इन्हें चिंदियों में हिंदुस्तान (Hindustan) चाहिए!

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-जयराम शुक्ल

“अरुंधति राय को कौन नहीं जानता? चिंदियों का देवता (गॉड आफ स्मॉल थिंग) नामक उपन्यास के लिए इन्हें बुकर पुरस्कार मिला है। इस नाते वे अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक व्यक्तित्व हैं। इन दिनों अपनी पूरी टीम के साथ दिल्ली की सीमाओं पर घेरा डाले कथित किसानों के पीछे डफली बजाते हुई जोश बढ़ा रही हैं- हाय हाय मोदी मर जा तू.., मोदी तेरी कब्र खुदेगी… जैसे सुरमयी नारों के साथ। पिछले साल दिल्ली के जेएनयू के छात्रों को यह मशविरा देते हुए टीवी में सुना होगा कि सरकार जब नाम पूछे तो अपना नाम रंगा या बिल्ला बताइए तथा पता प्रधानमंत्री का निवास 7 रेसकोर्स रोड, नई दिल्ली दर्ज कराइए। वे नागरिकता कानून के संदर्भ में समझाइश दे रहीं थी और कह रही थीं कि सरकार के इस कानून के खिलाफ जिससे जो बन पड़े करे, किसी भी हद तक जाकर।”
अरुंधति यदि यही बयान उस मुल्क की बाशिंदा होते हुए देतीं जिसने उन्हें बुकर दिया है तो वहां इनकी अगली रात हवालात की सलाखों के पीछे गुजरती, लेकिन यहां सबकुछ करने की छूट है। राष्ट्र से जुड़ा जब भी कोई सवाल सामने आता है तो अरुधंतियों के इस बौद्धिक जमात की वैचारिक मटरगश्ती सामने आ जाती है। ये लोग देश को ‘बनाना रिपब्लिक’ (Banana Republic) बनाने में जुटे हैं। यही अरुंधति बस्तर के माओवादियों के साथ खड़ी दिखती हैं और उधर कश्मीर के अलगाववादी यासीन मलिक के साथ फोटो खिंचवाती हैं। इनका न तो संसद पर यकीन है और न्यायपालिका के खिलाफ टिप्पणी करके जेल जा चुकी हैं।
अरुंधति राय अकेली ऐसी नहीं हैं एक पूरी जमात है..जिसके देश में सबकुछ गलत दिखता है। मध्यप्रदेश काडर के आईएएस रहे और इस्तीफा देकर एक्टिविस्ट बने हर्षमंदर भी इससे पहले बोल चुके हैं कि वे अपना नाम मुसलमान दर्ज कराएंगे। हर्षमंदर जी, मेरा मशवरा है कि आप मुसलमान ही बन जाओ। पहले आक्रांताओं के लात-जूतों से डरकर मजबूरीवश मुसलमान बने थे, आप राजीखुशी से बन जाओ, देश में स्वतंत्रता ही नहीं आप जैसे लोगों के लिए स्वच्छंदता भी है।
फिर अवार्ड वापसी करने वाले महापुरुषों के बारे में सुना होगा, जिनकी आँखें सरहद में दुश्मनों से और जंगल में माओवादियों से लड़ते हुए शहीद होने वालों को लेकर कभी नम नहीं होती। ये हर घटना में बारीकी के साथ हिंदू एंगल खोजते हैं और उस पर विमर्श करते हैं। कश्मीर में धारा 370 हटी तो उनचासियों ने सरकार के खिलाफ हस्ताक्षर करके बयान जारी किया। इन उनचास लेखक, फिल्मकार रंगकर्मियों में से कुछ तो कश्मीर के पंडित घराने से थे, जिन्हें मजहबी कट्टरपंथियों ने घाटी से निकाल दिया था, जिनके घर जले, बहू, बहन, बेटियों की इज्जत लूटी और वे अब अपने ही देश में शरणार्थी हैं।
जेएनयू, एएमयू, हैदराबाद विवि, जादवपुर विवि की घटनाओं से होते हुए भीमा-कोरेगांव, अनुच्छेद 370, नागरिकता बिल, शाहीनबाग से लेकर इस कथित किसान आंदोलन की क्रोनोलाजी बारीकी से समझेंगे तो पता चलेगा कि इन सबके पीछे वही डफली गैंग है जो भारत तेरे टुकड़े होंगे.. से लेकर हाय हाय मोदी मर जा तू… तक पहुंच चुका है। दुर्योग से वैचारिक वमन करने वाले वही चेहरे हैं, जो जंगलों में माओवादियों के और कश्मीर में अलगाववादियों के साथ खड़े हैं।
ऊपर की जमात में जितने भर बौद्धिक मसखरे हैं उन्हीं में से प्रायः ने मुंबई को दहलाने वाले आतंकी याकूब मेमन और संसद पर हमले के गुनहगार अफजल गुरू की फाँसी रोकने के लिए हस्ताक्षर अभियान चलाया था। याद करिए 2013 में जब नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा का चुनाव अभियान शुरू हुआ तो इसी जमात के लोगों ने खुले मुँह मोदी को खून का सौदागर, भारत का इदीअमीन, आदमखोर और न जाने क्या-क्या कहा। मोदीजी दुनिया के दुर्लभतम राजनेता हैं जिन्हें ऐसी गालियां और विशेषण मिलते हैं फिर भी इन सबके लिए असहिष्णु बने हुए हैं। इन्हीं में से कुछ बौद्धिक ऐसे थे जिन्होंने ऐलान किया था कि यदि नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो वे देश छोड़ देंगे। यद्यपि वे छः साल बाद भी अपने ऐलान पर अमल नहीं कर पाए और फिलहाल अरुंधति जैसे बयान व व्याख्यान देने में जुटे हैं। इन सभी के बीच देश की प्रमुख यूनिवर्सिटीज बाँटी गई हैं जहां वे सक्रिय होकर छात्रों को विचारों के ज्वलनशील ईंधन देने के काम पर जुटे हैं।
अभी ये सबके सब हिंदुस्तान के भीतर आखिरी खंदक की लड़ाई लड़ रहे हैं। इन्हें ऐतराज है कि सरकार नागरिकता कानून क्यों लायी..? बड़ी मुश्किल है कि देश में नागरिकों का लेखाजोखा और हिसाब क्यों रखा जा रहा है। दुनिया के हर देश का अपना नागरिकता कानून है। किसी को शरण देना या नागरिक बनाना धरमशाले में टिकाने जैसा नहीं है। अमेरिका व यूरोपीय देशों की नागरिकता कितनी मुश्किल है। आए दिन कड़े कानून बनते हैं पर उस देश के भीतर कोई आवाज उठती है क्या-? अमेरिका ने मैक्सिको के शरणार्थियों को रोकने के लिए कितने कड़े कानून नहीं बनाए। दूसरे देश के लोग न घुसें इसलिए इलेक्ट्रिक तारबंदी की गई है। फ्रांस, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, इंग्लैंड जहां-जहां भी आतंकी हमले हुए हैं वहां-वहां कड़े कानून बने। श्रीलंका में तो मस्जिदों में कैमरे लगाने और मुल्लाओं की तकरीर की सीडी पास के थाने में जमा कराने के आदेश हैं। चीन ने उइगर मुसलमानों को आम चीनियों जैसे नागरिक अधिकारों से वंचित कर रखा है। घुसपैठ और शरणार्थी समस्या वैश्विक है।
क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि ये बौद्धिक अराजकता और अतिवाद फैलाने वाले तत्वों, जनता द्वारा नकार दिए गए राजनीतिक दलों को कवर फायर नहीं दे रहे..। इनकी साजिशों को समझना होगा। हालिया कानून पड़ोसी इस्लामिक मुल्कों के प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने का है। संसद में ये आँकड़े सबने सुने होंगे कि आजादी के समय किस देश में ये कितने प्रतिशत थे, अब घटकर कितने हो गए? दुनिया इन देशों के आचरण से परिचित होती कि यहाँ मानवाधिकारों को कैसे कुचला गया। ये पता नहीं क्यों बाधक बन रहे हैं..।
एक बात स्पष्ट दिखती है कि ये बौद्धिक और उनके पोषक राजनीतिक दल सत्ता हासिल करने के लिए चिंदी-चिंदी हिंदुस्तान चाहते हैं। यह खुली जानकारी है कि सीमावर्ती प्रदेशों में आजादी के बाद से अबतक किस तरह डेमोग्राफिक जियोग्राफी बदली है। अखंड भारत जिस तरह खंड-खंड हुआ उसके पीछे के तर्कों तथ्यों पर जाइये तो पता चलेगा कि जहां हिंदू घटा वहीं देश बंटा..। सीमावर्ती प्रदेशों में पेट्रोडालर और यूरोडालर का खेल जल रहा है। ये डालर दोहरी नागरिकता वाले उन बुद्धिजीवियों के एनजीओ में खपता है। मिशनरीज अपना काम कर रही हैं। यूपीए सरकार के समय तो इनपर विशेष कृपा रही है। इन बौद्धिकों का एक मिशन वनवासियों और दलितों को भी देश के खिलाफ खड़ा करने का है। ये जेएनयू, जादवपुर, हैदराबाद जैसे विश्वविद्यालयों के छात्रों को अपने शिकार का चारा बना रहे हैं। हाल ही में एक पत्रकारिता विश्वविद्यालय के प्राध्यापक, जो कि मूलतः पत्रकार है, ने हिंदू धर्मग्रंथ पर जूता रखकर फोटो प्रसारित की कि यह कानून मनुवादी राज कायम करने के लिए है। इस प्राध्यापक का बाल-बांका तक नहीं हुआ। किसी दूसरे धर्म के ग्रंथ के साथ ऐसा करते तो अबतक शरीर छह इंच कलम हो चुका होता। उन विद्यार्थियों का जरूर बिगड़ गया जिन्होंने इस कृत्य के खिलाफ आवाज उठाई।
इन सबके पीछे एक शातिर गठजोड़ काम कर रहा है। वह हर तरीके से देश को अस्थिर करने में जुटा है राजनीतिक और सांस्कृतिक आधार पर। यह अनुच्छेद 370 के बाद की शांति और तीन तलाक, राममंदिर निर्माण के निर्णय की स्वीकार्यता के बाद से बेचैन है कि देश में कुछ हो क्यों नहीं रहा। ये देश में ऐसा ही कुछ करने के लिए पेट्रो और यूरो डालर की पगार पाते है। बुकर, आस्कर, मेगसेसे जैसे पुरस्कारों के पीछे छुपी अंदरूनी कहानी समझने की कोशिश करिए..। एक छोटे से उदाहरण से समझिए.. विकट गरीबी में भी भारतीय नारी के पराक्रम को रेखांकित करने वाली ‘मदर इंडिया’ को आस्कर नहीं मिलता लेकिन देश के भीतर झोपड़पट्टियों की सडाँध को चित्रित करने वाली ‘स्लम डाग मिलेनियर’ आस्कर पा जाती है। ये बौद्धिक देश के सांस्कृतिक मोर्चे पर भी युद्धरत हैं। इन कालनेमियों को समय रहते पहचानिए जो हिंदुस्तान को चिंदियों में करने की ख्वाहिश रखते हैं।

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