अक्षत मित्तल
आत्मनिर्भरता का नारा लगाते हुए हाल ही में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने तीसरे आत्निर्भर पैकेज की घोषणा की है। आत्मनिर्भरता का दंभ भारत में नया नहीं है। समय-समय पर आत्मनिर्भरता का यह नारा भारत की फिजाओं में बुलंदियां पकड़ता रहा है। आत्निर्भरता की तीसरी लहर में सरकार ने रोजगार सृजन को बढ़ावा देने, तनावग्रस्त क्षेत्रों को तरलता सहायता प्रदान करने और आवास एवं बुनियादी ढांचा क्षेत्रों में निवेश बढ़ाने के लिए कई उपायों की घोषणा की है।
वित्त मंत्री का कहना है कि अब तक की सरकार और आरबीआई द्वारा की गई सारी घोषणाओं को मिलाकर यह पैकेज 29,87,641 करोड़ रुपये या जीडीपी के 15 प्रतिशत के बराबर है। इसमें सरकार का योगदान जीडीपी के नौ प्रतिशत के बराबर है, शेष छह प्रतिशत भारतीय रिज़र्व बैंक के उठाए गए कदमों से है। सबसे नया आत्मनिर्भर भारत 3.0 पैकेज का आकार 2,65,080 करोड़ रुपये दावा किया जा रहा है।
आशावादी मानसिकता से ग्रस्त लोग भी यदि इस वित्त वर्ष इस पैकेज पर सरकार का अतिरिक्त खर्च जानेंगे, तो पाएंगे कि यह केवल 1,18,200 करोड़ रुपये तक ही बढ़ेगा, दावा किए जाने वाले खर्च से आधा भी नहीं, जबकि केयर रेटिंग्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ इस वित्त वर्ष इस पैकेज पर सरकार की अतिरिक्त राजकोषीय लागत 70000 करोड़ रुपये से लेकर 1.20 लाख करोड़ रुपये के बीच होगी। इसके अलावा 10 नए क्षेत्रों को उत्पादन-लिंक्ड इंसेंटिव के रूप में दिया जाने वाला 1,45,980 करोड़ रुपये का खर्च पांच साल से अधिक समय अवधि में खर्च किया जाना है और यह अगले वित्तीय वर्ष से ही संभव है।
लेकिन शायद इस वित्त वर्ष 1,18,200 करोड़ रुपये जितना कम अतिरिक्त खर्च भी महत्वहीन न हो। यह जीडीपी का 0.6 प्रतिशत है, क्योंकि इससे पहले का इतिहास और भी डरावना है। गत 27 मार्च को भारत सरकार ने इस तरह का पहला पैकेज निकाला था, जिसका नाम प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना था, इसपर सरकार की कुल अतिरिक्त लागत 1.08 लाख करोड़ रुपये की थी; इसके बाद मई में आत्मनिर्भर भारत के लिए पांच दिनों में की गई घोषणाओं के दूसरे पैकेज की अतिरिक्त राजकोषीय लागत भी 1.08 लाख करोड़ रुपये थी; अक्टूबर में आए तीसरे पैकेज में सिर्फ 37,000 करोड़ रुपये का पूंजी व्यय था। अगर हम इनको एक साथ रखें तो पाएंगे कि सभी कोविड-19 राहत उपायों को मिलाकर 2020-21 में जीडीपी के 2 प्रतिशत से भी कम की अतिरिक्त राजकोषीय लागत आएगी। सरकारें अक्सर हमें आंकड़ों में फंसा कर ऐसा खेल खेलती हैं।
दूसरी तरफ राजकोषीय घाटा यानी फिस्कल डेफिसिट भी अर्थशास्त्रियों के लिए एक बड़ी चिंता है। केयर रेटिंग्स ने पहले इस वित्त वर्ष में भारत के राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के नौ प्रतिशत पर रहने का अनुमान लगाया था। यह अनुमान एफआरबीएम एक्ट की तीन प्रतिशत की लिमिट से काफी ज्यादा है। हालांकि, यह कोई नई बात नहीं है, बल्कि पिछले कुछ वर्षों से यह घाटा तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन अब केयर रेटिंग ने सरकार द्वारा घोषित अतिरिक्त खर्च के कारण अनुमान लगाया है कि राजकोषीय घाटा जीडीपी का 0.35 से 0.5 प्रतिशत तक बढ़ सकता है, यह मानते हुए कि फ़र्टिलाइज़र सब्सिडी पर 30,000 करोड़ रुपये का खर्च किया जा सकता है, लेकिन अगर फ़र्टिलाइज़र सब्सिडी पर केवल 6,000 करोड़ रुपये का खर्च किया जाता है, तो घाटे में 0.25 प्रतिशत की वृद्धि होगी।
साफ़ है कि कोशिश मांग बढ़ाने की है, लेकिन मांग बढ़ने का केवल एक ही उपाय है- लोगों को बेहतर रोजगार उपलब्ध कराना। जर्मनी कि फेर्लो और इंग्लैंड की जॉब रिटेंशन स्कीम जैसे उपाय भारत में गेम चेंजर साबित हो सकते हैं, लेकिन उसके लिए सबसे पहले मुसीबतों को मानना जरूरी है। जो मान ही नहीं रहा कि कुछ गलत हो रहा है वह उसे सुधारेगा कैसे? सरकार को ये मनन करना पड़ेगा कि अर्थव्यवस्था कोविड से काफी पहले से गर्त में है और मांग तो 2016 से ही गिर रही है। कोविड को दोष देने का मतलब यह नहीं कि आप अपनी गलत नीतियों को छुपा लेंगे। सरकार को देखना होगा कि उसने कहां-कहां गलतियां की हैं।