Petrol-Diesel की बढ़ती कीमतों के पीछे के आंकड़े!

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अक्षत मित्तल

Petrol-Diesel की कीमतें अब ज्यादातर शहरों में 100 रुपये प्रति लीटर के निशान को पार कर चुकी हैं, तो राजनीति में दोषारोपण का एक नया दौर शुरू हुआ है।

कभी थॉमस जेफसरसन ने कहा था कि “हमारा ताजा इतिहास हमें सिर्फ इतना बताता है कि कौन सी सरकार कितनी बुरी थी।” यूं तो जेफसरसन का यह कथन काफी पुराना है, लेकिन आज भी यह कई हालातों में चस्पा हो जाता है। इतिहास के किसी भी कालखंड में किसी ने भी यह कल्पना शायद ही की होगी कि हम एक लीटर पेट्रोल-डीजल के लिए 100 रुपये से भी अधिक का भुगतान ख़ुशी-ख़ुशी कर रहे होंगे।
अब जब ज्यादातर शहरों में पेट्रोल-डीजल की कीमतें 100 रुपये प्रति लीटर के निशान को पार कर चुकी हैं, तो राजनीति में दोषारोपण का एक नया दौर शुरू हुआ है। कभी इन बढ़ती कीमतों का दोष यूपीए सरकार के दौरान लिए गए तेल बॉण्डों को दे दिया जाता है कभी किसी और कारक को। एक बात तो तय है कि राजनीतिक पार्टियां इस महंगाई को किसी और कारण से ज्यादा अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के रूप में देखती हैं। तथ्यों को परखने पर हमें आंकड़े चौंकाने वाले मिलेंगे। यह पहली बार नहीं है कि ईंधन की बढ़ती कीमतों को लेकर सरकार ने पूर्व की यूपीए सरकार पर दोष डाला है।
वर्ष 2018 में जून की भीषण गर्मी में, पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा था, “कांग्रेस पार्टी ने 1.44 लाख करोड़ रुपये के तेल बांड खरीदे जो हमें विरासत में मिले हैं। इतना ही नहीं, हमने अकेले ब्याज हिस्से पर 70,000 करोड़ रुपये का भुगतान भी किया। कुल मिलाकर, हमने अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन किया। दो लाख करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान करके।” उन्होंने तेल बॉण्डों पर लंबित भुगतानों को उच्च ईंधन कीमतों के लिए दोषी बताया। यह वो वक्त था जब वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमत मार्च 2011 में 104.42 डॉलर प्रति बैरल से गिरकर 70.78 डॉलर प्रति बैरल हो चुकी थी, लेकिन राजधानी दिल्ली में पेट्रोल 82.41 रुपये प्रति लीटर के हिसाब से बिक रहा था। सनद रहे कि 2011 में उच्च कीमतों के बावजूद राष्ट्रीय राजधानी में पेट्रोल की कीमत 58.37 रुपये प्रति लीटर थी।
पहला सवाल तो यह कि तेल बांड क्या हैं? दरअसल तेल वितरण कंपनियों (ओएमसी), उर्वरक कंपनियों और भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) को कीमतों को विनियमित करने की प्रक्रिया में उनके द्वारा वहन किए गए नुकसान की भरपाई के लिए सरकार द्वारा तेल बांड जारी किए जाते हैं। वे सरकारी प्रतिभूतियों के समान हैं। यह आमतौर पर लंबी अवधि (15-20 साल) के लिए होते हैं। बांड की अवधि के दौरान निश्चित अंतराल पर ब्याज का भुगतान भी करना होता है। इन ऋणों को जारी करने वाले वर्ष के राजकोषीय घाटे की संख्या में शामिल नहीं किया जाता है। नकद सब्सिडी के विपरीत, इसमें कोई प्रत्यक्ष नकदी प्रवाह नहीं किया जाता।
जब ईंधन की कीमतें विनियमित थीं, तब यूपीए सरकार द्वारा तेल बांड जारी किए गए थे। ऐसा करने का उद्देश्य ग्राहकों और घरेलू व्यवसायों को कच्चे तेल के वैश्विक बाजार की अनिश्चितताओं से बचाना था। हालांकि, सब्सिडी जल्द ही समाप्त कर दी गई, और उत्पाद शुल्क भी बढ़ा दिया गया था। तत्कालीन यूपीए सरकार ने 2005 और 2010 के बीच सब्सिडी के विकल्प के रूप में तेल बांड जारी करना शुरू किया था। उच्च कच्चे तेल की कीमतों (एक वक्त पर $140 प्रति बैरल से भी अधिक) और 2008 की मंदी के झटके ने सरकार पर दबाव बढ़ा दिया। बांड के माध्यम से पूंजी जुटाकर, इन भुगतानों को कीमतों में बड़ी वृद्धि के बिना टाला जा सकता है, इस प्रकार ग्राहकों को भारी कीमतों के बोझ से बचाया जा सकता है।

वर्ष 2005 से 2009 के बीच सरकार ने 1.4 लाख करोड़ रुपये के बॉण्ड जारी किए। यह ओएमसी को 2.9 लाख करोड़ रुपये की वसूली के आंशिक मुआवजे के लिए किए गए थे। कागजों पर अंडर-रिकवरी का अर्थ है अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की खरीद की लागत और घरेलू बाजार में पेट्रोलियम उत्पादों की बिक्री की कीमत के बीच का अंतर। मंदी के बाद, ओएमसी को बड़े अंडर-रिकवरी का सामना करना पड़ रहा था। इसने सरकार को ओएमसी (कई सरकारी ओएमसी) की वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने की दुविधा में डाल दिया। ऐसे में कीमतों को नियंत्रण में रखते हुए ओएमसी पर दबाव कम करने के लिए तेल बॉण्डों को विकल्प के रूप में चुना गया था।

30 नवंबर, 2010 को, केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने राज्यसभा को सूचित किया था कि सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों, सरकार, बैंकों और अन्य हितधारकों द्वारा इस कर्ज के बोझ को साझा किया जाएगा। इसके बाद पेट्रोल की कीमतों को डी-कंट्रोल करने की दिशा में पहला कदम 2010 में इस घोषणा के साथ उठाया गया था कि तेल बांड अब बंद कर दिए जाएंगे, और ओएमसी को नकद में भुगतान किया जाएगा। जून 2010 में, पेट्रोल की कीमतों को डी-कंट्रोल किया गया, लेकिन डीजल को डी-कंट्रोल अक्टूबर 2014 में ही किया गया। सनद रहे कि एटीफ की कीमतों को 2002 में सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर दिया गया था। कागजों पर, डी-कंट्रोल का मतलब है कि अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतें घटने-बढ़ने के अनुसार भारत में तेल की खुदरा कीमतें घटती-बढ़ती हैं। इसके बाद जून 2017 में, एनडीए सरकार ने गतिशील ईंधन मूल्य निर्धारण की प्रणाली को अपनाया जिससे पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमत में दैनिक आधार (अंतरराष्ट्रीय कीमतों के आधार पर) पर उतार-चढ़ाव होता है।
बड़ा सवाल यह है कि क्या एनडीए सरकार ने 1.4 लाख करोड़ रुपये के तेल बांड का भुगतान किया है? दरअसल, यूपीए सरकार ने 2005 और 2010 के बीच 1.44 लाख करोड़ रुपये के बांड जारी किए। हालांकि, एनडीए सरकार के कार्यकाल के दौरान 1,750 करोड़ रुपये के केवल दो बांड ही मेच्योर हुए हैं। इसका मतलब है कि अब तक सरकार ने केवल 3,500 करोड़ रुपये ही चुकाए हैं। अगला भुगतान अक्टूबर 2021 में होगा। इसके अलावा कोई अन्य नया बांड जारी नहीं किया गया था। कुछ समाचार वेबसाइटों के अनुसार पीयूष गोयल ने कहा कि एनडीए सरकार ने बकाया तेल बांड पर ब्याज के रूप में 40,226 करोड़ रुपये का भुगतान किया है। लेकिन 2016-17, 2017-18 और 2018-19 के बजट दस्तावेजों के अनुलग्नक-6ई के अनुसार, सब्सिडी के बदले तेल बाजार कंपनियों को जारी विशेष प्रतिभूतियों का कुल मूल्य स्थिर रहा है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इस अवधि के दौरान केवल दो बॉण्ड ही मेंच्योर हुए।

आंकड़े इस दावे को ध्वस्त कर देते हैं कि तेल की ऊंची कीमतें 1.44 लाख करोड़ रुपये के बकाया बॉण्ड पर ब्याज भुगतान के कारण हैं।यह कहना गलत है कि तेल बॉण्डों पर ब्याज भुगतानों ने कीमतों को बढ़ाया है। कर्ज का बोझ उतना गंभीर नहीं होगा जितना कि बताया जा रहा है। अभी तक मात्र 3,500 करोड़ रुपये के बांड ही मेच्योर हुए हैं और गौर करने वाली बात यह है कि भारतीय बजट प्रणाली के तहत, बॉण्डों का पूर्व-भुगतान करना संभव नहीं है। सरकारी बांड एक सामान्य प्रक्रिया है क्योंकि बजटीय व्यय एक सीमा तक बांड के माध्यम से वित्तपोषित होता है जिसे समय के साथ चुकाना होता है। हर सरकार बांड लेती है, मौजूदा सरकार ने भी खाद्य बांड लिए हैं।

सवाल यह भी है कि आखिर ईंधन की कीमतें बढ़ने के पीछे की असली वजह क्या है? क्योंकि भारत अपने अधिकांश तेल का आयात करता है इसी वजह से जानकार रुपये के मूल्य में आई तीव्र गिरावट को भी ईंधन की कीमतों में वृद्धि काएक कारक मान रहे हैं। इसके अलावा उत्पाद शुल्क के आंकड़ों को परखने पर हमें आश्चर्यजनक वृद्धि नजर आएगी। वर्ष 2017 में लोकसभा में उठाए गए एक प्रश्न के जवाब में, पेट्रोलियम मंत्री ने स्वीकार किया था कि पेट्रोल पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क अप्रैल 2014 में 9.48 रुपये प्रति लीटर से बढ़कर अक्टूबर 2017 में 19.48 रुपये प्रति लीटर हो गया। इसी तरह, डीजल पर केंद्र द्वारा एकत्र उत्पाद शुल्क 330 प्रतिशत बढ़ गया। यह अप्रैल 2014 में 3.56 रुपये प्रति लीटर से अक्टूबर 2017 में 15.33 रुपये हो गया। यह वृद्धि 2017 के बाद भी जारी रही और 2020 की शुरुआत में केंद्र सरकार ने पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क और बढ़ाकर 32.98 रुपये प्रति लीटर कर दिया और डीजल पर उत्पाद शुल्क बढ़कर 31.83 रुपये प्रति लीटर हो गया है।
ईंधन की कीमतों में माल ढुलाई शुल्क और डीलर कमीशन भी शामिल है। कर घटक में राज्य सरकारों द्वारा सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क और मूल्य वर्धित कर शामिल हैं। फिलहाल पेट्रोल, डीजल पर कस्टम ड्यूटी की दरें 2.5 फीसदी ही हैं और कस्टम ड्यूटी पर सोशल वेलफेयर सरचार्ज को केंद्र ने 3 फीसदी से बढ़ाकर 10 फीसदी कर दिया है।

एक और बात जो सोचने वाली है, वह यह कि 2011 से 2014 के दौरान 110 डॉलर प्रति बैरल के करीब रहने के बाद, तेल की कीमतें (इंडियन बास्केट) 2015 में तेजी से गिरकर सिर्फ 85 डॉलर प्रति बैरल और 2017 और 2018 में और कम होकर 50 डॉलर प्रति बैरल हो गईं। एक ओर, तेल की कीमतों में अचानक आई तेज गिरावट ने सरकार को देश में उच्च खुदरा महंगाई को नियंत्रित करने में मदद की, और दूसरी ओर, इसने सरकार को ईंधन पर अतिरिक्त कर एकत्र करने की छूट भी दी, लेकिन जब जनवरी 2017 में अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतें मात्र 28 डॉलर प्रति बैरल रह गईं तब भी जनता को इतनी कम कीमतों पर भी फायदा नहीं मिला।

मई 2014 में जब हम एक लीटर तेल का मूल्य चुकाते थे, तब उस मूल्य 63 फीसदी हिस्सा तेल के आधार मूल्य का, 18 फीसदी हिस्सा राज्य करों का, 16 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार के करों का और तीन प्रतिशत हिस्सा डीलर के कमीशन का होता था। लेकिन फरवरी 2021 में एक लीटर तेल के मूल्य में तेल के आधार मूल्य का हिस्सा मात्र 36 फीसदी रह गया, राज्यों करों का हिस्सा कुछ बढ़कर 23 फीसदी हो गया, डीलर का कमीशन मामूली रूप से बढ़कर चार प्रतिशत हो गया, लेकिन केंद्र सरकार के करों का हिस्सा दूने से भी अधिक होकर 37 फीसदी हो गया है।

टैक्स संग्रह के आंकड़े तो और ज्यादा चौकाने वाले हैं। बीते सात साल में पेट्रोल-डीजल से टैक्स संग्रह 459 प्रतिशत बढ़ा। मंदी और बेकारी के दौरान 2020-21 के शुरूआती 11 महीनों में सरकार ईंधन से रिकॉर्ड 2.94 लाख करोड़ रुपये का टैक्स संग्रह किया जबकि यह टैक्स संग्रह 2013 में मात्र 52,537 करोड़ था। इसका मतलब कि सिर्फ एक साल में सरकार ने 2013 के मुकाबले 2.40 लाख करोड़ का टैक्स ज्यादा वसूला। सनद रहे कि जिन तेल बांड की बात हुई वह सिर्फ 1.44 लाख करोड़ रुपये के थे। इससे ज्यादा मुनाफा तो सरकार ने एक साल में ही कमा लिया है। टैक्स संग्रह के आंकड़े बताते है कि गाय के दूध का तो भरसक इस्तेमाल हुआ है, पर उसे चारा खिलाने में समस्या हो रही है।

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