कमलेश पांडेय
विभिन्न प्रकार के तनावों से गुजर रहे देश-दुनिया के लोगों को चाहिए कि वे शिव-दर्शन (Shiv Darshan) का अनुकरण करें। क्योंकि यह लोकतांत्रिक है, धर्मनिरपेक्ष है और सर्वकालिक है। इसमें सार-असार दोनों समाहित है। जीवन जगत के लिए इससे बेहतर आजतक कुछ नहीं हासिल हुआ। आगे होगा भी नहीं, क्योंकि संसार के सभी धर्मों के अनुयायी जिस परम सत्ता का अनुशीलन करते हैं, यह वही एकनिष्ठ शिव दर्शन है।
बहुतेरे लोग इसकी विविधता में भी एकता का दर्शन करते हैं, क्योंकि यह प्रकृति प्रेरित है। यह प्रकृति प्रेमी है। यह हर प्रकार की विकृति से बचने का आचरण प्रदान करता है। यह प्राणिमात्र से प्रेम करने को उत्प्रेरित करता है। यह लोककल्याण को प्रोत्साहित करता है, जिसमें जनकल्याण निहित है। निजस्वार्थ वश हमलोग इसे समझने की कोशिश नहीं करते हैं, जो कि हमारी अज्ञानता है। हमलोग दुनियावी ऊलजुलूल बातों में फंस जाते हैं, इसलिए अपनी अपनी अंतर्रात्मा को जगाते रहने वाले शिव-दर्शन का साक्षात्कार कभी नहीं कर पाते हैं। जिन्होंने कर लिया, उनका तीसरा नेत्र यानी विवेक जागृत हो गया।
देवाधिदेव महादेव को आदिदेव-आदिगुरु समझा जाता है। उनका जीवन दर्शन सभी काल में प्रासंगिक है, क्योंकि लोककल्याणकारी है। सभी ज्ञात सभ्यताओं में शिवलिंग के अस्तित्व के प्रमाण किसी न किसी रूप में अवश्य मिले हैं। इसलिए हमें निर्द्वन्द्व भाव से यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि शिव कौन हैं, शिव क्या हैं, शिव कैसे हैं, यह जानने समझने की जिज्ञासा सभी में रहती है, रहनी भी चाहिए।
शिव संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है कल्याणकारी या शुभकारी। ‘शि’ का अर्थ है पापों का नाश करने वाला, जबकि ‘व’ का अर्थ देने वाला यानी दाता।
शिव की दो काया है- एक वह, जो स्थूल रूप से व्यक्त किया जाए, और दूसरी वह, जो सूक्ष्म रूपी अव्यक्त लिंग के रूप में जानी जाती है। शिव की सबसे ज्यादा पूजा लिंग यानी शिवलिंग रूपी पत्थर के रूप में ही की जाती है।
हालांकि, लिंग शब्द को लेकर बहुत भ्रम होता है। संस्कृत में लिंग का अर्थ है चिह्न। इसी अर्थ में यह शिवलिंग के लिए इस्तेमाल होता है। शिवलिंग का अर्थ है शिव यानी परमपुरुष का प्रकृति के साथ समन्वित-चिह्न। यजुर्वेद में शिव को शांतिदाता बताया गया है।
तत्वदर्शी बताते हैं कि शिव मूर्त हैं। शिव अमूर्त हैं। शिव एकाकार हैं। शिव निराकार हैं। शिव सत्य हैं। शिव अनंत हैं। शिव अनादि हैं। शिव भगवंत हैं। शिव ओंकार हैं। शिव ब्रह्म हैं। शिव शक्ति हैं। शिव भक्ति हैं। शिव उत्सव हैं। उनके जीवन उत्सव का दिन ही महाशिवरात्रि हैं, जो जीवन से जीवन सरिता के सलिल प्रवाह का द्योतक है। इसलिए सभी चिंतकों से इस विश्व ब्रह्मांड की अपेक्षा रहती है कि शिव चेतना के विस्तार का वाहक बनिए, इसके सर्वकालिक मायने समझिए। इसके निरन्तर अनुशीलन से इस देश-दुनिया को हिंसा-प्रतिहिंसा की चपेट झुलसने से, दहकने से बचाया जा सकता है।
शिव के सार को यदि संक्षिप्त शब्दों में कहूँ तो वह यह होगा कि यदि आप अपनी परिस्थिति नहीं बदल सकते हैं तो कम से कम एक बार अपने मन की स्थिति यानी मनःस्थिति को बदल कर देखिए, जीवन दर्शन में बहुत कुछ परिवर्तन महसूस होगा, दृष्टिगोचर होगा। इस जीवन जगत में खुद के प्रति बहुत कुछ बदला-बदला सा या बदला हुआ आप अनुभूत करेंगे। यही वह शिवत्व भाव है, जिससे यह दुनिया एकनिष्ठ हो सकती है। इस शिव चेतना का विस्तार कीजिए। भगवान भोलेनाथ दुनिया के ऐसे पहले देवता हैं, जिन्हें सबकुछ प्रिय है। शिव टोली में सबकुछ शामिल है, समादृत है।
शिवत्व का अर्थ ही है प्रगति यानी निरन्तर कल्याण। भारतीय ऋषिगण भी बोलते आये हैं कि यत् सत्यं तत् शिवं, यत् शिवं तत् सुंदरं। यानी यह मानकर चलें कि जो सत्य है, वही शिव है और जो शिव है वही सुंदर है। सत्यम शिवम सुंदरम सम्बन्धी जीवन दर्शन भी एक प्रमाणित और मंगलमयी जीवन कसौटी है। कहा भी गया है कि शास्त्र को समझना हमारी बुद्धि की जिम्मेदारी है। शास्त्र को समझने के साथ-साथ उससे हमारे अनुभव का भी तालमेल बैठना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता है तो काम बिगड़ने लगता है।
(कमलेश पांडेय वरिष्ठ स्तंभकार, लेखक, पराविद्या चिंतक एवं वास्तु विशेषज्ञ हैं। ये उनके स्वतंत्र विचार हैं।)