-आनंद सिंह
“Mamata को बर्बाद करने तक चैन से नहीं बैठने का प्रण लेने वाले मुकुल रॉय को चार साल बाद ही समझ में आ गया कि वह गलत थे। इन चार वर्षों में उन्हें वह सब करना, सुनना पड़ा, जिसके वह कभी आदी नहीं थे।”
पश्चिम बंगाल की राजनीति में शुक्रवार को भारी उथल-पुथल रहा। 2017 में ममता का दामन छोड़कर मुकुल रॉय भाजपा में चले गए थे, जहां उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया था। चार साल भाजपा में गुजारने के बाद मुकुल आज तृणमूल कांग्रेस (TMC) में फिर से आ गए, सपुत्र!
ये वही मुकुल रॉय हैं जिन्होंने कसम खाई थी कि जब तक Mamata को बर्बाद नहीं कर देंगे, चैन से नहीं बैठेंगे। चार साल बाद ही उन्हें समझ में आ गया कि वह गलत थे। इन चार वर्षों में उन्हें वह सब करना, सुनना पड़ा, जिसके वह कभी आदी नहीं थे।
चूंकि मुकुल अब तृणमूल (TMC) में वापसी कर चुके हैं तो यह आशंका भी है कि चिढ़ी हुई भाजपा उनके खिलाफ सीबीआई और ईडी का इस्तेमाल करे, क्योंकि Mamata सरकार के पहले और दूसरे टर्म में अनेक घोटालों में उनका भी नाम है। नाम तो शुभेंदु अधिकारी का भी है, पर चूंकि वह भाजपा में हैं तो शुद्ध हैं, उन पर कोई कार्रवाई होने से रही। वह बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं और उन्हें वाई श्रेणी की सुरक्षा भी प्राप्त है। अब देखना होगा कि चिटफंड घोटाले में मुकुल के खिलाफ क्या होता है।
एक दौर था, जब मुकुल ममता के राइट हैंड माने जाते थे। ममता ने सदैव उनका साथ दिया। तब ममता के बाद मुकुल ही सरकार और पार्टी के सर्वेसर्वा हुआ करते थे। 2017 में उनका ममता से मोहभंग हुआ और वह भाजपा की गोद में जा बैठे। भाजपा ने उनका इस्तेमाल सांगठनिक रूप से बंगाल में करना चाहा पर पार्टी की रीति नीति मुकुल के पल्ले नहीं पड़ी।
इस साल विधानसभा चुनाव में भी उन्हें बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी गई और न ही उनके हिसाब से टिकट वितरण ही हुआ। लिहाज़ा, मुकुल चुनाव तो लड़े और जीते भी पर जिस तरीके से वो तृणमूल के लिए चुनाव प्रचार करते थे, उस तरीके से भाजपा के लिए न कर सके। स्वाभाविक है, अपनी उपेक्षा से वह आज़िज़ आ गए थे।
यहां ममता को यह ध्यान रखना होगा कि मुकुल अब बहुत विश्वस्त नहीं रहे। उनसे गलबहियां करने के पहले 4 साल के उनके बयान ममता को जरूर याद रखना चाहिए। ये वो लोग हैं जो सत्ता की मलाई के वास्ते किसी को भी छोड़ सकते हैं और किसी की भी गोद में बैठ सकते हैं।