपनाया। फिलहाल अब चीन में तीन बच्चे पैदा करने की अनुमति दे दी गई है, लेकिन आज चीन एक खतरनाक संकट के मध्य में खड़ा है।

अब सवाल यह कि चीन की यह नीति कितनी कारगर रही? नीति के कारण जन्म दर में गिरावट आई, लिंग अनुपात में पुरुष हावी हो गए। कन्या शिशु के गर्भपात का आंकड़ा बहुत बढ़ गया और इसी तरह अनाथालयों में छोड़ी गई लड़कियों की संख्या में भी वृद्धि हुई। विशेषज्ञों ने इस नीति को ही चीन की जनसंख्या के तेजी से बूढ़े होने का कारण बताया। इस नीति के प्रभाव के कारण, चीन अपने आर्थिक विकास का पूरा लाभ उठाने में असमर्थ रहा, जबकि भारत और अन्य एशियाई अर्थव्यवस्थाएं जैसे इंडोनेशिया और फिलीपींस में युवा आबादी अर्थव्यवस्था को समर्थन देती है।

अब चीन से हटकर हम उसके पड़ोसी और उससे डेमोग्राफिक रूप से काफी मजबूत देश भारत पर आते हैं। दिसंबर 2019 के मध्य में मैं दिल्ली में कई वरिष्ठ लोगों से मिला। इन लोगों में अलग-अलग पार्टियों के कुछ नेता, कुछ अधिकारी और कुछ पत्रकार शामिल हैं। बातचीत के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि भारत में व्यापक तौर पर हर वर्ग के बीच यह सहमति है कि जनसंख्या पर अंकुश लगाना जरूरी है। हालांकि, आम जन-मानस की भावनाओं से अलग जानकार जनसंख्या नियंत्रण पर कानून लाने के पक्षधर नहीं थे। यह बात तो तय है कि जो भी सभा आर्थिक-सामाजिक चिंतन पर आधारित होगी उसमें आबादी का मुद्दा जरूर आएगा।

हाल ही में उत्तर प्रदेश ने जनसंख्या नियंत्रण कानून पर अपना मसौदा तैयार कर लिया है। मसौदे के प्रस्तावों को करीब से देखने पर ये कुछ-कुछ डेंग शियाओपिंग की नीतियों से मिलते-जुलते हैं। हालांकि लोगों को परिवार नियोजन के बारे में जागरूक करने जैसे प्रस्तावों से मैं पूरी तरह सहमत हूं, लेकिन दो से ज्यादा बच्चे होने पर चुनाव ना लड़ने देना, सब्सिडी और अन्य सरकारी सुविधाओं से वंचित करने और सरकारी नौकरियों से वंचित करने जैसे प्रस्ताव मेरी समझ के बाहर हैं। जनसंख्या नियंत्रण पर कानून की जरूरत भी मेरी समझ के बाहर की बात है। मुझे यह भी आश्चर्यजनक लगा कि असम में चाय बागान में काम करने वालों और अनुसूचित जाति और जनजाति वालों के लिए ये नीति लागू नहीं होगी। एक प्रदेश में अलग-अलग समुदायों के लिए अलग-अलग नीति क्यों?

बात करें यूपी की, तो अन्य राज्यों की तरह या कहें कि चीन की तरह ही यूपी सरकार का भी जनसंख्या नियंत्रण कानून को लेकर अपना तर्क है। राज्य के विधि आयोग के अध्यक्ष बीबीसी से कहते हैं कि जनसंख्या कम होगी तो संसाधन लंबे समय तक चल पाएंगे और सरकार लोगों को बेहतर सुविधाएं दे पाएगी। यह पहला मौक़ा नहीं है जब ‘टू चाइल्ड पॉलिसी’ पर बात हो रही हो। 2019 में भाजपा के एक राज्यसभा सांसद भी टू चाइल्ड पॉलिसी पर एक प्राइवेट मेम्बर बिल लेकर आए थे, जिसमें कुछ ऐसे ही प्रस्ताव थे। असल में ऐसे तर्कों से केंद्र सरकार खुद भी सहमत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका के जवाब में केंद्र ने इस पॉलिसी को लागू करने में असमर्थता जताते हुए कहा कि भारत में फ़ैमिली वेलफे़यर प्रोग्राम स्वैच्छिक है और ज़बरन लागू नहीं कराया जा सकता।

दरअसल 1951 की पहली जनगणना में भारत कि जनसंख्या 36.10 करोड़ थी। 2011 में हुई आखिरी जनगणना में आबादी विस्फोटक रूप से बढ़कर 121.08 करोड़ हो गई थी। अगर हम वर्ल्ड बैंक और यूएससीबी के आंकडों को देखें तो पाएंगे कि भारत की आबादी 2018 में 135.26 करोड़ हो गई, लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि भारत में हर दशक में जनसंख्या बढ़ने की दर कम हो रही है। प्रजनन दर में भी कमी आ रही है। इन तर्कों को आंकड़ों में समझते हैं। 2011 की जनगणना और इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पॉपुलेशन साइंसेस के शोध के आधार पर आर्थि‍क समीक्षा (2018-19) के जनसंख्या को लेकर ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में आबादी बढ़ने की दर 2011-16 के बीच केवल 1.3 प्रतिशत रह गई है जो 1971 से 1981 के बीच में 2.5 प्रतिशत थी। यह रफ्तार अब दक्षि‍ण एशि‍या के प्रमुख देशों के करीब है और निम्न/मझोली आय वाले देशों से कम है।

दक्षि‍ण भारत, बंगाल, पंजाब, असम, हिमाचल, महाराष्ट्र, ओडिशा समेत 13 राज्यों में आबादी बढ़ने की दर 1 प्रतिशत कम हो गई है जो लगभग यूरोप के बराबर है। आंकड़ों में अंदर घुसने पर हमें पता चलेगा कि 1971 से 2016 के बीच भारत में कुल प्रजनन दर 5.3 से घटकर आधी 2.3 रह गई है। नतीजतन भारत के करीब 13 राज्यों में अब रिप्लेसमेंट फर्टिलिटी दर 2.1 प्रतिशत से नीचे आ गई है। दक्षि‍ण और पश्चि‍म के राज्यों में यह दर अब 1.4 से 1.6 के बीच आ गई है। विभिन्न आकलनों से पता चलता है कि 2031 तक भारत में जनसंख्या वृद्धि दर घटकर 1 प्रतिशत हो जाएगी और 2041 तक यह 0.5 प्रतिशत ही रह जाएगी। 2021-31 के बीच करीब 97 करोड़ लोग काम करने की ऊर्जा से भरपूर होंगे। मौजूदा दर पर भारत में 2041 तक युवा आबादी का अनुपात अपने चरम पर पहुंच चुका होगा। इसके बाद यह आबादी बूढ़ी होने लगेगी।

आंकड़ों का अध्ययन करने पर समझ आता है कि भारत ने बिना किसी कठोर जनसंख्या नियंत्रण कानून के जनसंख्या नियंत्रित करने का करिश्मा कर दिखाया है। सवाल यह है कि समस्या ना होना कब से समस्या हो गया? सवाल यह भी है कि आखिर जनसंख्या नियंत्रण कानून का विरोध क्यों? इस लेख में मैं चीन का उदाहरण दे चुका हूं जिससे विरोध स्वतः ही स्पष्ट हो जाएगा। लेकिन इसके अतिरिक्त भी कुछ चिंताएं हैं। जनसंख्या नियंत्रण पर कानून बनने पर परिवार बेटे की चाहत में ‘सेक्स सलेक्शन’ करने की तरफ़ दोबारा बढ़ने लगेंगे। इससे सेक्स रेशियो भी गड़बड़ हो जाएगा और दूसरी दिक़्क़त उम्र दराज़ जनसंख्या की होगी। पांच राज्यों में पंचायत चुनाव में टू चाइल्ड पॉलिसी के परिणामों पर एक स्टडी में पाया गया कि इसकी वजह से लोग अपनी पत्नी और बच्चों को छोड़ने लगे हैं। ऐसे कानूनों से सामाजिक सुधार में हम फिर से पीछे चले जाएंगे।

फिलहाल असम में टू-चाइल्ड पॉलिसी लाने की ज़रूरत ही नहीं है।यूपी में प्रजनन दर राष्ट्रीय औसत से थोड़ा ज़्यादा है, लेकिन अगले पांच-सात सालों में लोगों की सतर्कता से ये ख़ुद कम हो जाएगा। दरअसल जनसंख्या विस्फोट की असल वजहें शिक्षा की कमी, ग़रीबी और ज़रूरी स्वास्थ्य सुविधाओं जैसे डॉक्टर, अस्पताल की कमी है। सोचने वाली बात यह है कि अगर राज्य सरकारें भविष्य में दूसरी योजनाओं का लाभ भी लोगों तक कम पहुंचाने का मन बना रही हैं तो इससे नुक़सान कम होने के बजाय ज़्यादा ही होगा, क्योंकि योजनाओं का लाभ नहीं मिलने से ग़रीबी बढ़ेगी, ग़रीबी का असर शिक्षा पर पड़ेगा और उस वजह से सुविधाएं भी उन तक कम पहुंचेंगी।

अब इससे भी जटिल सवाल कि क्या मुस्लिम आबादी ही इस बढ़त के पीछे की वजह है? 1951 में हिंदुओं की जनसंख्या 84 प्रतिशत थी जो 2011 में घटकर 79.8 प्रतिशत रह गई। वहीं मुसलमानों की जनसंख्या इस दौरान 9.8 फ़ीसदी से बढ़कर 14.2 फ़ीसदी हो गई। यह तथ्य है कि मुस्लिम आबादी देश में बढ़ी है, लेकिन इसके अतिरिक्त सत्य का दूसरा पहलू भी है। जिन राज्यों में मुस्लिम आबादी बीस प्रतिशत से अधिक है, वहां पर प्रजनन दर (1.8) राष्ट्रीय औसत (2.1) से नीचे है। लक्षद्वीप और जम्मू-कश्मीर जहां मुस्लिम आबादी क्रमशः 96 प्रतिशत और 68 प्रतिशत है वहां प्रजनन दर मात्र 1.4 है। उत्तर प्रदेश इसमें एक अपवाद है, जहां मुस्लिम आबादी बीस प्रतिशत है, लेकिन प्रजनन दर 2.4 है। यूपी में भी यदि ग्रामीण क्षेत्रों को छोड़ दें तो प्रजनन दर, प्रतिस्थापना दर (2.1) से कम है।

आंकड़े स्पष्ट कर देते हैं कि आबादी शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी कारकों की वजह से प्रभावित होती है। एक और बात यह कि हिन्दू और मुस्लिम आबादी भारत में एक बराबर नहीं होंगी, क्योंकि यदि मुस्लिम आबादी 60 साल में चार फ़ीसदी आबादी बढ़ी तो उस हिसाब से मुस्लिम आबादी को 600 साल लगेंगें कुल आबादी का 40 फ़ीसदी तक बढ़ने में। सरकारों को परिवार नियोजन के बारे में जनता को जागरूक करना चाहिए। जिन राज्यों में प्रजनन दर प्रतिस्थापना दर से कम है (जैसे सिक्किम) वहां परिवारों को बच्चा करने की अहमियत के बारे में बताना चाहिए और जहां प्रजनन दर ज्यादा है (जैसे यूपी) वहां लोगों को आबादी नियंत्रण के विषय में समझाना चाहिए। ऐसा करने से देश की डेमोग्राफिक स्थिति स्थिर रहेगी।

फिलहाल सरकारों को गरीबी कम करने, सब तक शिक्षा पहुंचाने और स्वास्थ व्यवस्थाएं बेहतर करने पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी है। जनसंख्या नियंत्रण पर कानून लाने की जरूरत अभी नहीं है। ऐसे कानूनों के घातक परिणाम हम चीन में देख चुके हैं।

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