उत्तराखंड (Uttarakhand) की राजनीतिक हवा ही कुछ ऐसी है!

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अक्षत मित्तल

राजनीति में कुछ भी प्रत्याशित नहीं होता, और जो प्रत्याशित हो वो राजनीति नहीं होती। राजनीति के इस स्वभाव को कौटिल्य ने बहुत पहले ही जान लिया था। राजनीति तब भी उतनी ही अप्रत्याशित थी और आज भी उतनी ही है। अपने चार साल पूरे होने से नौ दिन पहले ही उत्तराखंड (Uttarakhand) के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। राजनीति सच में अप्रत्याशित है।

उत्तराखंड में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं और अपनी कार्यशैली को लेकर रावत के प्रति राज्य पार्टी इकाई में बेचैनी बढ़ती जा रही थी। लिहाजा भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा से मिलने के बाद रावत ने नई दिल्ली से लौटकर राज्यपाल बेबी रानी मौर्य को अपना इस्तीफा सौंपा दिया। फिलहाल पौड़ी के 56 वर्षीय सांसद तीरथ सिंह रावत ने उत्तराखंड के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले ली। राजनीति में नेताओं का आना-जाना तो लगा ही रहता है। राजनीतिक कुर्सियों पर किसी का एकाधिकार नहीं होता, लेकिन कुर्सी पर बैठते और हटते समय चर्चाएं तो होती ही हैं।
सवाल यह है कि आखिर विधानसभा चुनाव से साल भर पहले ही रावत को इस्तीफा क्यों देना पड़ा? राजनीतिक पंडित इसके अलग-अलग कारण निकालेंगे। कुछ कहेंगे कि चार धाम देवस्थानम प्रबंधन विधेयक, जिसमें राज्य सरकार के नियंत्रण में बद्रीनाथ, केदारनाथ, यमुनोत्री और गंगोत्री सहित 51 तीर्थस्थल लाये गए थे, रावत के विरोध के प्रमुख कारणों में से एक था। इस विधेयक को जनवरी में मंजूरी मिल गई थी और इसके बाद ही रावत के खिलाफ विश्व हिंदू परिषद सख्त हो गया। यहां तक कि इन मंदिरों के कुछ कर्मचारियों ने खुले तौर पर रावत के इस्तीफा देने के बाद पटाखे जलाए और प्रार्थना सभा की।
इसके अलावा एक अन्य प्रशासनिक कदम, जिसने भाजपा राज्य इकाई को नाराज किया वो था- गैरसैण आयुक्तालय की स्थापना। दरअसल, गढ़वाल और कुमाऊं दोनों क्षेत्रों से इस नई प्रशासनिक इकाई में जिलों को जोड़ा गया। गढ़वाल परंपरागत रूप से भाजपा का गढ़ है, जबकि कुमाऊं पार्टी के लिए मुश्किल रहा है, लेकिन बद्रीनाथ और केदारनाथ के गढ़वाल से कमिश्नरेट में उप-विभाजन का मतलब था कि आने वाले चुनावों में यह दुर्ग संभवतः गिर जाता। राज्य के नेताओं ने आरोप लगाया कि इन फैसलों से पहले किसी से भी सलाह नहीं ली गई, और पार्टी के नेताओं को जनता की नाराजगी झेलने और राजनीतिक प्रतिशोध के लिए छोड़ दिया गया। इतना ही नहीं केंद्र द्वारा वित्त पोषित चारधाम यात्रा परियोजनाओं की धीमी प्रगति ने इस भूमिका को और मजबूती दे दी।
साथ ही, पत्रकार उमेश शर्मा द्वारा वित्तीय अनियमितताओं के आरोप में राज्य में दायर रावत के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले में उच्च न्यायालय ने पिछले साल अक्टूबर में सीबीआई जांच का आदेश दे दिया। इस मामले में यह आरोप लगाया गया था कि रावत ने झारखंड में गौ सेवा आयोग के पद पर एक विशेष उम्मीदवार को नियुक्त करने के लिए उस वक्त अपने रिश्तेदारों के खातों में धन जमा करवाया था, जब वह 2016 में भाजपा नेता के रूप में राज्य के प्रभारी थे। रावत के जाने के पीछे का एक बड़ा कारण यह है कि 2017 में सरकार गठन के बाद से ही 12 सदस्यीय राज्य मंत्रिपरिषद और दो कैबिनेट बर्थ खाली पड़ी हैं और 2019 में प्रकाश पंत की मृत्यु के बाद एक और सीट खाली हो गई।
विधायकों की बार-बार मांग के बावजूद, रावत ने मंत्रिमंडल का विस्तार नहीं किया और गृह, कारागार, स्वास्थ्य, वित्त, चिकित्सा शिक्षा, चिकित्सा सेवा, परिवार कल्याण, पीडब्ल्यूडी, उद्योग, ग्रामीण विकास, नागरिक उड्डयन, और आपदा प्रबंधन सहित 50 से अधिक महत्वपूर्ण विभागों को अपने पास रखा। इस तरह से सत्ता के केंद्रीकरण ने भाजपा विधायकों और पदाधिकारियों में असंतोष पैदा किया। इसके अलावा, रावत कैबिनेट मेंपांच मंत्री ऐसे थे जो 2017 के चुनावों से पहले तीन साल के भीतर कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हुए थे। इसके अलावा मंत्रिमंडल के कुछ सदस्यों ने आरोप लगाया था कि उनके विभाग के सचिव सीएम कार्यालय से निर्देश ले रहे हैं। साथ ही भाजपा कार्यकर्ताओं और यहां तक कि विधायक भी शिकायत कर रहे थे कि जिलों में डीएम और एसपी उनकी सिफारिशों पर ध्यान नहीं दे रहे और सीएम कार्यालय में नौकरशाह उनकी अपील को नहीं सुन रहे।
सोने पे सुहागा यह कि आरएसएस के अनुसार भाजपा 2022 में रावत के नेतृत्व में चुनाव नहीं जीत पाएगी। जो भी वजह रही हो यह बात तो साफ़ है कि उत्तराखंड की स्थापना से यहां नौ मुख्यमंत्री रहे जिनमें एन.डी. तिवारी को छोड़ कोई भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि उत्तराखंड की राजनीतिक हवा ही कुछ ऐसी है।

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