जयराम शुक्ल
-Sardar Patel चाहते थे कि पाकिस्तान से सभी हिन्दू सिख निकल आएं। मुसलमानों को लेकर उन्हें कोई चिंता नहीं थी क्योंकि उन्हें पाकिस्तान मिल चुका था…।
-यदि नेहरू कश्मीर की आशक्ति छोडकर पटेल के फार्मूले पर अड़ जाते तो आज लाहौर और कराँची हमारा होता”
31 अक्टूबर की तारीख का बड़ा महत्व है। आज के दिन ही Sardar Vallabhbhai Patel पैदा हुए थे। इस महान हस्ती को इतिहास के पन्ने से अलग कर दिया जाए तो हम भारतवासीयों की पहचान रीढविहीन और लिजलिजी हो जाएगी।

इसलिए इस दिन को मैं प्रातः स्मरणीय मानता हूँ।
हमारे शहर में पिछले बीस पच्चीस साल से Sardar Patel जयंती धूमधाम से मनाई जाती है। आयोजन का वैभव साल दर साल बढ़ता ही जाता है, यह स्वागतेय है। शुरुआत के चारपाँच वर्षों तक प्रसिद्ध समाजवादी विचारक जगदीशचंद्र जोशी के साथ मैं भी इस समारोह में वक्ता के तौर पर बुलाया गया। बोलने के लिए खूब तैयारी करता था। इस बहाने कई किताबें पढ डाली जिसमें वीपी मेनन की..यूनीफिकेशन आफ इंडियन स्टेट.. भी शामिल है।
पिछले कई वर्षों से यह जातिगत आयोजन हो गया है। हम जैसे जिग्यासु श्रोताओं के लिए कोई जगह नहीं। मैंने इसी आयोजन के जरिए जाना कि Sardar Patel कुर्मी थे। एक महामानव की जातीय पहचान के साथ ऐसी प्राणप्रतिष्ठा मुझ जैसे कई लोगों के लिए ह्दय विदारक है। यह वैसे ही है जैसे कृष्ण को अहीरों का देवता, राम को क्षत्रियों का और परशुराम को ब्राह्मणों का मान लिया जाए।
Patel जयंती पर वक्ता सिर्फ एक लाइन में ही बोलते हैं कि Sardar साहब के साथ बड़ा अन्याय हुआ। नेहरू को प्रधानमंत्री बनाकर उनका हक छीन लिया गया। Sardar यदि प्रधानमंत्री होते तो कश्मीर की समस्या कब की हल हो गई होती। घुमाफिरा के यही बात प्रायः सभी वक्ता यही कहते हैं।
मुझे याद है कि जोशी जी ने भाषण में यह स्पष्ट किया था कि जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्री पद के प्रस्तावक Sardar Patel ही थे। महात्मा गांधी ने नेहरू को जब अपना उत्तराधिकारी घोषित किया तो सरदार ने इसे समयोचित बताया।
जोशी जी ने यह भी कहा था कि उन परिस्थितियों में घरू मोर्चे पर जो काम Sardar कर सकते थे वे नेहरू नहीं कर सकते थे और जो काम नेहरू वैश्विक मोर्चे पर कर सकते थे वे सरदार नहीं कर सकते थे।
Sardar नेहरू से उम्र में बड़े थे, वे प्रधानमंत्री को जवाहर ही कहते थे और उनकी जो भी नीति ठीक नहीं लगती थी उस पर भरी सभा या बैठक में खरी-खरी सुना देते थे।
मुझे याद है कि मैंने जोशीजी की बात को आगे बढ़ाते हुए महाभारत में कृष्ण व बलराम का उदाहरण दिया। जिस तरह कई मसलों में कृष्ण और बलराम के बीच गंभीर असहमतियां थीं वैसे ही नेहरू और Patel में भी थीं लेकिन दोनों एक दूसरे के परस्पर पूरक थे। दोनों ही धर्मयुद्ध में व्यापक लोकहित के साथ थे।
नेहरू को उत्तराधिकारी घोषित करने के बावजूद गाँधी Patel की ज्यादा सुनते थे। आजादी के तत्काल बाद जब कबीलाईयों ने कश्मीर पर हमला किया और उनसे निपटने के लिए Patel ने पल्टन भेजी तो गांधी ने यह कहते हुए Sardar की पीठ थपथपाई कि ..यदि लोगों की प्राणरक्षा के आड़े कायरता आती है तो हथियारों का बेहिचक प्रयोग होना चाहिए। जबकि पूरा देश अहिंसा के पुजारी गांधी की प्रतिक्रिया की ओर देख रहा था।
जिन लोगों ने जातीय आधार पर Sardar की जयंती को बढ़चढ़कर मनाना शुरू किया दरअसल वे कुछ भी गलत नहीं कर रहे हैं। मोदीजी की सरकार के आने के पहले तक यदि वे जयंती नहीं मनाते तो कोई दूसरे मनाने वाले थे भी नहीं।
जिस कांग्रेस के लिए सरदार ने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया उस कांग्रेस ने उन्हें तो विस्मृत ही कर दिया था। कांग्रेस का सबसे बंटाधार चापलूसी की संस्कृति ने ही किया। इस संस्कृति को शीर्ष नेतृत्व ने ही पाला पोषा।
सबको याद होगा कि अस्सी से पचासी का दशक संजयगांधी के नाम रहा। सरकारी मूत्रालय से लेकर औषधालय तक सबकुछ संजय की स्मृति के हवाले। आज भी देश के कई राष्ट्रीय संस्थानों में संजयगांधी का नाम टंका है। संजय गांधी की कुलमिलाकर योग्यता थी प्रधानमंत्री का बेटा होना। देश पर इमरजेंसी की दूसरी गुलामी थोपने के पीछे संजयगांधी मंड़ली की निरंकुश स्वेच्छाचरिता रही।
सन् अस्सी के बाद चापलूसी की संस्कृति ऐसे सैलाब बनकर उमड़ी की कांग्रेस के वांंग्मय से दादाभाई नौरोजी,लोकमान्य तिलक,गोखले,सरदार पटेल,मौलाना आजाद, जीबी पंत,डा.राजेन्द्र प्रसाद,रफी अहमद किदवई, लालबहादुर शास्त्री जैसे सभी महापुरूषों के पन्ने बह गए। सुभाषचंद्र बोस और बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर से तो कांग्रेस शुरू से ही अदावत मानती रही।
कांग्रेस को गाँधी-नेहरू खानदान तक समेट दिया गया। यह उसी का परिणाम है कि कांग्रेस जैसी महान पार्टी आज माँ-बेटे तक सिमट चुकी है, बाकी जो हैं उनकी पहली और आखिरी अनिवार्य योग्यता सिर्फ चापलूसी है। सो कांग्रेस ने जिस तरह Sardar Patel की स्मृतियों को बिसराया वह कोटि-कोटि लोगों के लिए पीड़ाजनक रहा।
गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है-
जद्दपि जग दारुन दुख नाना।
सबते कठिन जाति अपमाना।।
जातीयता का अपमान सबसे भीषण होता है। विद्रोह की ज्वाला यहीं से धधकती है। यहां जातीयता के मायने अस्मिता से है, पहचान से है। स्वाभाविक है जब ऐसी उपेक्षा समझ में आई तो लोगों का आत्मगौरव जागा।
महाराष्ट्र में लोकमान्य तिलक,शिवाजी की भाँति दैवतुल्य व प्रातः स्मरणीय हैं क्योंं ? क्योंकि दिल्ली की खानदानी सल्तनत ने अपनी श्रेष्ठता के आगे सबको तुच्छ माना।
क्या आप यह नहीं मानते कि यदि काशीराम नहीं पैदा हुए होते तो बाबासाहेब को कोई पूछता। काशीराम ने भी वही जातीय स्वाभिमान जगाया। लोगों को गोलबंद किया बाबासाहेब के नाम से। सत्ता तक पहुंचे, पहुँचाया बाबासाहेब के नामपर।
बाबासाहेब का नाम भी वोट के काम आ सकता है अब यह सभी भलीभांति जान गए हैं। Sardar Patel भी अब वोट के लिए पूजे जाने शुरू हुए हैं। हम खुदगर्ज लोग हैं ही ऐसे कि यदि बाप भी किसी काम का नहीं तो जाए सत्रासौसाठ में। और किसी अघोरी से भी काम सधे तो फिर वही परमपिता परमेश्वर।
कश्मीर को लेकर अक्सर कहा जाता है कि Sardar Patel होते तो यह समस्या कब की दफन हो चुकी होती। पत्रकार कुलदीप नैय्यर की जीवनी है..बियांड द लाइन्स..। नैय्यर साहब ने पूरे शोध व दस्तावेजों का हवाला देते हुए आजादी,बँटवारे से लेकर मनमोहन सिंह के समयकाल तक की कथा लिखी है।
नैय्यर एक जगह लिखते हैं -..पटेल चाहते थे कि पाकिस्तान से सभी हिन्दू सिख निकल आएं। मुसलमानों को लेकर उन्हें कोई चिंता नहीं थी क्योंकि उन्हें पाकिस्तान मिल चुका था…।
दरअसल पटेल इस बात को लेकर स्पष्ट थे कि जब पाकिस्तान बन ही गया है तो सभी मुसलमानों को पाकिस्तान जाना चाहिए व सभी हिन्दुओं को भारत में।
पाकिस्तान के शहरों व सरहद पर हिंदू काटे मारे जा रहे थे और इधर नेहरू मुसलमान बस्तियों में घूम घूमकर उन्हें निर्भय यहीं रहने की आश्वस्ति दे रहे थे।
नैय्यर ने अपनी किताब में लिखा है- यह सच है कि नेहरू कश्मीर को भारत में मिलाना चाहते थे लेकिन Patel इसके खिलाफ थे।
Patel ने शेख अब्दुल्ला से कहा- चूंकि कश्मीर मुसलमानों की बहुसंख्यावाला क्षेत्र है इसलिए उसे पाकिस्तान के साथ मिलाना चाहिए। जब महाराज हरी सिंह ने कश्मीर को भारत के साथ मिलने की इच्छा जाहिर की तब भी पटेल ने कहा- हमें कश्मीर में टाँग नहीं अड़ाना चाहिए। हमारे पास पहले से ही बहुत सी समस्याएं हैं।
कश्मीर नेहरू जी की ग्रंथि रहा। एक बार एक अँग्रेज अधिकारी से उन्होंने व्यक्त किया कि – जिस तरह मैरी के दिल पर केलइस लिखा हुआ है उसी तरह मेरे दिल पर कश्मीर लिखा हुआ है।
Patel का ये अनुमान था कि भविष्य में कश्मीर स्थाई समस्या बनने वाला है इसलिए उनके पास कश्मीर के मुद्दे को हमेशा के लिए दफन करने का उनका अपना फार्मूला था।
वे चाहते थे कि प्रस्तावित पाकिस्तान का पंजाब व सिंध भारत का हिस्सा बने और इसके एवज में पूरा कश्मीर पाकिस्तान को दिया जा सकता है। पंजाब और सिंध में हिन्दू बहुसंख्यक थे। बटवारे की कीमत सबसे ज्यादा इन्हें ही चुकानी पड़ी।
यदि नेहरू कश्मीर की आशक्ति छोडकर Patel के फार्मूले पर अड़ जाते तो आज लाहौर और कराँची हमारा होता। Patel की इसी यथार्थवादी सोच ने उन्हें राष्ट्रवादियों का नायक बना दिया जिस वजह से नेहरू खानदान के करिश्मे से बँधे काँग्रेसी पटेल का नाम भी मुँहतक लाने से परहेज करने लगे।