अक्षत मित्तल
“वसुधा का नेता कौन हुआ? भूखण्ड-विजेता कौन हुआ? अतुलित यश क्रेता कौन हुआ? नव-धर्म प्रणेता कौन हुआ?
– जिसने न कभी आराम किया, विघ्नों में रहकर नाम किया। है कौन विघ्न ऐसा जग में, टिक सके वीर नर के मग में?
– खम ठोंक ठेलता है जब नर, पर्वत के जाते पाँव उखड़, मानव जब ज़ोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है।”
ये पंक्तियां रामधारी सिंह दिनकर की हैं। कवि इन पंक्तियों में महाभारत का वर्णन कर रहे हैं। हालांकि मैं यहां महाभारत का जिक्र नहीं कर रहा।
पिछले दिनों महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) की पुण्यतिथि थी। इत्तेफ़ाक से मैं उस दौरान महाराणा (Maharana) की जन्म और कर्म भूमि राजस्थान में ही था। दुर्भाग्य से मैं पिछले हफ्ते उनके विषय में कुछ लिख नहीं पाया। सोचा इस हफ्ते का लेख उस स्वाधीनता के सबसे बड़े नायक को समर्पित करते हुए लिखा जाए। मेवाड़ के 13वें राजपूत राजा- राणा प्रताप सिंह की जयंती हर साल 9 मई को मनाई जाती है। राणा उदय सिंह (Rana Uday Singh) की मृत्यु के बाद 1572 में महाराणा प्रताप मेवाड़ के राणा बने थे। राणा हमीर सिंह के समय से चली आ रही राणा परम्परा के वह 13वें वाहक थे। इससे पहले मेवाड़ की गद्दी पर बैठने वाले को रावल की उपाधि दी जाती थी। मेवाड़ी शासक भगवान एक-लिंग जी की सर्वसत्ता के अधीनस्थ अपने आपको उनका प्रतिनिधि मानकर शासन करते हैं। शायद यही वह गौरवशाली वजह थी कि राणा प्रताप ने और किसी की सर्वसत्ता को स्वीकारने का कोई कारण और कुतर्क नहीं समझा।
महाराणा की जिंदगी के कई पहलू थे- राणा उदय सिंह और महारानी जयवंता बाई के सबसे बड़े पुत्र प्रताप, मेवाड़ के राणा प्रताप, महान योद्धा प्रताप, उत्कृष्ट रणनीतिकार प्रताप जिन्होंने मुगलों से मेवाड़ क्षेत्र की रक्षा की, भारत के पहले स्वतंत्रता सेनानी प्रताप, घास की बनी रोटी खाते प्रताप, माउंटेन मैन प्रताप, छापा मार युद्ध लड़ते प्रताप, भीलों के साथ मिलकर उदयपुर को मुक्त कराते प्रताप, भारत के सबसे ताकतवर योद्धाओं में से एक महाराणा प्रताप जिनका कद 7 फीट 5 इंच और वजन 110 किलो से भी ज्यादा था या कि 80 किलो का भाला, करीब 208 किलो के अन्य शस्त्र और 72 किलो के कवच के धारणकर्ता प्रताप। महाराणा के त्यागमय जीवन के ज्यादातर प्रसंगों से हम में से ज्यादातर लोग वाकिफ हैं।
सैफरन स्वोर्ड्स नाम की एक किताब है। उसमें हल्दी घाटी (Haldi Valley) के युद्ध के दौरान हुईं कुछ घटनाओं का विवरण किया गया है। मैंने सोचा उन पन्नों से क्यों ना आज अपने लेख और महाराणा की यादें दोनों ताजा की जाये। मुगलों की एक आदत थी- कि जब वे कोई राज्य जीत नहीं पाते तो उसके भीतर कलह पैदा करके उसे जीतने का सपना देखते। शायद यही वजह थी कि महाराणा के डर से खुद युद्ध भूमि में आने के बजाय अकबर ने अपने सेनापति मान सिंह (Maan Singh) को महाराणा से युद्ध करने भेजा। वजह यह थी कि एक राजपूत को दूसरे राजपूत से लड़ा देना और अन्य राजपूती और मारवाड़ी रियासतों में एक संदेश देना कि वो मुग़ल सर्वसत्ता को स्वीकार कर लें, लेकिन मान सिंह के हाथी पर चेतक और मान सिंह पर महाराणा भारी पड़े- राणा के एक भाले के वार से ही हाथी का सिंहासन और महावत दोनों कट गए थे। इसी प्रकार महाराणा ने अपने एक वार से ही बहलोल खान को घोड़े समेत बीच से काट दिया था।
एक और किस्सा चेतक (Chetak) का, जिसने राणा की जान बचाने के लिए अपनी स्वामिभक्ति दिखाते हुए एक विशाल नदी को छलांग लगा दी, जिसके कारण वह शहीद हो गया। चेतक महाराणा का पर्याय बन गया, लेकिन राणा के हाथी राम प्रसाद जो कई मुग़लों की मृत्यु का कारण था, वो भी कम नहीं था। राम प्रसाद की वीरता देख अकबर उसे अपने साथ शामिल करने के लिए ले आया और उसका नाम पीर प्रसाद कर दिया। हाथी को बेहतरीन भोजन दिया गया, लेकिन हाथी ने महाराणा की याद में ना कुछ खाया ना पीया और 18वें दिन वह भी दम तोड़ गया। राम प्रसाद की स्वामिभक्ति देखते हुए अकबर यह कहने पर मजबूर हो गया कि जब हम राणा के एक पशु को नहीं जीत पा रहे तो राणा को जीतने का विचार भी बेमानी है। बहुत कम लोग यह जानते हैं कि हल्दी घाटी में हारा हुआ ज्यादातर हिस्सा महाराणा ने छापामार युद्धों से फिर से जीत लिया था।
कुम्बलगढ़ में जन्में महाराणा प्रताप (Maharana Pratap) ने संघर्ष करते-करते चावंड में 19 जनवरी 1597 को अपनी अंतिम सांस ली और ऐसा प्रताप फैला गये जो युगों-युगों तक विश्व भर में अंधियारे को मिटाता रहेगा।