किसानों को आर्थिक विकास (Economic Growth) नहीं, समृद्धि की ओर लाया जाये

फीचर COLUMN चौपाल
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गुंजन मिश्रा

देश की खाद्य सुरक्षा बनाये रखने के लिए किसानों को बाजार नहीं प्रकृति के ऐश्वर्य के माध्यम से समृद्धि की ओर ले जाने की जरुरत है, यानी प्रकृति का जो मूल सिंद्धांत है, वह है सह-अस्तित्व। जब तक सह-अस्तित्व किसानों के जीवन के केंद्र में रहा तब तक किसान खुशहाल रहा, क्योंकि सह-अस्तित्व के कारण छोटा जीवाणु व बड़े से बड़ा प्राणी अपने जीवन का कार्यकाल बिना किसी अभाव के जैव विविधता, हवा, पानी, और मिट्टी को संरक्षित रखते हुए आने वाली पीढियों को खुशहाल जीवन की आधारशिला देकर जाता था या जाता है। ठीक इसके विपरीत आर्थिक विकास (Economic Growth) प्रदूषण, बीमारी, मानसिक विकार व पंचतत्वों के प्राकृतिक चक्र को नष्ट करके किसान को क़र्ज़ व आत्महत्या देकर जाता है। 1950-51 में सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का हिस्सा लगभग 55 प्रतिशत था, लेकिन सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का हिस्सा 2020-21 में 19.9 प्रतिशत है। कारण पहले, आज की तरह हिंसात्मक कृषि नहीं हुआ करती थी, क्योंकि यूरिया डीएपी (रासायनिक खाद) ये बारूद का ही एक हिस्सा है। अतः आर्थिक विकास का सीधा सम्बन्ध हिंसा से है, यानी बाजार से। बाजार के माध्यम से ही कृषि क्षेत्र में हिंसा होती है, जबकि कृषि का पहला उद्देश्य उदारता से जुड़ा हुआ है। यानी समृद्धि पूरी तरह से उदारता व् मानवता पर आधारित होती है।

यही कारण है कि भूटान जैसे देश में खुशहाली सूचकांक भारत से बेहतर है, क्योंकि भूटान में यूरिया की खपत 13 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है, जबकि भारत वर्ष में उर्वरकों की वार्षिक खपत, पोषक शब्दों में – नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम प्रति हेक्टेयर 1951-52 में एक किलोग्राम से 2017-18 में 135 किग्रा हो गयी थी। इसलिए सरकार को चाहिए कि कुछ इस तरह के कानून बनाये कि किसानों को उनके उत्पाद का मूल्य स्वास्थ्य, पोषण और सह अस्तित्व प्रति एकड़ के रूप में आकलन करके दिया जाये, जिससे मिट्टी के स्वास्थ्य के साथ-साथ कुपोषण, जैव विविधता, जल, हवा एवं मानव स्वास्थ्य बेहतर रहेंगे।

दूसरी वजह, इसकी यह भी है कि प्रकृति के नियमों के अनुसार किसान का उत्पादन धनात्मक व गुणात्मक न होकर उभय तृप्ति के रूप में होता है। किसानों को यदि प्रकृति के इस सिद्धांत के अनुसार खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया जाये तो किसान अपनी समृद्धि के साथ देश व दुनिया को पौष्टिक अन्न एवं संतुलित पंचतत्व दे पायेगा। तभी किसान आत्मनिर्भर हो पायेगा एवं अपनी सामाजिक जिम्मेदारी का निर्वाह कर पायेगा। वैसे भी भारतीय किसानी एक संस्कृति का नाम है, जिसमें व्यापार व जरूरत से ज्यादा संचय नहीं है। यही कारण है कि भारत में कृषि का अर्थ प्राकृतिक संसाधनों का सामूहिक उपयोग है।
यह बात कड़वी जरूर है, लेकिन सच है कि बाजार ने ही पारस्थितिकी समस्याओं के साथ-साथ किसान की समृद्धि छीन ली है। यही वजह है कि अन्नदाता को सामाजिक, आर्थिक व भ्रष्टाचार जैसे दानवों ने घेर लिया है। पिछले दो दशक में तीन लाख किसानों द्वारा आत्महत्या करना इसका सबसे बड़ा सबूत है।
गांधी ने सौ साल पहले गांव-किसान और खेती के बारे में जो कहा वह आज सच हो रहा है। महात्मा गांधी पूर्णाहुति ग्रंथ के अनुसार गांधी जी की कृषि आधारित आर्थिक व्यवस्था के मुख्य अंग ये हैं (1) सघन, छोटे पैमाने की, व्यक्तिगत और विभिन्न फसलों वाली खेती-जिसे सहकारी प्रयत्न का सहारा हो, न कि यान्त्रिक और बड़े पैमाने पर की जाने वाली सामूहिक खेती, (2) खेती के सहायक गृह-उद्योगों का विकास, (3) पशुओं पर आधारित अर्थव्यवस्था जिसमें ‘लौटाने का नियम’ सख्ती से अमल में लाया जाये-यानि जो कुछ धरती से निकाला जाये उसे सजीव रूप से धरती को लौटा दिया जाये, (4) पशु, मानव और वनस्पति-जीवन का ठीक सन्तुलन और एक-दूसरे के लाभ के लिए उनका परस्पर सम्बन्ध, और (5) सामाजिक योगक्षेम के लिए यंत्रों की प्रतिस्पर्धा में मानव और पशु दोनों शक्तियों की स्वेच्छा से रक्षा। हम आज भी गाँधी के बताये रास्ते से हटकर कृषि को लेकर नये-नये प्रयोग कभी तकनीकी, कानूनों, उत्पादन, आमदनी के नाम पर किसानी और किसानों के साथ करते चले आ रहे है।

जिसका परिणाम हर बार नकारात्मक मिलने के बावजूद भी हमारे नीति निर्माता चेत नहीं रहे हैं। इतना ही नहीं भारत वर्ष में वेदों से लेकर दसियों ऋषि मुनियों ने कृषि के बारे में जो कहा उसका पालन न करना ही आज हमको और किसानों को परेशानियों में घेरे हुए है। इसका कारण यह है कि पहले कृषि वैज्ञानिकों और अब बिल गेट्स जैसे उद्योगपतियों की कही गयी किसी भी बात को सिद्धांतः पालन करना। आज गेट्स कहते हैं कि लोगों को बीफ छोड़कर कृत्रिम मांस खाना चाहिए, कल कहेंगे कि खेती से उगाये गए चावल और गेंहू छोड़कर प्लास्टिक से बने अनाज खाना चाहिए और यही हाल रहा तो वो दिन दूर नहीं, जब ऐसा होगा। क्योंकि कॉर्पोरेट दुनिया पर राज करेंगे ये बात भी कुछ समझदार लोगें को आज से 25 वर्ष पहले समझ में आ गयी थी।

उदाहरण के लिए, जनवरी 2019 में, संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन और औद्योगिक कृषि के लिए अन्य समर्थकों (हरित क्रांति मंच, विश्व बैंक, आर्थिक सहयोग और विकास ) के संयोजन में कई कृषि मंत्री, प्रौद्योगिकी एसोसिएशन और अन्य लोगों ने किसानों से सभी कृषि आंकड़ों को समेकित करने के लिए खाद्य और कृषि के लिए अंतरराष्ट्रीय डिजिटल काउंसिल बनाने के प्रस्ताव का मसौदा तैयार किया- एक ऐसा मंच, जिसे निजी क्षेत्र के साथ साझेदारी के महत्व पर बल दिया, ने एग्री-टेक कंपनी क्रॉपलाइफ को डिजिटल खाद्य प्रणाली में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया। इस तरह की साझेदारियां और रणनीतियां खाद्य आपूर्ति के हर पहलू पर, यथा- उत्पादन, वितरण और उपभोग श्रृंखला के माध्यम से आगे नियंत्रण के लिए अनिवार्य रूप से अनुमति देंगी, जिससे कृषि व्यवसाय में एकाधिकार स्थापित हो ।
हमारी जैव विविधता, पोषण, भूख, जलवायु, पारिस्थितिकी और स्वास्थ्य संकटों के लिए इस तकनीकी प्रगति को हमारे खाद्य प्रणालियों के लिए समाधान के रूप में बताया जा रहा है, लेकिन वास्तविकता में ये ‘समाधान’ कोई नई बात नहीं है। अंत में हमें औद्योगिक कृषि प्रणाली की एक और पुनरावृत्ति की ओर धकेल दिया जाएगा, जिससे कई और संकट कृषि क्षेत्र में आ जायेंगे । मूलतः ये प्रणाली भारत में छोटे किसानों को मजदूर बना देंगे, क्योंकि प्राकृतिक ऐश्वर्य को नकारकर दुनिया को खुशहाल नहीं बनाया जा सकता है।
देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए किसान को गाँधी जी के ग्राम स्वराज्य के सिद्धांत को लागू करने की आवश्यकता है। जिससे गावं में ही रोज़गार, न्याय, शिक्षा और स्वास्थ्य की व्यवस्था हो सके। ऐसा करने से देश का किसान समृद्ध हो सकेगा।
(लेखक पर्यावरणविद हैं)

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