सुप्रीम कोर्ट (SC) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि डर-भय के कारण अथवा निर्बाध रूप से कारोबार चलाते रहने के लिए Extortion amount का भुगतान करना आतंकवादियों को की जाने वाली फंडिंग (Terror Funding) की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
जस्टिस (Justice) एल नागेश्वर राव और जस्टिस एस रवीन्द्र भट की बेंच ने ट्रांसपोर्ट कारोबारी सुदेश केडिया (Sudesh Kedia) की जमानत मंजूर करते हुए यह टिप्पणी की। केडिया को गैर कानूनी गतिविधि (निरोधक) कानून (UAPA) के तहत गिरफ्तार किया गया था।
बेंच ने कहा कि उगाही की राशि के भुगतान को आतंकवाद के लिए फंड मुहैया कराना नहीं कहा जा सकता। केडिया ने हाईकोर्ट (HC) द्वारा जमानत याचिका खारिज किये जाने को Supreme Court में चुनौती दी थी।
SC ने कहा कि धारा 43 (5) (डी) के तहत जमानत मंजूर करने पर विचार करते वक्त कोर्ट का बाध्यकारी कर्तव्य है कि वह खुद को इस बात के लिए संतुष्ट करने के उद्देश्य से रिकॉर्ड में लाये गये सम्पूर्ण साक्ष्यों और दस्तावेजों की तहकीकात करे कि क्या अभियुक्त के खिलाफ प्रथम दृष्ट्या मामला बनता है या नहीं?
HC का कहना था कि याचिकाकर्ता उगाही की राशि का भुगतान करता रहा था और इस प्रकार उसने आतंकवादी संगठन को फंड मुहैया कराने में मदद की थी। हालांकि, अपील में अभियुक्त ने दलील दी थी कि उसके खिलाफ केवल यह आरोप है कि अपने कारोबार के निर्बाध संचालन के लिए उसने टीपीसी को अवैध लेवी का भुगतान किया था। वह टीपीसी का सदस्य नहीं है, इसलिए उसे टेरर फंडिंग का आरोपी नहीं कहा जा सकता।
केडिया की यह भी दलील थी कि उसके पास कोई चारा नहीं था कि वह आतंकवादी संगठन की मांग पूरी किये बिना कोयले का निर्बाध तरीके से ट्रांसपोर्टेशन जारी रख सके। अपील में यह भी दलील दी गयी थी कि अभियुक्त की जो मुलाकात आतंकी संगठन के सदस्यों के साथ हुई थी, उसे टाला नहीं जा सकता था और इस मुलाकात का एक मात्र उद्देश्य संगठन के सदस्यों द्वारा की गयी मांग को पूरा करना था।