पर्यावरण (environment) का संरक्षण ही मानवीय जीवन का आधार

फीचर आलेख
Spread the love

अवधेश वर्मा, लेखक (लव यू पापा और माटी से मुकुट तक)

(awadhesh800@gmail.com)

‘लेखक मूलरूप से उत्तरप्रदेश के बहराइच जिले के रहने वाले हैं। सामाजिक मुद्दों पर मुखर रहने के साथ समसामयिक एवं राजनितिक मुद्दों पर लेख‌ लिखते रहे है। “लव यू पापा” इनकी पहली कृति थी जिसको पाठकों ने खूब सराहा है।’

 

Environment, प्रकृति  और सेहत के प्रति आज लोग जागरूकता दिखा रहे हैं, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। धीरे-धीरे ही सही लोगों के समझ में आने लगा है कि पर्यावरण से खिलवाड़ वस्तुतः अपने जीवन से खिलवाड़ है। जाहिर है कि “थिंक ग्लोबली, एक्ट लोकली” यानी सोचों विश्व स्तर पर एवं सुधार की शुरुआत और अपने स्तर पर की संकल्पना आज मूर्त रुप लेने लगी है। पर्यावरण के प्रति छेड़छाड को लोग अब इतनी सहजता से नहीं लेते है। आज के जागरुक लोग पर्यावरण के साथ खिलवाड़ करने वाली संस्था या शख्स को अदालत के कठघरे में खींच ले जाते है, ताकि दूसरे लोग पर्यावरण के साथ छेड़छाड़ का कदम न उठा सके। वस्तुतः 1970 के दशक में पर्यावरण के प्रति जागरुक और उत्साही लोगों ने पश्चिमी देशों में यह अभियान शुरु किया था, तब यह चिंता इस क्षेत्र के वैज्ञानिकों एवं विशेषज्ञों तक ही सीमित थी।

आम-जनमानस पर्यावरण शब्द से अनिभिज्ञ था, वही आज के समय में इंसानों की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं के कारण धरती लगातार खोखली होती जा रही है। किन्तु इंसानों को जब प्रकृति ने अपनी विनाशलीला दिखाना शुरु किया तब जाकर इंसान अपनी तन्ननिद्रा से जागा। एक के बाद एक भयावाह प्रकृतिक आपदाएं उदाहरण के तौर पर देखा जाये तो नेपाल के काठमांडू में धराशाई होता धराहरा टावर हो या उत्तराखण्ड़ के केदारनाथ में आयी प्रकृतिक आपदा हो या वर्तामान में वैश्विक महामारी कोरोना का कहर। इन सब विनाशकारी लीला के बाद इंसान प्रकृति के प्रति सजग हो गया एवं अपनी प्रवृत्ति के अनुसार प्रकृति के प्रति सहानुभूति एवं जागरूकता दिखाने लगा। नतीजतन प्रकृति को संरक्षित करने वाली संरक्षणवादी लहरें विश्व के हर कोने से उठने लगी है। पर्यावरण के हितैषियों का काफिला लगातार बढ़ता जा रहा है। पर्यावरण बचाने का पहला अधिकारिक एवं अन्तर्राष्ट्रीय समर्थन संयुक्त राष्ट्र सरीखी संस्था ने सन 1972 में स्टाकहोम में पहला विश्व पर्यावरण शिखर सम्मेलन अयोजित करके किया।

पर्यावरण के हितैषियों को दूसरा नैतिक बल सन 1998 में मिला, जब “वल्ड कमीशन ऑन इन्वायरमेन्ट” नामक संस्था ने दुनिया में हवा, भोजन, पानी, आवास, ऊर्जा, आदि के तेजी से गायब होती मौजूदा स्थिति का आकलन करती हुई खोज परक पुस्तक प्रकाशित की। अनेकों पड़ावों से होती हुई यह लहर अब 21वीं सदी में आ पहुंची है, जो यह चेतावनी देती है कि अभी नहीं तो कभी नही, अगर तुम अपना संरक्षण करना चाहते हो तो प्रकृति का संरक्षण करना सीखों। अगर पर्यावरण नहीं बचा तो तुम भी नहीं बचोगें। यकीनन धरती और पर्यावरण का वजूद खतरें में है। इस ओर विश्व के सभी देश ठोस कदम उठकर एक मंच पर आ रहे है, चाहे पेरिस समझौता हो या देश में चलाया जा रहा स्वच्छ भारत अभियान। सीएफसी जैसी ग्रीन हाउस गैसों के निस्सरण को कम करने, धरती को खतरनाक हद तक गर्म होनें से बचाने, मरुस्थलों के प्रसार को रोकने, लगातार जल के स्त्रोतों के सूखते एवं सिकुड़ते प्रवाह के संरक्षण, जल की खपत में संयम बरतने जैविक विविधता को बचाने, ओजोन परत के संरक्षण, वन्य जीवों के संरक्षण, प्रौधोगिकी हस्तान्तरण, पर्यावरण के संरक्षण के लिए खुली बहस हुई है। इसके लिए देश में आडॅ-ईवन, प्रदूषण नियंत्रण, पुराने वाहनों को रिटायर करने संबधी ठोस एंव कारगर कदम उठाये गये है।

फिर भी मनुष्य इतना भौतिकतावादी हो गया है कि वह प्रकृति का दोहन लगातार किये जा रहा है। विकास के नशें में मतान्ध होकर लगातार जंगलों को काटकर, भवन निर्माण, कल-कारखाने एवं गगनचुम्बी इमारतें खड़ा कर रहा है, आज के इस आधुनिक जीवनशैली और भागदौड़ भरी दुनियाँ में हम अपनी आने वाले पीढ़ी एवं बच्चों के कल को दाँव पर लगा रहे है। पर्वत जो कि हमारे देश की भाल कहे जाते थे, हमे स्वच्छ वायु एवं अनेकों औषधियाँ प्रदान करते थे। वो भी आज के भौतिकता वादी इंसान रुपी राक्षसों से सुरक्षित नही बच पाये है। ऋषि-मुनि शांति एवं तप के लिए पर्वतमालाओं का रुख करते थे। जहाँ आध्यात्म के साथ-साथ ईश्वरीय सूक्ष्म शक्तियाँ विघमान थी किन्तु आज वहाँ भी मानव के हाथ पहुँच गये है।लगातार हो रहे निर्माणों पहाड़ों को काटकर बनाये जा रहे मालॅ एंव अपनी सुविधा के लिए बनायी जा रही सुरंगों तथा लगातार बढ़ते जा रहे जनसंख्या के धनत्व को पहाड़ रोकने में असक्षम हो रहे है। और स्वयं अपने अस्तित्व के साथ लड़ते हुए केदारनाथ जैसी आपदा को जन्म दे रहे है। इंसान अब भी नही सजग हुआ तो केदारनाथ जैसे भयावाह त्रासदी और कोरोना जैसी वैश्विक महामारी आती रहेंगी इससे न इंसान बच पायेगा न पर्यावरण। वस्तुतः हम आज उस चौराहे पर खड़े है, ” जहाँ अभी नही तो कभी नही ” विनाश की रफ्तार तेज है एवं हम मन्द। यदि हम चाहते है कि हम भी रहे और पर्यावरण भी तो हमे अपने अन्दर परिर्वतन लाना होगा, नही तो फिर “अभी नही तो कभी नही”।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *