घर-घर राशन योजना (Ration Scheme) रोकना कहीं भारी न पड़ जाए भाजपा को 

समाचार प्रादेशिक
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आनंद सिंह

“Ration Scheme दिल्ली सरकार की महत्वाकांक्षी योजना थी लेकिन इस पर कथित तौर पर भाजपा द्वारा पानी फेरने का प्रयास किया गया।”

दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार, दोनों इन दिनों चर्चा में हैं। चर्चा में तो ये दोनों सरकारें लगातार रहती हैं पर इस बार बात अलग है। एक बेहतरीन योजना, जो दिल्ली सरकार चलाने की तैयारी कर चुकी थी, उसमें पलीता लगा दिया गया। केजरीवाल सरकार चाहती थी कि जो जरूरतमंद लोग हैं, उन्हें उनके घर में ही राशन पहुंचाया जाए। वैसे भी यह कोरोना काल है, तो सरकार की सोच तो अच्छी थी। भाजपा को शायद लगा कि अगर केजरीवाल सरकार ने यह योजना शुरू कर दी तो राज्य सरकार काफी हद तक लोकप्रिय हो जाएगी। इसलिए, इस पर शक जाहिर किया गया, आशंका जताई गई। पिछले दिनों केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस किया और आशंका जताई कि अगर यह योजना लागू हो जाती है तो इसमें ज़बरदस्त घोटाला होगा। रविशंकर प्रसाद ने कहा, “दिल्ली सरकार राशन माफिया के नियंत्रण में है। देश के गरीबों को मुफ्त राशन मिलता है। राशन की होम डिलीवरी में घोटाले होंगे, कौन जिम्मेदार होगा?” प्रसाद के प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद पहले डिप्टी चीफ मिनिस्टर मनीष सिसौदिया ने और बाद में केजरीवाल ने  प्रेस कॉन्फ्रेंस की। दोनों के कथन का लब्बोलुआब यह था कि अगर दिल्ली की जनता को घर बैठे राशन मिले तो क्या गलत है? दोनों का कहना था कि सरकार हर कदम पर उन्हें परेशान करती रहती है। सिसौदिया ने तो यहां तक कह दिया कि भाजपा के लोगों को हमें गाली देने के अलावा कोई काम तो है नहीं। हम कोई काम करना भी चाहते हैं तो उसमें लंगड़ी मार दी जाती है। दरअसल केजरीवाल सरकार की इस नई योजना के तहत प्रत्येक राशन लाभार्थी को चार किलो गेहूं का आटा, एक किलो चावल और चीनी अपने घर पर प्राप्त होना था।  इसी योजना के जरिये राशन कार्ड उपयोगकर्ताओं के बायोमेट्रिक और आधार सत्यापन के साथ-साथ राशन की घर-घर डिलीवरी शुरू होनी थी। अब इसमें जिस तरीके से लंगड़ी मारी गई है उसे देखकर नहीं लगता कि ये योजना कभी मूर्त रूप भी ले सकेगी। वास्तव में यह योजना केजरीवाल का एक महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट है। इसकी तैयारी आज से नहीं बल्कि तीन साल पहले से चल रही थी। पहले इस योजना का नाम मुख्यमंत्री घर घर राशन योजना रखा गया था। राज्य सरकार की बातों पर गौर करें तो 2018 से, दिल्ली सरकार ने केंद्र सरकार को छह पत्र लिखे और इस योजना के बारे में बताया।  यहां तक कि केंद्र सरकार के सभी सुझावों को स्वीकृति के बाद दिल्ली सरकार ने 24 मई 2021 को उप राज्यपाल को अंतिम स्वीकृति और योजना के तत्काल लागू के लिए फाइल भेजी थी, लेकिन उप राज्यपाल ने फाइल वापस कर दी। उनका तर्क था कि यह योजना दिल्ली में लागू नहीं की जा सकती। उनका तर्क था कि इस योजना को केंद्र सरकार द्वारा अनुमोदित नहीं किया गया है और यह भी कि योजना के खिलाफ कोर्ट में एक मामला चल रहा है। इन्हीं दो तर्कों के सहारे इस योजना को ठंडे बस्ते में रख दिया गया।  वास्तव में, ऐसी योजनाएं अवश्य चलनी चाहिए। अगर कहीं कोई कील कांटा है तो उसे दूर करना चाहिए, क्योंकि अंततः योजना का लाभ आम जनता को ही मिलना है। अब चूंकि दिल्ली में केजरीवाल की सरकार है और यह योजना अगर लागू हो जाती तो संभव है कि सरकार की लोकप्रियता और बढ़ जाती, लेकिन इसे राजनीतिक विवाद का केंद्र बना दिया गया। यह बात भी समझ से परे है कि आखिर यह योजना दिल्ली में क्यों नहीं लागू की जा सकती, जो उपराज्यपाल का तर्क है? क्या दिल्ली में लोग नहीं रहते? क्या वो बिजी नहीं होते? क्या हर घर में राशन पहुंचाया जाता तो दिल्ली के नागरिक मना कर देते? क्या दिल्ली में रहने वाले गरीब लोग राशन पाकर थोड़ा चैन नहीं लेते? कहीं न कहीं मन में यह भाव जरूर होगा कि राशन के योग्य लोग अगर घर बैठे राशन पा जाएंगे तो हो सकता है, आगामी विधानसभा चुनाव में वे झाड़ू छाप को ही वोट दे देते!   दरअसल, ये सियासत है ही ऐसी चीज जिसमें लोक कल्याण की भावना से किये गए कार्य को भी सियासी चश्मे से देखकर पंक्चर कर दिया जाता है। आज नहीं तो कल, ये सवाल जरूर पूछा जाएगा कि अगर हमारे घरों तक राशन आ रहा था तो उसे रोकने का फैसला क्यों किया गया? तब शायद किसी को जवाब देते भी न बने।

छह जून को क्या कहा था केजरीवाल ने

देश में अगर स्मार्टफोन, पिज्जा की डिलीवरी हो सकती है तो राशन की क्यों नहीं? आपको राशन माफिया से क्या हमदर्दी है प्रधानमंत्री सर? उन गरीबों की कौन सुनेगा? केंद्र ने कोर्ट में हमारी योजना के खिलाफ आपत्ति नही की तो अब खारिज़ क्यों किया जा रहा है? कई गरीब लोगों की नौकरी जा चुकी है। लोग बाहर नही जाना चाहते, इसलिए हम घर-घर राशन भेजना चाहते हैं। क्या हम कोई खराब काम कर रहे हैं?

दिल्ली और केंद्र सरकार के बीच प्रारम्भ से ही अनेक मुद्दों पर सियासी विरोध देखने को मिला है।    अगर कोई परियोजना दिल्ली की सरकार शुरू करना चाहती है तो अनेक बार ऐसा देखा गया है कि उप राज्यपाल कभी उसे वापस कर देते हैं तो कभी प्रतिकूल टिप्पणी कर देते हैं। अभी हाल ही में कोरोना वैक्सीन को लेकर मनीष सिसोदिया केंद्र पर हमलावर थे। उन्होंने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि केंद्र से सवा करोड़ वैक्सीन मांगे गए थे और दिया गया मात्र ढाई लाख। उन्होंने कुछ राज्य सरकारों की सहायता करने के बजाय उन्हें “अपशब्द” कहने का आरोप लगाया। सिसोदिया ने दिल्ली सरकार की घर-घर राशन पहुंचाने की योजना पर केंद्र की आपत्ति को लेकर कहा कि भाजपा ‘भारतीय झगड़ा पार्टी’ बन गई है। केंद्र के पास कुछ राज्य सरकारों को भला-बुरा कहने के अलावा कोई काम नहीं बचा है। पूरी केंद्र सरकार और भाजपा तीन-चार राज्यों के मुख्यमंत्रियों को निशाना बना रही है। केंद्र बस तभी काम करता है जब उच्चतम न्यायालय उसे फटकार लगाता है। सिसोदिया का कहना था कि चार पत्र केंद्र को भेजे गए, जिसमें दिल्ली को कितनी वैक्सीन चाहिए, उसका लेखा-जोखा था। अब केंद्र सरकार झूठ बोल रही है कि हमने मात्र ढाई लाख वैक्सीन मांगे थे। मनीष सिसोदिया ने कहा, “मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि केंद्र सरकार झूठ क्यों बोल रही है। क्या ये जो चार चिट्ठियां केंद्र को लिखी गई हैं, ये झूठी हैं? ”   दरअसल, आम आदमी पार्टी की सरकार जब से दिल्ली में चल रही है, तभी से उप राज्यपाल के माध्यम से ऐसे ऐसे सवाल खड़े कर दिए जाते हैं जो आम जनता को भी चौंकाते हैं। घर-घर राशन की बात हो या सरकारी स्कूलों में बढ़िया शिक्षा की, मोहल्ला क्लिनिक की बात हो या फिर जनसेवा की, आम आदमी पार्टी की सरकार केंद्र को खटकती रही है। ये खटकना स्वाभाविक भी है, क्योंकि भाजपा के चाणक्य हर बार दिल्ली में फेल हुए हैं। दो चुनावों में ये साफ देखा गया कि केंद्र ने पूरी ताकत झोंक दी, लेकिन जनता ने केजरीवाल सरकार में ही अपना भविष्य देखा। ‘किसी भी कीमत’ पर जीत की चाह रखने वाली भाजपा को दिल्ली में केजरीवाल सरकार की लोककल्याणकारी नीतियों में भी खोट दिख रहा है तो ये अकारण नहीं है! सबसे बड़ा कारण है भाजपा का चुनावों में पराजय और यही पराजय का बोध भाजपा से उल्टे सीधे कार्य करवाता है, लेकिन ये लोकतंत्र है। जब इतने लोग कोरोना के वक्त असमय काल के गाल में चले गए तो जनता के मन में भी चल रहा है कि इतनी मौतों के लिए जिम्मेदार कौन है! देर-सबेर इसका भी फैसला हो ही जायेगा क्योंकि ये पब्लिक है जो सब जानती है।

(लेखक तीन दशक से सक्रिय पत्रकारिता से जुड़े हैं, सम्प्रति दैनिक राष्ट्रप्रहरी के संपादक हैं)

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