बोल कि लब आजाद (free) हैं तेरे

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दिव्यांश सिंह

“बोल कि लब आज़ाद (free) हैं तेरे
बोल ज़बाँ अब तक तेरी है
बोल कि सच ज़िंदा है अब तक
बोल जो कुछ कहना है कह ले”

अक्सर जब अभिव्यक्ति की आज़ादी पर बात उठती है, तो फैज़ की इस कालजयी रचना को याद किया जाता है, लेकिन मेरे विचार में इस नज़्म का अभिव्यक्ति की आज़ादी से इतना संबंध नहीं है, जितना कि विषम परिस्थितियों में भी अपने विचारों को अभिव्यक्त करने का महत्व इसमें झलकता है।

कहीं तानाशाहों के हुक्म ने, तो कहीं धर्म और परंपरा ने लोगों के होंठों को सिल दिया है। सरकार की आलोचना करने पर लोगों को देशद्रोही कहा जा रहा है, और उन पर देशद्रोह का मुक़दमा चलाया जा रहा है। सिर्फ़ किसी नेता का कार्टून बना देना आज फज़ीहत का विषय बनता जा रहा है।

व्यवस्था में फैले हुए भ्रष्टाचार को उजागर करने वाले व्हिसल-ब्लॉअर्स को जेल में डाला जा रहा है, या जान से मार दिया जाता है। पत्रकारों को एक रिपोर्ट की वजह से अपने टीवी चैनल से इस्तीफ़ा देना पड़ रहा है। सोशल मीडिया पर लोगों को निर्दयी रूप से ट्रोल किया जा रहा है। उदाहरण देने लगूँ तो कई पन्ने भर जाएँगे।

आज की तारीख बड़ी ही ऐतिहासिक है। आज ही के दिन अर्थात 30 मई, 1826 ई. को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारतवर्ष की सरजमीं पर पंडित युगल किशोर शुक्ल के द्वारा कलकत्ता से प्रथम हिन्दी समाचार पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ का प्रकाशन आरंभ किया गया था। उदन्त मार्तण्ड नाम, उस समय की सामाजिक परिस्थितियों का संकेतक था, जिसका अर्थ है- ‘समाचार सूर्य’। यूं तो साप्ताहिक समाचार पत्र उदन्त मार्तण्ड के प्रकाशन के पूर्व राजा राम मोहन राय ने सबसे पहले प्रेस को सामाजिक उद्देश्य से जोड़ा और भारतीयों के सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक हितों का समर्थन किया, लेकिन इसे व्यवस्थित रूप से चलाने का श्रेय जाता है युगल किशोर शुक्ल को। अंग्रेजी हुकूमत का वो बर्बर दौर, जिसमें भारतीय जनमानस गुलामी की मानसिकता में पूर्ण दीक्षित हो चुका था, उस वक्त किसने यह कल्पना की होगी कि, 30 मई, 1826 ई. को रोपित हिंदी पत्रकारिता का बीज, भविष्य में इतना बड़ा स्वरूप ग्रहण कर लेगा। कभी लोकतंत्र के चतुर्थ स्तम्भ के रूप में यह परिभाषित किया जायेगा।

प्रथम हिंदी पत्र और आज की पत्रकारिता की चुनौतियों के बाद कुछ बात हिंदी की ना हो तो बात अधूरी रह जाएगी जो भारत में लगभग चालीस प्रतिशत लोगों की प्रत्यक्ष भाषा है और लगभग तीस प्रतिशत लोगों की दूसरी भाषा या अप्रत्यक्ष भाषा है। इस तरीके से अगर हम आंकड़े देखें तो लगभग देश के 70 फीसदी लोग हिंदी भाषा के जानकार हैं या कहा जा सकता है कि टूटी-फूटी हिंदी बोल और समझ सकते हैं ।

एक बड़ी बहस यह हमेशा से रही है कि भारत में आजादी के पूर्व और पश्चात की हिंदी भाषा को भारत की राष्ट्रभाषा क्यों नहीं घोषित की जा रही है, चाहे पाटलिपुत्र हो, दिल्ली हो या आगरा, ये प्रमुख स्थान हिंदी भाषी ही रहे हैं।

देश के दो बड़े सामाजिक आंदोलन – भक्ति आंदोलन तथा स्वतंत्रता आंदोलन हिंदी भाषा के दम पर ही सफल हुए हैं।
असल में किसी देश का विकास उसकी भाषा, संस्कृति, परंपरा जैसी चीजों पर ही निर्भर होता है, क्योंकि ये चीजें एक क्रमिक विकास के परिणामस्वरूप हमारे पूर्वजों के अथक प्रयास और उनकी इनके प्रति निष्ठा के कारण ही हमें प्राप्त होती हैं, जिन्हें हमें पूर्ण सम्मान और समर्पण की भावना से उसे न सिर्फ अपनाना चाहिए, बल्कि उसे उसके सर्वोच्च स्तर तक पहुंचाने में अपने को झोंक देना चाहिए।

राष्ट्रभाषा, राष्ट्र की सांस्कृतिक एवं राजनीतिक एकता की जागृति की निशानी होती है। प्रत्येक समुन्नत, स्वाभिमानी देश की अपनी राष्ट्रभाषा है जैसे इंग्लैंड, अमेरिका, फ्रांस, रूस , चीन आदि, जबकि हिंदी को लेकर सभी में इस बात की स्वीकार्यता है कि संपर्क भाषा के रूप में इसने राष्ट्र में अपने प्रतिमान स्थापित किए हैं। अगर हम संवैधानिक दायरे में रहकर सिर्फ हिंदी भाषी राज्य संसद की लगभग 40 से 50 प्रतिशत सीटों का प्रतिनिधित्व करते हैं, तो आंदोलन या फिर राजनीतिक दबाव डालें तो भारत जैसे जीवंत लोकतंत्र में यह संभव है कि हम अपने इस पाक मंसूबों में सफल हो जाएं, बस कमी है तो मुद्दे को प्राथमिकता देने और जन जागरूकता की।

पत्रकारिता का क्षेत्र भी अब इस भूमंडलीकरण का शिकार होता जा रहा है। कॉरपोरेट घरानों का पैसा, सच्चाई का गला घोंटने का काम कर रही है।

“पहले जो अखबार छप के बिकते थे
आज बिककर छप रहे हैं ”

यह हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है कि ऐसी पत्रकारिता से अपने देश और समाज की रक्षा करें, जन जागरूकता के माध्यम से ऐसे पत्रकारों और उनके बिके हुए आकाओं को जनता के सामने एक्सपोज करें ।

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के तौर पर जो जिम्मेदारी इस स्तंभ की है, अगर उसे ही निभाने में असफल रहे तो उसका सीधा असर समाज और देश के राजनीतिक, सामाजिक और नैतिक विघटन के रूप में और भी विकराल रूप धारण करके एक दैत्य रूप में आने वाले कल में हमारे सामने होगा, क्योंकि पत्रकारिता ही वह सेतु है जो योजनाओं, कार्यक्रमों और भविष्य की योजनाओं के रूप में जनता को सरकार से और सरकार को जनता से जोड़ती है।

तो समय आ गया है कि लोग अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी सुनिश्चित करायें और देश निर्माण में अपनी अहम भूमिका का निर्वहन करें, जिससे हम अपने सपनों के भारत को वैसा ही बनाएं, जैसा संविधान की प्रस्तावना, जैसे उसमें वर्णित नीति निर्देशक सिद्धांत और गांधी का रामराज्य ।

आओ हम सब मिलकर बनाए ,
अपने सपनों का भारत महान ।।

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