Police Reform भारत में अपरिहार्य

LEGAL VIEWS न्यायालय
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दिव्यांश सिंह

भारत की पुलिस व्यवस्था औपनिवेशिक ढांचे पर आधारित है। बदलते वक्त के साथ Police Reform की मांग की जाती रही है। समय-समय पर पुलिस व्यवस्था (Police Reform) में सुधार के दावे भी किए जाते रहे हैं, लेकिन तथ्य कुछ और ही वास्तविकता बयां करते हैं। भारत में पुलिस विभाग के इतिहास पर नजर डालने पर हम पाएंगे कि 1857 की क्रांति, जिसने साम्राज्यवादी शक्तियों की जड़े हिला दी, और अंग्रेजों को मजबूरन शासन को अपने हाथों में लेना पड़ा, तब इन साम्राज्यवादी शक्तियों ने पुलिस बल की जरूरत महसूस की।

इसका उद्देश्य जनता पर अपने नियमों और कानूनों को थोपना था। साथ ही राजनीतिक दृष्टि से लाभप्रद स्थिति में रहना और साम्राज्यवादी पकड़ को मजबूत बनाना भी इसके प्रमुख उद्देश्यों में से एक था। इसके बाद पुलिस एक्ट-1861 को अधिनियमित किया गया, जिसमें बिना प्रश्न के पुलिस आदेशों का पालन करने पर मजबूर किया गया। बाद में पुलिस विभाग में खामियों की जांच के लिए 1902 में फ्रेजर आयोग का गठन किया गया। आयोग ने अपनी रिपोर्ट में साफ शब्दों में कहा कि पुलिस को जनता का विश्वास प्राप्त नही है। आयोग ने पुलिस व्यवस्था में सुधार और पुलिस कार्यप्रणाली में राजनैतिक दखलंदाजी कम करने पर जोर दिया। वर्ष 1947 में स्वतंत्रता के बाद भी राजनैतिज्ञों व वरिष्ठ पुलिस अधिकारीयों को पुलिस सुधार की कोई आवश्यकता महसूस नहीं हुई।

समय आगे बढ़ता है और धीमे-धीमे जनता को पुलिस व्यवस्था की खामियां चुभने लगती हैं। दरअसल 1975 के आपातकाल (Emergency) में, शासन के आदेशों पर जनता पर पुलिस ने कहर बरपाना शुरू किया। हजारों राजनैतिक प्रतिद्वंदियों को सलाखों के पीछे डाल दिया गया। तब लोगों को पहली बार पुलिस सुधार की इतनी अधिक आवश्यकता महसूस हुई। इसी दबाव में शाह आयोग का गठन हुआ और आयोग ने अपनी सिफारिशों मे जोर देकर कहा कि अगर ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकनी है, तो पुलिस को राजनैतिक प्रभाव से मुक्त करना होगा।

लेकिन सत्ता परिवर्तन के कारण आयोग की सिफारिशें ठंडे बस्ते में चली गईं। 1977 में सत्ता परिवर्तन हुआ और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में नई सरकार बनी। नई सरकार ने आते ही राष्ट्रीय पुलिस आयोग (Indian Police Commission) का गठन किया जिसका अध्यक्ष धर्मविरा (ICS) को बनाया गया। आयोग ने 1979-81 के मध्य आठ खंडों में अपनी सिफारिशें दीं, जिसके खंड दो में फिर से राजनैतिक दखलंदाजी खत्म करने की पुरजोर वकालत की गई। इससे पहले कुछ आगे बढ़ता, दिल्ली में एक बार फिर सत्ता परिवर्तन हुआ और इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) सत्ता में आईं और उन्होंने राजनीतिक प्रभाव मुक्ति के मुद्दे पर असहमति दिखाई, जिसका प्रभाव अखिल भारतीय स्तर पर यह हुआ कि राज्यों ने भी रिपोर्ट की सिफारिशों को गंभीरता से नहीं लिया और संस्थागत सुधार की बात फिर एक बार ठंडे बस्ते में चली गई।

राजनैतिक नियंत्रण के कारण पुलिस, कानून के शासन को जमीनी स्तर पर उतारने में विफल हुई। इसके बाद एक बार फिर पुलिस सुधार का जिम्मा यूपी के पूर्व पुलिस महानिदेशक रहे प्रकाश सिंह ने उठाया। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में 1996 में एक जनहित याचिका (PIL) दाखिल की जिसमें सुप्रीम कोर्ट के जाने माने वकील प्रशांत भूषण ने उनकी वकालत की। साल 2006 में प्रकाश सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने प्रकाश सिंह की सभी मांगे मान लीं, और सात निर्देश दिए जिनमें 6 राज्यों के लिए और एक भारत सरकार के लिए थे। निर्देशों में राज्य सुरक्षा आयोग के गठन का आदेश दिया गया जिसके आधे सदस्य सरकार से और आधे सामाजिक क्षेत्र से लिये जाने थे। इस आयोग का उद्देश्य पुलिस को राजनैतिक प्रभाव से मुक्त करना और खुद पुलिस अधिकारियों के आचरण और कार्यों की जांच करना था।

आयोग ने डीजीपी (DGP) चयन प्रक्रिया को और पारदर्शी बनाते हुए प्रोन्नति श्रेणी से तीन नाम यूपीएससी (UPSC) को दिए जाने का और यूपीएससी को डीजीपी का चयन इन्हीं तीन नामों से करने का आदेश दिया। साथ ही डीजीपी के कार्यकाल को 2 वर्ष का रखने का भी निर्देश दिया गया। इसके अलावा आयोग ने बड़े राज्यों/शहरों से पुलिस को क्राइम और कानून व्यवस्था जैसे कामों के लिए अलग-अलग कर्मचारियों को रखने का निर्देश दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि ये आदेश तब तक लागू होंगे जब तक राज्य अपना स्वयं का पुलिस एक्ट पारित नही कर लेते। सनद रहे कि पुलिस राज्य सूची का विषय है। ज्यादातर राज्यों ने होशियारी करते हुए जल्द ही अपने राज्य पुलिस एक्ट(Police Act) पारित कर दिए और सर्वोच्च न्यायालय के इन आदेशों को पालन न करने का तरीका निकाल लिया और कानून में राज्य सुरक्षा आयोग के फैसले का बाध्यकारी नहीं होने का प्रावधान किया।

असल में भारतीय पुलिस जनता की पुलिस होने की बजाय शासक की पुलिस मात्र बनकर रह गई है। यह स्वीकार कर लेने में हर्ज नहीं कि भारतीय पुलिस की छवि लगातार बिगड़ती जा रही है। लोगों में यह धारणा घर कर गई है कि पुलिस प्रशासन सत्ताधारियों के इशारे पर नाचता है, रिश्वत लेकर अपराधियों को बचाता है, विपक्षी कार्यकर्ताओं को झूठे मुकदमों में फंसाता है और सत्ता के इशारे पर लाठियां बरसाता है। सरकारें जो भी दलील दें, यह सच्चाई है कि पुलिस के आक्रामक चरित्र को गढ़ने-बुनने में राजनीतिज्ञों का ही हाथ है। सच्चाई यह है कि सरकारें पुलिस को अपने हाथ की कठपुतली बनाए रखना चाहती हैं। सरकारें अपने इशारे पर काम करने वाले पुलिस अफसरों को पुरस्कृत करती हैं।

यह स्वागतयोग्य है कि सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस व्यवस्था में पारदर्शिता को बढ़ावा देने के लिए सभी राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों को आदेश दिया कि वे एफआईआर दर्ज होने के 24 घंटों के भीतर उसे आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड करें। अदालत ने यह भी कहा है कि जहां इंटरनेट व्यवस्था दुरुस्त नहीं है वहां एफआइआर को 72 घंटों में सार्वजनिक किया जाए। इसके अलावा अदालत ने पुलिस महकमों को निर्देश दिया है कि राजद्रोह या विद्रोह, आतंकवाद और महिलाओं व बच्चों से जुड़े यौन अपराध के मामलों में एफआईआर को इंटरनेट पर अपलोड न किया जाए। इस निर्देश के पीछे अदालत की मंशा लोगों को राहत पहुंचाना की है ताकि वे आसानी से एफआईआर कर उसकी प्रतिलिपि प्राप्त कर सकें।

विभिन्न आयोगों, समितियों ने राज्यों में पुलिस की संख्या बढ़ाने और महिला कांस्टेबलों की भर्ती पर जोर दिया है। यह किसी से छिपा नहीं है कि पुलिस की कमी से आज राज्यों में कानून-व्यवस्था की हालत खस्ता है, पर पुलिसकर्मियों की संख्या बढ़ाने मात्र से हालात सुधरने वाले नहीं हैं। पुलिस की कार्य-प्रणाली में मूलभूत सुधारों की जरूरत है। आज भी ज्यादातर राज्य सरकारें पुलिस सुधार के मसले पर अपना रुख स्पष्ट करने को तैयार नहीं हैं। यह आनाकानी पुलिस सुधार को लेकर उनकी बेरुखी को दर्शाती है। प्रचार से जरूरी सुधार होते हैं। सरकारों को यह समझने की जरूरत है कि वे पुरानी चली आ रही जर्जर व्यवस्था से मुक्त हो ताजी और बेहतर व्यवस्था की ओर बढ़ें।

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