अक्षत मित्तल
(akshatmittal756@gmail.com)
पिछले कुछ हफ़्तों में, हमने ऐसे कई अध्ययन और सर्वेक्षण देखे हैं जो बेरोजगारी (Unemployment) और आजीविका में बढ़ते संकट की ओर इशारा करते हैं।
कभी अर्थविद् जॉन मेनार्ड केंज ने सिखाया था कि रोजगार ही मांग की गारंटी है, लोग खर्च तभी करते हैं जब उन्हें पता हो कि अगले महीने पैसा आएगा। सरल सा सिद्धांत है कि खपत ही उच्च वृद्धि दर का कारक है और उच्च खपत का कारक रोजगार है। पिछले कुछ हफ़्तों में, हमने ऐसे कई अध्ययन और सर्वेक्षण देखे हैं जो आजीविका में बढ़ते संकट की ओर इशारा करते हैं।
आईएलओएसटीएटी (ILOSTAT) पर आधारित सीईडीए (CEDA) का अध्ययन
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के डेटाबेस पर आधारित सेंटर फॉर इकोनॉमिक डेटा एंड एनालिसिस (सीईडीए) के एक अध्ययन के अनुसार, भारत में बेरोजगारी दर 1991 के बाद से 2020 में अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गई है। अध्ययन में बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका, चीन, रूस, ब्राजील, अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम और जर्मनी सहित आठ अन्य देशों का भी सर्वेक्षण किया गया। गौर करने वाली बात यह है कि भारत ने अपने निकटतम पड़ोसियों की तुलना में सबसे अधिक बेरोजगारी दर प्रदर्शित की। यह दर चीन में पांच प्रतिशत, बांग्लादेश में 5.3 प्रतिशत, पाकिस्तान में 4.65 प्रतिशत और श्रीलंका में 4.84 प्रतिशत थी जबकि भारत में यह 7.11 प्रतिशत रही।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत ने 2015 और 2019 के बीच अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम और जर्मनी की तुलना में उच्च बेरोजगारी (Unemployment) दर दर्ज की है। हालांकि, अमेरिका में 2020 में भारत की तुलना में बेरोजगारी दर (8.31 प्रतिशत) अधिक थी। यूनाइटेड किंगडम और जर्मनी में क्रमशः 4.34 प्रतिशत और 4.31 प्रतिशत की बेरोजगारी दर थी।
एसबीआई रिसर्च का डेटा
ईपीएफओ (EPFO) पेरोल डेटा के एक एसबीआई रिसर्च विश्लेषण से पता चलता है कि पिछले वित्त वर्ष की तुलना में वित्त वर्ष 2021 में अर्थव्यवस्था में कुल रोजगार सृजन 16.9 लाख गिर गया। हालांकि, यह संख्या वित्त वर्ष 2020 के कुल रोजगार सृजन से बेहतर है, जिसमें 28.9 लाख की गिरावट आई थी। आंकड़े इसे और पुख्ता करते हैं कि अर्थव्यवस्था रोजगार के नए अवसर पैदा नहीं कर रही है।
नवीनतम ईपीएफओ डेटा से पता चलता है कि वित्त वर्ष 2021 में नए ईपीएफ ग्राहक और एनपीएस का कुल जोड़ 100.4 लाख है, जो वित्त वर्ष 2020 के 102.3 लाख के मुकाबले कम है। हालांकि, यह सही तस्वीर नहीं है, क्योंकि इस डेटा में किसी संस्था से बाहर निकलने वाले उन सदस्यों की संख्या भी शामिल है, जो फिर से बाद में संस्था में शामिल हो गए। एसबीआई रिसर्च के इस अध्ययन से पता चलता है कि नए रोजगार सृजन नहीं हुए। कुल नए पेरोल (पहली नौकरी) का अनुमान दिखाता है कि वित्त वर्ष 2021 में वास्तविक कुल नए पेरोल केवल 44 लाख हैं, जो वित्त वर्ष 2020 में उत्पन्न कुल नए पेरोल की तुलना में 16.9 लाख कम हैं। सनद रहे कि वित्त वर्ष 2020 में नए पेरोल की संख्या में लगभग 28.9 लाख की गिरावट आई थी। समस्या यह भी है कि 44 लाख अतिरिक्त नौकरियों में से अधिकांश नौकरियां निम्न गुणवत्ता वाली हैं।
लगातार भीषण होती बेरोजगारी की समस्या
हालिया आंकड़े तो और भी ज्यादा खतरनाक हैं, भारत में नौकरी का परिदृश्य बहुत खराब होने वाला है क्योंकि देश एक बार फिर दहाई से ऊपर की बेरोजगारी दर का सामना कर रहा है। मई में भारत में बेरोजगारी दर (11.90 प्रतिशत) और भी भीषण हो गई है, जबकि कोविड-19 संक्रमण की दूसरी लहर के कारण सीमित प्रतिबंध हैं, जो पहली लहर के दौरान देखे गए राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन की तुलना में बहुत अधिक उदार हैं। सीएमआईई के आंकड़े बताते हैं कि 23 मई को 30-दिवसीय औसत रोजगार दर में 100 बेसिस अंकों की गिरावट आई है, जिसका मतलब मई में ही एक करोड़ नौकरियों का नुकसान हुआ है।

16 मई और 23 मई को समाप्त हुए सप्ताह में बेरोजगारी (Unemployment) दर क्रमशः 14.5 प्रतिशत और 14.7 प्रतिशत तक पहुंच गई थी, यह दर आठ मई वाले सप्ताह में मात्र 8.7 प्रतिशत थी। गत 30 मई को समाप्त हुए सप्ताह में शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी (Unemployment) चिंताजनक शब्द से भी आगे की बात है, यह दर 17.88 प्रतिशत तक पहुंच गई है। शेहरी बेरोजगारी दर लगातार सातवें सप्ताह बढ़ी है, जबकि अभी इससे और बुरा होना बाकी है। सवाल यह कि क्या यह दर पिछले साल के लॉकडाउन के बाद देखे गए 27.1 प्रतिशत के उच्चतम स्तर तक बढ़ जाएगी?
चिंताजनक यह है कि सामान्य प्रवृत्ति के विपरीत जहां शहरी बेरोजगारी दर ग्रामीण बेरोजगारी दर से अधिक होती है, इस वक्त शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में बेरोजगारी दर तेजी से बढ़ रही है। शहरी बेरोजगारी दर छह मई को दहाई का आंकड़ा पार कर गई थी और तब से यह लगातार बढ़ रही है और 23 मई तक 12.7 प्रतिशत हो गई थी। वहीं ग्रामीण बेरोजगारी दर में वृद्धि मई में शुरू हुई एक हालिया घटना है। यह दर एक मई तक 7.1 प्रतिशत हो गई और फिर 23 मई तक यह और तेजी से बढ़कर 9.7 प्रतिशत तक पहुंच गई। बेरोजगारी में लगातार वृद्धि मई में रोजगार के नुकसान की संभावना को दर्शाती है। हालांकि, 30 मई को ग्रामीण बेरोजगारी दर 9.58 प्रतिशत थी जो पिछले सप्ताह से कुछ बेहतर है, लेकिन यह शायद ही कोई राहत की बात है, क्योंकि यह कमी ग्रामीण लोगों की श्रम भागीदारी दर में कमी आने की वजह से है।
सीएमआईई (CMIO) के अनुसार श्रम भागीदारी दर (एलपीआर) में कोई वृद्धि नहीं हुई है, जिसका सीधा मतलब है कि रोजगार मांग रहे लोगों की संख्या में वृद्धि से बेरोजगारी दर नहीं बढ़ी है, बल्कि भरसक रूप से रोजगार ख़त्म होने की वजह से बेरोजगारी दर में वृद्धि हुई है। अप्रैल 2021 में एलपीआर 39.98 प्रतिशत था और 23 मई को यह 40.01 प्रतिशत हो गया। इसलिए बेरोजगारी दर में वृद्धि महीने के दौरान रोजगार में गिरावट को दर्शाती है। सनद रहे कि वर्ल्ड बैंक के अनुसार भारत में श्रम बल 2019 में 49.5 करोड़ से भारी रूप से घटकर 2020 में 47.2 करोड़ रह गया, लेकिन बेरोजगारी बढ़ गई।
गौर करने वाली बात यह भी है कि अप्रैल 2021 में रोजगार दर 36.8 प्रतिशत थी, जो 23 मई को 35.8 प्रतिशत हो गई। केवल मई में ही एक करोड़ नौकरियां समाप्त हो गईं, इससे पहले अप्रैल में भी 75 लाख नौकरियां समाप्त हो गईं थी। जनवरी 2021 से रोजगार गिर रहा है और जनवरी और अप्रैल 2021 के बीच तकरीबन एक करोड़ नौकरियां समाप्त हो गईं थीं। मई 2021 में भी इतनी ही नौकरियां समाप्त हुईं हैं।
प्रमुख क्षेत्रों में घटते रोजगार

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) और सेंटर फॉर इकोनॉमिक डेटा एंड एनालिसिस (सीईडीए) के एक अन्य अध्ययन ने भारतीय अर्थव्यवस्था की एक बीमारी की ओर इशारा किया जो न केवल लंबे समय से चली आ रही है, बल्कि पिछले कुछ वर्षों में बदतर हो गई है। सीएमआईई-सीईडीए रिपोर्ट ने भारत में विभिन्न क्षेत्रों में रोजगारों का अध्ययन किया। यह वर्ष 2016 से सीएमआईई की मासिक समय-श्रृंखला के रोजगार के आंकड़ों पर आधारित है। इसमें सात क्षेत्रों में रोजगार डेटा का अध्ययन है, जैसे- कृषि, माइन, विनिर्माण, रियल एस्टेट एवं निर्माण, वित्तीय सेवाएं, गैर-वित्तीय सेवाएं और सार्वजनिक प्रशासनिक सेवाएं। इन क्षेत्रों का भारत के कुल रोजगार में 99 प्रतिशत का हिस्सा है।
इसमें जो सबसे अलग है, वह है विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार। आंकड़े बताते हैं कि अर्थव्यवस्था के विनिर्माण क्षेत्र में कार्यरत लोगों की संख्या 2016 में 5.1 करोड़ से घटकर 2020 में 2.7 करोड़ हो गई है, यानी केवल चार वर्षों के अंतराल में लगभग आधी हो गई है।इसके अलावा निराशाजनक यह भी है कि कृषि क्षेत्र में कार्यरत लोगों की संख्या बढ़ रही है। समान रूप से निराशाजनक यह है कि गैर-वित्तीय सेवाओं (जैसे शिक्षा और मनोरंजन उद्योग आदि) में रोजगार में तेजी से गिरावट आई है।ये चिंताजनक क्यों हैं? यह समझना महत्वपूर्ण है कि परंपरागत रूप से भारतीय नीति निर्माताओं का यह विचार रहा है कि कृषि में अन्यथा नियोजित शेष श्रम केरोजगार के लिए विनिर्माण क्षेत्र हमारी सबसे बड़ी आशा है। विनिर्माण अच्छी तरह से अनुकूल है, क्योंकि यह सेवा क्षेत्र के विपरीत लाखों कम शिक्षित भारतीय युवाओं को रोजगार दे सकता है।
लंबे समय तक, भारत ने अपने विनिर्माण उद्योगों को नौकरियों का बैंक बनाने के लिए संघर्ष किया है। लेकिन, पिछले 4-5 वर्षों में अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों से अतिरिक्त श्रम को रोजगार देने की बजाय विनिर्माण क्षेत्र में वास्तव में रोजगार ख़त्म हो रहे हैं। ख़त्म हुईं अधिकांश विनिर्माण नौकरियां कपड़ा, निर्माण सामग्री (जैसे टाइल आदि) और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग जैसे श्रम प्रधान क्षेत्रों में हैं। उदाहरण के लिए, कपड़ा निर्माण में रोजगार 2016-17 में 1.26 करोड़ से घटकर 2020-21 में केवल 55 लाख रह गया है। इसी अवधि में, निर्माण सामग्री फर्मों में रोजगार 1.14 करोड़ से घटकर केवल 48 लाख रह गया है। गैर-वित्तीय सेवाओं में गिरावट भी चिंताजनक है, लेकिन यह गिरावट कोविड के कारण हो सकती है। भारत ने पिछले एक साल में कृषि में रोजगार करने वाले लोगों की संख्या में वृद्धि देखी है। इसे जानकार और कुछ नहीं बल्कि प्रच्छन्न रोजगार मानते हैं।
सीएमआईई के आंकड़ों से पता चलता है कि भारत सरकार द्वारा अपनी महत्वाकांक्षी मेक इन इंडिया (एमआईआई) पहल और नवीनतम प्रोडक्शन-लिंक्ड इंसेंटिव (पीएलआई) योजना का अनावरण करने के बावजूद पिछले पांच वर्षों में चीजें बदतर हो गई हैं। दरअसल भारत एमआईआई और पीएलआई योजनाओं के साथ वही गलतियां दोहरा रहा है। वे फिर से पूंजी गहन विनिर्माण के उद्देश्य से हैं, न कि श्रम गहन विनिर्माण। इसके अलावा, भारत हाल के वर्षों में एक बार फिर आत्मनिर्भरता के उद्देश्य से संरक्षणवादी दृष्टिकोण की ओर लौट रहा है जो रोजगार और तरक्की की राह में बाधा है।
भारत के विपरीत, अन्य एशियाई अर्थव्यवस्थाओं ने अपने तुलनात्मक लाभ का फायदा उठाया है। उदाहरण के लिए, 2000 और 2018 के बीच, बांग्लादेश और वियतनाम ने वैश्विक कपड़ों के निर्यात में अपने हिस्से में क्रमशः 2.6 प्रतिशत से 6.4 प्रतिशत और 0.9 प्रतिशत से 6.2 प्रतिशत तक की वृद्धि की है, जबकि भारत का हिस्सा काफी हद तक 3 प्रतिशत से 3.5 प्रतिशत पर स्थिर रहा है। अभी घरेलू मांग कमजोर है, जरूरी है कि निर्यात बाजारों पर कब्जा करने के उद्देश्य से श्रम-केंद्रित उद्योगों को आक्रामक रूप से बढ़ावा दिया जाए। सनद रहे कि भारत की 70 प्रतिशत विनिर्माण नौकरियां अनौपचारिक क्षेत्र में हैं और यह हमारा आधार है। 2016 में घोषित विमुद्रीकरण और 2017 में जीएसटी की शुरुआत, दोनों ने अनौपचारिक क्षेत्र में विनिर्माण फर्मों को प्रभावित किया है।
भारतीय अर्थव्यवस्था में असमानताएं
इसके अलावा एक बड़ी समस्या भारतीय अर्थव्यवस्था में असमानताओं की भी है। जहां एक तरफ 2020 में भारत के मध्यम वर्ग की एक तिहाई कम होने की संभावना है और लगभग 7.5 करोड़ लोगों के गरीबी रेखा से नीचे धकेल दिए जाने की आशंका है (प्यू रिपोर्ट), वहीं इसके उलट दूसरी तरफ भारत दुनिया में तीसरा सबसे अधिक अरबपतियों वाला देश बन गया है। 2019-20 में कॉरपोरेट टैक्स में कटौती से 1.5 लाख करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान व्यवसायों द्वारा अपने मुनाफे को 20-25 प्रतिशत का बढ़ावा देने के काम आ गया।
यही नहीं असमानताएं अमीरों में भी बढ़ रहीं हैं। हाल ही में भारत की मार्केट कैप 3 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गई है। गौर करने वाली बात यह है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के अनुपात में भारत का कॉर्पोरेट लाभ अब लगभग दो प्रतिशत है, जो औसतन 5.6 प्रतिशत से बहुत कम है। लेकिन अब 80 प्रतिशत लाभ सिर्फ शीर्ष 20 कंपनियों से आता है, यह हिस्सा 1991 में मात्र 14 प्रतिशत था। असमानताएं साफ़ हैं। ऐसे में यह कहना गलत नहीं है कि भारत का जीडीपी 5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने से पहले भारत की मार्केट कैप 5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच जाएगी। और उसमें भी चंद व्यापारियों का ही सहयोग होगा। बेरोजगारी और असमानताओं का कारण बहुत हद तक यह है कि भारत के नीति निर्माता पर्याप्त राजकोषीय सहायता देने से बच रहे हैं।
अक्सर देशों के नीति निर्माता यह सोच लेते हैं कि अर्थव्यवस्था में रोजगार की जिम्मेदारी उनकी नहीं। ऐसा ही ग्रेट डिप्रेशन के समय अमेरिकी राष्ट्रपति हर्बर्ट हूवर ने सोचा था। यकीन मानिए ऐसी सोच के परिणाम अत्यंत विनाशकारी साबित होते हैं।