पश्चिम बंगाल में Post Poll हिंसा, कहीं नासूर न बन जाए

फीचर प्रादेशिक
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सुधांशु गौड़

Post poll हिंसा भारत में आम हो चुकी है। चुनावी परिणाम आने के बाद आपसी हिंसा अब आम हो चली है। कहीं जीतने वाले पक्ष के समर्थक हारने वाले उम्मीदवार के कार्यकर्ताओं पर हावी हो जाते हैं तो कहीं हारने वाले के समर्थक अपनी भड़ास निकालने के लिए विजेता पक्ष के कार्यकर्ताओं पर हावी हो जाते हैं। इस दौरान सबसे ज्यादा नुकसान कोई उठाता है तो वह है आम जनता और देश की गौरवमई लोकतांत्रिक व्यवस्था। इन हिंसा की न्यायिक जांच व दोषियों के खिलाफ कार्रवाई का झुनझुना तो पकड़ाया जाता है, लेकिन कभी ऐसी कोई कार्रवाई या जांच नहीं होती, जिससे इस तरह की हिंसा रुके या कम से कम इनमे कमी आए।

अभी हाल ही में पश्चिम बंगाल में विधानसभा के चुनाव संपन्न हुए। चुनावों का परिणाम आने के बाद पूरे राज्यभर में हिंसा फैल गई। दो पार्टियों के समर्थकों के बीच हिंसा शुरू हो गई। हालांकि 2 मई तक कुछ छुटपुट घटनाओं को छोड़ दें तो राज्य भर में शांति बनी रही थी, लेकिन जैसे ही 2 मई को परिणाम आने शुरू हुए और पश्चिम बंगाल में ‘खेला’ शुरू हो गया। एक पार्टी के समर्थकों के द्वारा दूसरी पार्टी के समर्थकों पर हमले की खबरें आनी शुरू हो गईं। इस हिंसा के दौरान तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने मारकाट, आगजनी, हत्या और दुर्व्यवहार शुरू कर दिया।

2019 के बाद पश्चिम बंगाल में तेज हुईं राजनैतिक हिंसाएं

चूंकि 2019 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने अप्रत्याशित सफलता प्राप्त की थी। भाजपा ने अकेले अपने दम पर बंगाल से 18 सांसदों को लोकसभा पहुंचाया था। तभी से बातें शुरू हो गई थी कि ‘अभी हाफ– 21 में साफ़।’ वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद ही भारतीय जनता पार्टी लगातार ममता बनर्जी को पूरी ताकत से चुनौती देती दिख रही थी। जिस वजह से पूरे देश का मीडिया बड़े ही दिलचस्पी से बंगाल के चुनावी परिणामों पर नजर गड़ाए बैठा था और यही वजह रही कि बंगाल में सत्तापरिवर्तन की उम्मीद लगाये बैठे राष्ट्रीय मीडिया के जरिये बंगाल में हिंसा की खबरों ने समूचे देश को हिलाकर रख दिया।

ऐसा नहीं है कि पश्चिम बंगाल में ऐसी हिंसा पहली बार हुई हो। अगर पिछले कुछ 2-3 वर्ष के समयकाल को देखें तो शायद ही ऐसा कोई सप्ताह गया हो, जिस दिन बंगाल में कोई राजनीतिक हिंसा या मौत न हुई हो। कभी कहीं बीजेपी का कोई कार्यकर्त्ता मृत पाया जाता था तो कभी कहीं तृणमूल कांग्रेस का कार्यकर्ता। सरकार जांच व दोषियों पर कार्यवाही का भरोसा देती, लेकिन शायद ही ऐसा कोई मामला हुआ, जिसमें निष्पक्षता से जांच हुई हो और दोषियों पर कार्रवाई हुई हो। बंगाल बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस पर आरोप लगाते हुए कहते हैं, “पिछले दो वर्षों में बीजेपी के 150 से ज्यादा कार्यकर्ताओं व समर्थकों की हत्याएं हो चुकी हैं। ये सभी हत्याएं तृणमूल कांग्रेस ने ही करवाईं, लेकिन सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। हमारे कार्यकर्त्ता एफआईआर व जांच के लिए पुलिस के पास जाते थे तो वह उनको भगा देते थे। आज जो चुनावों के बाद हिंसा हो रही है वह पूरी तरह से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के द्वारा प्रायोजित है।”

मौजूदा वक्त में राजनीतिक झड़पों में बढोतरी के पीछे मुख्‍य तौर पर तीन अहम कारण हैं। मौजूदा चुनावों के बाद हुईं हिंसा के पीछे तीन अहम कारण बताए जाते हैं। राज्‍य में बढ़ती बेरोजगारी, कानून व्यवस्था पर सत्‍ताधारी दल का वर्चस्‍व और टीएमसी का गढ़ बन चुके क्षेत्रों में बीजेपी की सेंधमारी। पिछले कुछ समय से राज्य में कानून व्यवस्था काफी बिगड़ रही थी। जिस पर राज्य सरकार को ध्यान देना चाहिए था, लेकिन ममता बनर्जी की सरकार ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया। जिस वजह से उनकी पार्टी के अंदर निहित कुछ असामाजिक तत्वों ने यह समझ लिया कि कुछ भी कर लो, दीदी उनकी रक्षा व बचाव कर ही लेंगी तथा यही हौसला उन्हें और भी हिंसक बनाता गया।

पश्चिम बंगाल में राजनैतिक हिंसाओं का पुराना इतिहास

पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा का रक्तरंजित इतिहास रहा है। माना जाता है कि राज्‍य में राजनीतिक हिंसा की शुरुआत 1960 के दशक में हुई। इन राजनैतिक हिंसाओं में हजारों निर्दोष लोगों को अपनी जान से हाथ गंवाना पड़ा। लाखों करोड़ों रुपयों की संपत्ति का नुकसान हुआ था। एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 1977 से 2007 तक बंगाल में लेफ्ट फ्रंट की सरकार सत्ता में रही। इस दौरान पश्चिम बंगाल में लगभग 28 हजार राजनीतिक हत्याएं हुईं। सिंगूर और नंदीग्राम का आंदोलन भी वाम हिंसा का एक नमूना माना जाता है। इसके अलावा कई ऐसी घटनाएं भी हैं, जो आज तक कभी दर्ज ही नहीं हुईं। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, लोकसभा चुनाव 2014 के विभिन्न चरणों के दौरान 15 राजनीतिक हत्याएं हुईं। प्रदेश भर में राजनीतिक हिंसा की 1100 घटनाएं पुलिस ने दर्ज की। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 2013 से लेकर मई 2014 के काल में पश्चिम बंगाल में 23 से अधिक राजनीतिक हत्याएं पर हुईं।

आंकड़ों मुताबिक साल 2016 में बंगाल में राजनीतिक कारणों से 91 घटनाएं हुईं, जिसमें 205 लोगों की मौत हुई थी। साल 2015 में कुल 131 वारदात हुई थी, जिसमें 184 लोगों की मौत हुई थी। ममता के सत्ता संभालने के दो साल बाद 2013 में भी बंगाल में राजनीतिक वजहों से 26 लोगों की हत्या हुई थी और ये हिंसा देश के किसी भी राज्य से कहीं ज्यादा थी। जब 2018 में सिर्फ और सिर्फ पंचायत के चुनाव हुए तो एक दिन में 18 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था।

*2018 पंचायत चुनाव में हिंसा की घटनाएं*

पश्चिम बंगाल में 2018 पंचायत चुनावों के दौरान हुई व्यापक हिंसा को लेकर बीजेपी ने दावा किया था कि चुनाव के दौरान पार्टी के 52 कार्यकर्ताओं की हत्या टीएमसी ने कराई, जबकि टीएमसी ने दावा किया था कि उसके 14 कार्यकर्ता मारे गए थे। इन चुनावों में बीजेपी ने अप्रत्याशित सफलता हासिल की थी। उसके बाद से राज्य में हिंसाओं और हत्याओं का दौर सा चल पड़ा था। बंगाल के किसी न किसी कोने से हर हफ्ते किसी पार्टी के कार्यकर्त्ता की हत्या की खबर आना आम बात हो चुकी थी।

*2019 लोकसभा चुनाव में बंगाल में हिंसा*

2019 में देशभर में लोकसभा चुनाव होते हैं। इस दौरान लगभग देशभर में शांति रही। एक वक्त जो छत्तीसगढ़ और उड़ीसा जैसे राज्य जो नक्सल प्रभावित राज्यों में आते हैं, वहां भी चुनाव शांतिपूर्ण तरीके से सम्पन्न हो गये थे, लेकिन बंगाल में हिंसा नहीं रुकी। बंगाल में लोकसभा चुनाव के दौरान हिंसा में 12 से ज्यादा लोगों की मौत हुई। पश्चिम बंगाल में हर चरणों के मतदान में लगातार हिंसा देखने को मिली थी। इस दौरान अलीपुर दुआर और कूच बिहार में टीएमसी और बीजेपी कार्यकर्ताओं के बीच हिंसा की खबर आई थी। रायगंज के इस्लामपुर में सीपीआई-एम सांसद मोहम्मद सलीम की कार पर कथित तौर पर टीएमसी समर्थकों के पत्थरों और डंडों से हमले की बातें सामने आई। हिंसा की कई शिकायतें मिली और बमबाजी तक की खबरें आईं। आसनसोल में टीएमसी कार्यकर्ताओं और सुरक्षाबलों में जमकर झड़प हुई। इस सियासी हिंसा में कई ऐसे मौके भी आए हैं, जब सरेआम कानून की खिल्ली उड़ी और पुलिस तमाशबीन बनी रही। उस दौरान चुनाव आयोग इन हिंसाओं की जांच के निर्देश तो देता, लेकिन वह केवल निर्देश बनकर ही रह जाते। चुनावी रैलियों में इन हिंसाओं को सभी राजनैतिक दल अपने हिसाब से इस्तेमाल करते और आगे बढ़ जाते। लेकिन पूरे चुनाव के दौरान हिंसा होती रही और लोग मरते रहे थे।

माना जाता है कि पश्चिम बंगाल में जिस भी दल की सरकार होती है। उसके कार्यकर्त्ता बेकाबू हो जाते हैं और अपने विरोधियों को निबटाने में लग जाते हैं। राज्य सरकार भी अपने इन कार्यकर्ताओं को सुरक्षा देने के लिए प्रशासन में सीधे दखल देने लग जाती हैं। जिस वजह से कानून व्यवस्था कमजोर पड़ जाती है। प्रशासनिक अधिकारी भी इन लोगों पर कार्रवाई करने से डरते हैं। अगर कोई अधिकारी कार्रवाई करता भी है तो उस पर सरकार द्वारा कार्यवाही का डर बन जाता है, इसलिए अधिकारी भी इनपर कार्यवाही करने से बचते हैं। लेकिन जिस तरह से सत्ता में बैठी पार्टी इन हिंसा करने वालों को अपना संरक्षण व सुरक्षा प्रदान करती हैं। वह देश की कानून व्यवस्था व लोकतंत्र में आम जनता का भरोसा डिगा रहा है। आज भले ही हम इसे राजनीतिक रंग देकर देखें या सिर्फ यह कहकर संतोष कर लें कि चुनावों के बाद तो ऐसा होता ही है। लेकिन यही राजनैतिक हिंसाओं की घटनाएं भारतीय लोकतंत्र के लिए एक नासूर बन जाएंगी। ये हिंसाएं देश के लिए एक ऐसा जख्म बन जाएंगी, जिन्हें बड़ी ही मुश्किलों से भरा जा सकेगा। अभी वक्त है। इन हिंसाओं और हत्याओं को रोका जा सकता है और लोकतंत्र में डगमगाते हुए विश्वास को बचाया जा सकता है।

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