
दुनिया एक बार फिर से सदियों के संघर्ष के मुहाने पर खड़ी है। इस तरह का टकराव दशकों से नहीं देखा गया है और कम से कम 21वीं सदी में तो यह पहली बार हो रहा है, जब दुनिया की दो सबसे बड़ी महाशक्तियाँ आमने-सामने हो चुकी हैं। शक्ति के इस संघर्ष में एक ओर है दुनिया की सबसे पुरानी और अब तक की सबसे बड़ी पूँजीवादी महाशक्ति अमेरिका (US), और दूसरी ओर है समाजवादी शासन वाली उभरती हुई आर्थिक शक्ति चीन (China)। अमेरिका पिछली सदी में दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति बना हुआ है। सोवियत संघ के विघटन के बाद पहली बार कोई देश अमेरिका को सीधी चुनौती देने की स्थिति में पहुँचा है और वह है चीन। चीन ‘दुनिया की फैक्ट्री’ से आगे बढ़कर महाशक्तियों की पहली कतार में जा खड़ा हुआ है और उसके आगे अब सिर्फ अमेरिका ही दिखाई पड़ रहा है। यही कारण है कि अमेरिका और चीन के बीच व्यापार व शुल्क को लेकर छिड़े तनाव को शीतयुद्ध के बाद का सबसे बड़ा वैश्विक संघर्ष माना जा रहा है। चीन अब न सिर्फ अमेरिका को अर्थव्यवस्था से लेकर अंतरिक्ष तक चुनौती दे रहा है, बल्कि उससे कहीं आगे निकलकर तकनीकी नवाचार और वैश्विक निवेश की होड़ में भी शीर्ष पर पहुँचने की कोशिश कर रहा है। इस कारण कई विश्लेषक इस संघर्ष को सिर्फ व्यापारिक आँकड़ों या शुल्क की दरों तक सीमित नहीं मान रहे हैं, बल्कि वे इसमें रणनीतिक प्रभुत्व, तकनीकी वर्चस्व, राष्ट्रीय सुरक्षा और वैचारिक विरोधाभासों की भी परछाइयाँ गहराती हुई देख रहे हैं।
हाल के कुछ दिनों में अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध के मोर्चे पर नरमी आयी है, लेकिन यह स्थायी नहीं, बल्कि तात्कालिक नरमी है। फिलहाल दोनों देश एक-दूसरे पर लगे 100-100 फीसदी से अधिक के शुल्क को कम करने पर सहमत हुए हैं। अमेरिका ने चीन से आयातित वस्तुओं पर लगाये गये शुल्क को 145% से घटाकर 30% कर दिया। इसी तरह चीन ने अमेरिका से आयातित वस्तुओं पर शुल्क की दर को 125% से घटाकर 10% कर दिया। इसके अलावा चीन ने कई ऐसी पाबंदियों को भी हटाया, जो शुल्क से इतर लगाये गये थे। यह समझौता 90 दिनों के लिए प्रभावी रहेगा। इस दौरान दोनों पक्ष विस्तृत व्यापार वार्ता के माध्यम से स्थायी समाधान तलाशने की दिशा में प्रयास करेंगे। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप का कहना है कि यह समझौता अमेरिकी उद्योगों और किसानों के लिए एक बड़ी जीत है। बकौल ट्रंप, यह कदम अमेरिका की आर्थिक स्वतंत्रता की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। वहीं चीन के उप-प्रधानमंत्री हे लीफेंग ने इस समझौते को वैश्विक आर्थिक स्थिरता के लिए लाभकारी बताया और कहा कि यह चीन के घरेलू व अंतरराष्ट्रीय हितों के अनुरूप है।
अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध की शुरुआत औपचारिक रूप से 2018 में ट्रंप सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान हुई, लेकिन इसके बीज बहुत पहले बोए जा चुके थे। अमेरिका लंबे समय से चीन पर अस्थिर व्यापार प्रथाएँ अपनाने और बौद्धिक संपदा की चोरी करने का आरोप लगाता रहा है, जबकि चीन अमेरिकी कंपनियों की बाजार पहुँच, प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण की अनिवार्यता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बहाने लगाये गये प्रतिबंधों को अमेरिका का साम्राज्यवादी दबाव बताता रहा है। अभी अमेरिका में फिर से डॉनल्ड ट्रंप की सरकार बनने के बाद टकराव चरम पर है। अमेरिका और चीन दोनों एक-दूसरे के सामानों पर 100-100% से अधिक शुल्क लगा चुके हैं। इसके चलते वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं, निवेश के प्रवाह, मुद्रा बाजार और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर व्यापक असर हो रहा है। विश्वबैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे संस्थान इसे वैश्वीकरण की राह में इतिहास का सबसे बड़ा अवरोध मान रहे हैं। इसे अच्छे से समझने के लिए हम चार हिस्से में बात रखते हैं। इसे ‘ट्रंप सरकार का पहला कार्यकाल’, ‘बाइडन सरकार के 4 साल’, ‘ट्रंप2.0 के 100 दिन’ और ‘भारत का संदर्भ’ में बाँटने से विषय को अच्छे से समझने में मदद मिलेगी।
ट्रंप सरकार का पहला कार्यकाल
अरबपति अमेरिकी कारोबारी डॉनल्ड ट्रंप 2017 में पहली बार अमेरिका के राष्ट्रपति बने। उनके राष्ट्रपति बनते ही अमेरिका के नीतिगत रुख में व्यापक बदलाव आया। उन्होंने सरकार में आते ही ‘सबसे पहले अमेरिका (अमेरिका फर्स्ट)’ की नीति को आगे बढ़ाना शुरू किया। ट्रंप की इस नीति का सीधा असर वैश्विक व्यापार व्यवस्था पर पड़ा, जिसमें चीन को मुख्य चुनौती के रूप में चिह्नित किया गया। ट्रंप ने अपनी आर्थिक नीतियों का केंद्रबिंदू अमेरिका के व्यापार घाटे को बनाया। चूँकि अमेरिका को सबसे ज्यादा व्यापार घाटा चीन के साथ हो रहा है, ट्रंप सरकार का पूरा ध्यान चीन पर गया। महीनों की बयानबाजियों के बाद ट्रंप सरकार ने मार्च 2018 में राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए इस्पात (स्टील) पर 25% और एल्युमिनियम पर 10% शुल्क लगाने की घोषणा की। यह शुल्क कई देशों पर लागू हुआ, लेकिन इसका मुख्य निशाना चीन था। इसे अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध की औपचारिक शुरुआत कहा जा सकता है, क्योंकि चीन ने तुरंत इसका प्रत्युत्तर दिया था। चीन ने जवाबी कार्रवाई करते हुए अमेरिका से आयातित सूअर माँस, फलों और मेवों पर शुल्क लगा दिया। यहाँ से दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ता ही चला गया। हालाँकि उस समय तक दुनिया इसे बहुत गंभीरता से नहीं ले रही थी और आम तनाव की तरह समझ रही थी।
एक महीने पहले दोनों देशों ने व्यापार तनाव के जिस रास्ते पर चलना शुरू किया था, उसमें अगला कदम अप्रैल 2018 में उस समय आया, जब अमेरिका ने चीन पर बौद्धिक संपदा की चोरी करने और जबरन तकनीकी हस्तांतरण का आरोप लगाते हुए 1.5 लाख करोड़ रुपये मूल्य के 1,300 से अधिक चीनी उत्पादों पर 25% शुल्क लगाने की घोषणा की। इसकी जद में एयरोस्पेस, रोबोटिक्स, मशीनरी और सूचना प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्र आये। चीन भी कहाँ चुप बैठने वाला था! उसने तुरंत जवाबी कार्रवाई करते हुए अमेरिकी सोया, वाहन और विमानों के बराबर मूल्य (1.5 लाख करोड़ रुपये) के आयात पर शुल्क लगाने की घोषणा कर दी। इन घोषणाओं पर तत्काल अमल नहीं हुआ। अमेरिका ने स्वतंत्रता दिवस के ठीक दो दिन बाद यानी 6 जुलाई 2018 को चीन के ऊपर पहला बड़ा प्रहार किया। इसमें चीन से आने वाले करीब 900 सामानों पर शुल्क लगाया गया। इसके निशाने पर चीन के 1.5 लाख करोड़ रुपये के मूल्य के बराबर सामान आये। चीन ने उसी दिन उत्तर दे दिया। चीन ने बराबर मूल्य के करीब 550 अमेरिकी सामानों पर शुल्क लगाया। इसमें सबसे ज्यादा असर अमेरिका के सोया, माँस और वाहन क्षेत्रों पर हुआ।
इस तरह शुल्कों का विवाद आगे बढ़कर व्यापार युद्ध में बदलने लगा। व्यापार युद्ध 2018 के अगस्त-सितंबर महीनों में और बढ़ गया। अमेरिका ने चीन से आने वाले 1.5 लाख करोड़ रुपये मूल्य से अधिक के अतिरिक्त उत्पादों पर 10% शुल्क लगा दिया। साथ ही उसने शुल्क की दर को आगे बढ़ाकर 25% करने की भी चेतावनी दी। चीन ने अमेरिका के इस कदम का भी तत्काल उत्तर दिया और उसने भी अमेरिका के 1 लाख करोड़ रुपये मूल्य के अतिरिक्त उत्पादों पर शुल्क लगा दिया। कुछ महीने बाद दोनों देश तनाव कम करने के लिए बातचीत की दिशा में आगे बढ़े। इसमें कोई ठोस सहमति बन पाती, उससे पहले ही गतिरोध उत्पन्न हो गया। अमेरिका ने मई 2019 में आरोप लगाया कि चीन बातचीत से पीछे हट रहा है। इसके साथ ही अमेरिका ने शुल्क की दर 10% से बढ़ाकर 25% कर दी। जवाब में चीन ने भी शुल्क में बराबर वृद्धि की। इस बीच तनाव व्यापार शुल्क से आगे बढ़कर मुद्रा तक पहुँच गया। दरअसल उस समय चीन की मुद्रा युआन के मूल्य में लगातार तेज गिरावट आने लगी। यह पहली बार डॉलर के मुकाबले टूटकर 7 से नीचे आ गया। अमेरिका ने आरोप लगाया कि चीन ऐसा जानबूझकर कर रहा है। ट्रंप की भाषा में यह गैर-शुल्क अवरोध (नॉन-टैरिफ बैरियर) था, जिसका उद्देश्य अमेरिका को नुकसान पहुँचाना था। करीब दो साल तनाव चलने के बाद दोनों देश जनवरी 2020 में प्रारंभिक व्यापार समझौते पर पहुँचे। चीन ने अमेरिका से अतिरिक्त सामान खरीदने की सहमति दी, तो अमेरिका ने चीन के ऊपर कुछ शुल्क को स्थगित कर दिया। अमेरिका और चीन के बीच समझौते पर आगे कोई प्रगति होती, उससे पहले दुनिया के सामने कोविड-19 महामारी का संकट आ गया। इसने व्यापार युद्ध को गौण कर दिया। 2020 के अंत में अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव हुआ और डॉनल्ड ट्रंप को हार का सामना करना पड़ गया। इसके बाद डेमोक्रेटिक पार्टी के जो बाइडन अमेरिका के 46वें राष्ट्रपति बने।
बाइडन सरकार के 4 साल
20 जनवरी 2021 से अमेरिका में जो बाइडन की सरकार का कार्यकाल शुरू हुआ। व्यापार युद्ध के मोर्चे पर बाइडन सरकार के चार सालों को संतुलित और स्थिर माना जाता है। हालाँकि वास्तुस्थिति इस मान्यता से मेल नहीं खाती है। ट्रंप सरकार बयानबाजियों में आक्रामक थी और फैसले लेने में अस्थिर थी। उसकी तुलना में बाइडन सरकार में शोरगुल जरूर कम हुआ, लेकिन शुल्क कोई खास कम नहीं हुआ। अंत में बढ़ ही गया। बाइडन सरकार ने व्यापार युद्ध को तकनीकी और भू-राजनीतिक वर्चस्व की जंग में बदल दिया। इस नयी सरकार ने ट्रंप सरकार में लगाये गये अधिकांश शुल्क को बरकरार रखा। अमेरिका के बड़े व्यावसायिक समूहों ने खूब दबाव बनाया, लेकिन बाइडन सरकार ने न तो किसी शुल्क को हटाया और न ही किसी शुल्क की दरें कम की। बाइडन सरकार के दौरान अमेरिका की तत्कालीन व्यापार प्रतिनिधि कैथरीन ताई ने तो मार्च 2021 में एक बयान में साफ लहजे में यहाँ तक कह दिया कि शुल्क तत्काल नहीं हटाये जा सकते, क्योंकि ये अमेरिका के लिए रणनीतिक लाभ का साधन साबित हो रहे हैं।
बाइडन सरकार में अमेरिका ने चीन के लिए शुल्क से आगे बढ़कर दो रणनीतियों पर काम किया। पहली रणनीति को चाइना प्लस कहा जाता है और दूसरी नीति को डी-रिस्किंग। इन दोनों रणनीतियों का उद्देश्य चीन पर किसी भी क्षेत्र में अत्यधिक निर्भरता को कम करना था, लेकिन उसे पूरी तरह से अलग-थलग नहीं करना था। इसके तहत अमेरिका ने भारत, वियतनाम, मैक्सिको और इंडोनेशिया जैसे देशों की भूमिका आपूर्ति श्रृंखला में बढ़ाने पर जोर दिया। अमेरिका की कंपनियों को कहा गया कि वे चीन पर अत्यधिक निर्भरता को कम करें और अन्य देशों में विनिर्माण का विस्तार करें। बाइडन सरकार की इसी रणनीति के तहत दिग्गज कंपनी एप्पल ने चीन में विनिर्माण पर निर्भरता को कम करना शुरू किया और भारत में आईफोन बनाने की शुरुआत की। कोविड के बाद के सालों में तकनीक की दुनिया तेजी से बदलने लगी। सेमीकंडक्टर और कृत्रिम मेधा (एआई) मुख्यधारा का हिस्सा बनने लगे। अमेरिका इन नये क्षेत्रों में भी दुनिया की अगुवाई कर रहा था, लेकिन चीन बहुत पीछे नहीं था। बाइडन सरकार ने 2022 में यहीं पर निशाना साधा और चीन को सेमीकंडक्टर की आपूर्ति बाधिक करने के लिए कई प्रतिबंध लगाये। इसके तहत चीन की एआई एवं सेमीकंडक्टर कंपनियों को उन्नत उपकरण व सेमीकंडक्टर बेचने से अमेरिकी कंपनियों को रोक दिया गया। अमेरिकी नागरिकों को चीन की सेमीकंडक्टर कंपनियों के साथ काम करने से प्रतिबंधित कर दिया गया। साथ ही चीन की कई कंपनियों जैसे एसएमआईसी, हाइकविजन, डीजेआई आदि के निगरानी में डाल दिया गया। बाइडन सरकार की यह रणनीति सीधे तौर पर चीन के तकनीकी विकास को धीमा करने की कोशिश थी। इस दौरान अमेरिका और चीन के बीच संवाद की खिड़की खुली रही, लेकिन बाइडन सरकार नीतिगत अवरोध लगाते रही। बाइडन सरकार के कार्यकाल में ही चीन की टिकटॉक और हुवावेई जैसी दिग्गज टेक कंपनियां भी निशाने पर आयीं।
पिछले साल के अंत में अमेरिका में फिर चुनाव हुए। नवंबर 2024 में सामने आये परिणाम में डॉनल्ड ट्रंप ने वापसी की। उसके बाद 20 जनवरी 2025 को ट्रंप के शपथग्रहण से पहले तक बाइडन सरकार ही रही। इस दो-तीन महीने में बाइडन सरकार ने ताबड़तोड़ कई फैसले लिये। इनमें कुछ फैसले चीन को निशाना बनाने वाले भी थे। इस दौरान बाइडन सरकार ने चीन से आयातित इलेक्ट्रिक वाहनों, बैटरियों और सोलर पैनलों पर नये शुल्क लगाये। राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए चीनी ड्रोन और स्मार्टफोन कंपनियों पर प्रतिबंध बढ़ा दिये गये। अमेरिकी सरकार ने एक सूची जारी की, जिसमें चीन की 50 कंपनियों को अविश्वसनीय बताया गया और उनके साथ व्यापार करने वालों को कड़ी कार्रवाई की चेतावनी दी गयी। चीन ने इसके जवाब में अमेरिका के कुछ कृषि उत्पादों पर जवाबी शुल्क लगाया। साथ ही सेमीकंडक्टर के विनिर्माण में इस्तेमाल होने वाली उन्नत मशीनरी पर भी शुल्क लगाये गये। चीन ने अमेरिका पर आर्थिक धौंस दिखाने (इकोनॉमिक बुलीइंग) का आरोप लगाया और विश्व व्यापार संगठन में उसके खिलाफ मामला उठाया।
ट्रंप का दूसरा कार्यकाल इस साल 20 जनवरी को शुरू हुआ। इसे ट्रंप2.0 कहा जा रहा है। ट्रंप2.0 के पहले 100 दिन पूरे हो चुके हैं और ये 100 दिन पूरी दुनिया के लिए भारी उठापटक वाले साबित हुए हैं। ट्रंप शपथग्रहण के पहले से आक्रामक तेवर दिखा रहे थे। खासकर चीन को लेकर उनका रवैया सख्त बना हुआ था। शपथग्रहण के बाद अपने पहले संबोधन में भी उन्होंने चीन का मुद्दा उठाया और कहा कि उनके पिछले कार्यकाल में जो युद्ध अधूरा रह गया था, उसे इस कार्यकाल में निर्णायक मोड़ तक ले जायेंगे। शुरुआत में तमाम विश्लेषक ट्रंप की इन बातों को बयानबाजियों से अधिक नहीं मान रहे थे, लेकिन जैसे-जैसे ट्रंप के फैसले आते गये, अंतर साफ होता चला गया। लोग सोच रहे थे कि पिछले कार्यकाल की तरह ट्रंप शोर अधिक करेंगे, लेकिन अब तक का रुझान अलग इशारा कर रहा है। ट्रंप सरकार ने फिर से शुल्क को मुख्य हथियार बनाते हुए चीन पर आर्थिक दबाव बनाने की नीति को तो अपनाया ही, लेकिन इस बार रणनीति पहले से कहीं अधिक आक्रामक, योजनाबद्ध और संस्थागत नजर आ रही है।
ट्रंप के शपथ लेने के पाँचवें दिन ही अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय ने चीन से आयातित 9 लाख करोड़ रुपये के उत्पादों की समीक्षा शुरू कर दी। उसके बाद ट्रंप ने फरवरी में पहला शुल्क बम फोड़ा। इसमें चीन से आयातित इलेक्ट्रिक वाहनों पर शुल्क को 10% से बढ़ाकर 50% कर दिया गया। सोलर पैनलों, लिथियम बैटरियों और 5जी नेटवर्क के उपकरणों पर 30-70% तक शुल्क लगाये गये। चीन के सरकारी अनुदान वाली कंपनियों के साथ व्यापार करने वाले अमेरिकी साझेदारों पर प्रतिबंध लगाने की चेतावनी दी गयी। इसके बाद मार्च में कई कदम उठाये गये। जैसे एसएमआईसी, हुआवेई और बीवाईडी जैसी चीनी कंपनियों को तकनीकी हस्तांतरण वाली नयी सूची में डाला। इस तरह अमेरिकी नागरिकों व कंपनियों को इनके साथ किसी भी तरह के तकनीकी सहयोग से रोक दिया गया। चीनी कंपनियों के अमेरिका में सूचीबद्ध एडीआर (अमेरिकन डिपॉजिटरी रिसीट) पर रिपोर्टिंग और पारदर्शिता के नियम कड़े किये गये, जिससे 20 से अधिक कंपनियाँ शेयर बाजार से बाहर होने की कगार पर आ गयीं। अमेरिका में विदेशी निवेश पर समिति को अधिक व्यापक शक्तियाँ दी गयीं, ताकि चीन से निवेश को नियंत्रित किया जा सके। ट्रंप के ताबड़तोड़ हमलों के जवाब में चीन ने भी कार्रवाई करने की शुरुआत की। सबसे पहले तो उसने अमेरिका से आयातित 75 हजार करोड़ रुपये के कृषि उत्पादों (सोया, मकई, वाइन, बीफ) पर शुल्क लगाया। टेस्ला और एप्पल जैसी अमेरिकी कंपनियों पर डेटा की निगरानी और अन्य साइबर नियमों के तहत जाँच बिठायी गयी। अमेरिका के रक्षा क्षेत्र से संबंध रखने वाली प्रौद्योगिकी कंपनियों को संदिग्ध अविश्वसनीय कंपनियों की सूची में डाला।
चीन के प्रत्युत्तर के बाद ट्रंप ने शुल्क और बढ़ा दिया। उन्होंने पहले ही चेतावनी दी थी कि अगर चीन जवाबी हमला करता है तो वह 50% दंडात्मक शुल्क लगायेंगे। ट्रंप ने अप्रैल में इसपर उस समय अमल किया, जब उन्होंने 2 अप्रैल को 50 से अधिक देशों पर पारस्परिक शुल्क लगाने की घोषणा की। इसके बाद चीन के ऊपर अमेरिकी शुल्क बढ़कर 74% पर पहुँच गया। चीन ने इसका भी तत्काल उत्तर दिया और अमेरिकी सामानों पर अतिरिक्त शुल्क लगा दिया। इसके बाद अमेरिकी सामानों पर चीन का शुल्क बढ़कर 84% पर पहुँच गया। ट्रंप इससे बौखला गये और चीन के सामानों पर उन्होंने 145% तक शुल्क लगाने का ऐलान कर दिया। चीन ने भी इसके बाद अमेरिकी सामानों पर 125% शुल्क लगाने का ऐलान किया। पीटरसन इंस्टीट्यूट फोर इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स की गणना के हिसाब से इसके बाद अमेरिका की ओर से चीन के निर्यात पर लगाये गये शुल्कों की प्रभावी दर 124.1% हो गयी। वहीं चीन द्वारा अमेरिकी निर्यात पर लगाये गये सभी शुल्कों की प्रभावी दर 147.6% हो गयी।
अमेरिका-चीन दोनों चुका रहे कीमत
दोनों देशों के बीच उसके बाद कई दिनों तक गतिरोध की स्थिति बनी रही। ट्रंप ने अप्रैल के अंत में गतिरोध टूटने के संकेत दिये, लेकिन चीन ने उसका खंडन कर दिया। ट्रंप ने एक से ज्यादा मौकों पर यह दावा किया कि व्यापार तनाव को दूर करने और समझौते पर पहुँचने के लिए चीन के साथ अमेरिका की बातचीत हो रही है, लेकिन चीन की ओर से इस तरह की कोई भी बातचीत होने से साफ इनकार किया गया। चीन ने बार-बार कहा कि जब अमेरिका उसके उत्पादों पर शुल्क कम करेगा, तभी दोनों देशों के बीच कोई बातचीत संभव है। बाद में दोनों देश स्विट्जरलैंड के जिनेवा में बातचीत करने के लिए तैयार हुए। दोनों देशों के बीच जिनेवा में दो दिनों तक उच्च-स्तरीय वार्ता के बाद 11 मई को प्रारंभिक समझौते पर सहमति बन गयी। इस वार्ता में अमेरिका की ओर से वाणिज्य मंत्री स्कॉट बेसेन्ट और व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर ने हिस्सा लिया, जबकि चीन का प्रतिनिधित्व उप-प्रधानमंत्री हे लिफेंग, उप-वाणिज्य मंत्री ली चेंगगांग और उप-वित्त मंत्री लियाओ मिन ने किया। दोनों पक्षों ने इस वार्ता को उत्पादक और रचनात्मक बताया।
इसके अगले दिन 12 मई को दोनों देशों ने संयुक्त बयान जारी कर समझौते के बारे में जानकारी दी। संयुक्त बयान में कहा गया कि दोनों देश टिकाऊ एवं दीर्घ अवधि के ऐसे आर्थिक व व्यापारिक संबंध के महत्व को समझते हैं, जो दोनों देशों के लिए बराबर लाभकारी हो। इसके तहत दोनों देशों ने एक-दूसरे पर लगाये गये पारस्परिक शुल्क को 115 प्रतिशत अंक कम करने का ऐलान किया। संयुक्त बयान के अनुसार, इसके बाद अमेरिका द्वारा चीन के सामानों पर लगाया गया पारस्परिक शुल्क 145% से कम होकर 30% रह जायेगा, जबकि चीन द्वारा अमेरिकी सामानों पर लगाया गया जवाबी शुल्क 125% की जगह 10% रह जायेगा। हालाँकि अमेरिका द्वारा लगाया गया 20% का फेंटानिल शुल्क लागू रहेगा। इसमें अमेरिका ने किसी तरह की ढील नहीं दी है। शुल्क की संशोधित दरें 90 दिनों के लिए हैं और ये 14 मई से प्रभावी हुई हैं। यानी मध्य अगस्त तक दोनों देशों के बीच शुल्क की संशोधित कम दरों की व्यवस्था लागू रहेगी। इस अवधि में दोनों पक्ष स्थायी समाधान पर बातचीत करते रहेंगे। अगर 90 दिनों में बात बन जाती है, तो नया समझौता लागू होगा, अन्यथा एक बार फिर से बात बिगड़ने का जोखिम रहेगा।
इससे पहले दोनों आर्थिक महाशक्तियों के बीच संघर्ष का असर दिखना शुरू हो गया था। 2025 की पहली तिमाही (जनवरी-मार्च) के दौरान अमेरिका की अर्थव्यवस्था में गिरावट आयी। अमेरिकी वाणिज्य मंत्रालय के आधिकारिक आँकड़े बताते हैं कि इन 3 महीनों के दौरान अमेरिका के सकल घरेलू उत्पाद में 0.3% की गिरावट आयी। इसके लिए आयात में अचानक आयी तेजी को जिम्मेदार माना गया। दरअसल अप्रैल में ट्रंप द्वारा शुल्क का ऐलान करने से पहले अमेरिकी कंपनियों ने आयात बढ़ा दिया। पहली तिमाही के दौरान इस तरह आयात में 41.3% तेजी आयी। वस्तुओं का आयात तो इस दौरन 50.9% बढ़ गया। इसने अमेरिकी अर्थव्यवस्था के मंदी में गिरने का खतरा बढ़ा दिया था। इससे पहले अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर इस तरह का संकट कई साल पहले आया था। यह 2022 की पहली तिमाही के बाद पहली बार हुआ है, जब अमेरिका के सकल घरेलू उत्पाद में गिरावट आयी है। चीन भी इससे अप्रभावित नहीं रहा था। चीन के आर्थिक आँकड़े भी गंभीर इशारे कर रहे थे। अप्रैल महीने के दौरान चीन में कारखानों की गतिविधियों में सुस्ती आयी। चीन के राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो के अनुसार, अप्रैल में चीन का खरीद प्रबंध सूचकांक (पीएमआई) कम होकर 49 पर आ गया। यह सूचकांक 50 से कम रहता है तो माना जाता है कि गतिविधियों में कमी आयी है। इसका मतलब है कि चीन में कारखानों का काम अप्रैल में प्रभावित हुआ और विनिर्माण में गिरावट आयी। इसे सीधे तौर पर ट्रंप के शुल्कों का असर माना जा रहा था। ऐसी आशँकाएँ जाहिर की जा रही थीं कि दोनों देशों के बीच जितनी देर तक गतिरोध बना रहेगा, नुकसान उतना ज्यादा होता जायेगा। इसका कारण है कि अमेरिका बहुत सारे सामानों के लिए चीन पर निर्भर है और चीन की अर्थव्यवस्था की बुनियाद निर्यात पर टिकी हुई है।
भारत का संदर्भ
इस व्यापार युद्ध में मुख्य रूप से भले ही भिड़ंत अमेरिका और चीन के बीच हो रही हो, इसका असर यही दोनों देशों तक सीमित नहीं है। व्यापार युद्ध का दंश पूरी दुनिया को झेलना पड़ता है। वैश्वीकरण और अर्थव्यवस्थाओं के उदारीकरण के पिछले 3-4 दशकों में दुनिया के सभी देशों की अर्थव्यवस्थाएँ आपस में गुथ गयी हैं। उदाहरण के लिए भारत को विश्व की दवा दुकान (फार्मेसी) कहा जाता है। कारण है कि भारत बड़े पैमाने पर दुनिया को दवा निर्यात करता है। खासकर सस्ती जेनेरिक दवाएँ आपूर्ति करने में भारतीय कंपनियों का मुकाबला नहीं है। लेकिन भारतीय कंपनियाँ उन सस्ती दवाओं के लिए सक्रिय दवा घटक (एपीआई) चीन से खरीदती हैं। आज अमेरिकी बाजार में सबसे ज्यादा आईफोन भारत से बनकर जा रहे हैं, लेकिन भारत में आईफोन के रूप में अंतिम उत्पाद तैयार करने के लिए कल-पुर्जों का कच्चा माल चीन से बनकर आ रहा है।
ये तो परोक्ष बातें हो गयीं, लेकिन इस प्रकरण में भारत तो प्रत्यक्ष भी जुड़ा हुआ है। ट्रंप ने 2 अप्रैल को जब पारस्परिक शुल्क की घोषणा की तो उसमें भारत भी सीधे निशाने पर आया। भारत के ऊपर ट्रंप सरकार ने 26% की दर से पारस्परिक शुल्क लगाया। हालाँकि फिलहाल इससे भारत को राहत मिल गयी है, क्योंकि ट्रंप ने चीन को छोड़ लगभग सभी देशों पर पारस्परिक शुल्क को 3 महीने के लिए रोक दिया है। यह रोक जुलाई के मध्य तक प्रभावी रहने वाली है। इस दौरान अमेरिका सभी देशों के निर्यात पर सिर्फ 10% बुनियादी आयात शुल्क वसूल कर रहा है। ट्रंप उससे पहले कई मौकों पर सीधे नाम लेकर भारत पर हमला कर चुके हैं. शपथग्रहण के बाद पहले भाषण में भी उन्होंने भारत का नाम लिया था। ट्रंप पिछले कार्यकाल से ही भारत को ‘टैरिफ किंग’ की उपाधि देते आये हैं। इस बार उनका रुख भारत पर भी पिछले कार्यकाल की तुलना में सख्त है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फरवरी में जब अमेरिका यात्रा पर गये थे, तब संबंधों में कुछ नरमी आने की उम्मीद की जा रही थी। हालाँकि ऐसा हुआ नहीं। प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात के एक घंटे पहले ट्रंप भारत का नाम लेकर भारी-भरकम शुल्क लगाने की बात कर रहे थे।
भारत ने ट्रंप का दूसरा कार्यकाल शुरू होने के बाद बाद अपनी ओर से शुल्क कम करने के कई प्रयास किये। इसके तहत सबसे पहले 1 फरवरी को बजट के साथ उपाय किये गये। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट पेश करते हुए अमेरिकी इलेक्ट्रिक कारों और मोटरसाइकिलों पर शुल्क कम करने का ऐलान किया। उसके बाद प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिकी यात्रा के दौरान भारत ने अमेरिका के बर्बन व्हिस्की पर शुल्क में कटौती की। अभी भारत का प्रयास अमेरिका के साथ जल्द से जल्द द्विपक्षीय व्यापार समझौता करने का है। भारत चाहता है कि जुलाई के मध्य में पारस्परिक शुल्क पर लगी रोक की अवधि समाप्त हो, उससे पहले अमेरिका के साथ अंतरिम समझौता हो जाये। दोनों देशों ने इस दिशा में अच्छी प्रगति भी की है। अप्रैल में ही व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर बातचीत का खाका तैयार कर लिया गया। इसमें दोनों देशों ने आम सहमति से उन विषयों को चुना, जिनके बारे में बातें की जानी हैं। अप्रैल में ही अमेरिका के उपराष्ट्रपति व ट्रंप के दाहिने हाथ जेडी वेंस भारत यात्रा पर आये।
अगर भारत जल्द से जल्द अमेरिका के साथ व्यापार समझौता कर लेता है, तो वैश्विक व्यापार युद्ध का ज्यादा से ज्यादा लाभ मिल पाना सुनिश्चित होगा। अमेरिका और चीन के बीच गतिरोध के स्थायी तौर पर समाप्त होने में वर्षों लग सकते हैं। ऐसे में कंपनियाँ वैकल्पिक गंतव्यों का रुख करेंगी। पिछली बार जब ऐसी स्थिति बनी तो भारत को वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देशों से कड़ी चुनौती मिली। इस कारण भारत को बाइडन सरकार की चीन प्लस वन की नीति का ज्यादा लाभ नहीं मिल पाया। इस बार स्थितियाँ और अनुकूल हैं। ट्रंप के निशाने पर वियतनाम और इंडोनेशिया भी हैं। भारत जल्दी व्यापार समझौता करने पर इन दोनों से प्रतिस्पर्धी लाभ की स्थिति में पहुँच जायेगा। अभी तक के रुझान इसी दिशा में संकेत कर रहे हैं। एप्पल ने भारत में आईफोन का विनिर्माण बढ़ाने का निर्णय लिया है। अब वह अमेरिकी बाजार में 90% आईफोन भारत से भेज रही है। इसे 100% पर ले जाने का लक्ष्य है। सैमसंग और गूगल जैसी दिग्गज कंपनियाँ अपने उत्पादों का विनिर्माण वियमनात से भारत लाने पर विचार कर रही हैं। फॉक्सकॉन की योजना भारत में इलेक्ट्रिक वाहन बनाने की है। वियतनाम की इलेक्ट्रिक कार कंपनी विनफास्ट भी भारत में विनिर्माण शुरू करने की तैयारी में है। साफ है कि अमेरिका की आक्रामक नीतियों ने दिग्गज कंपनियों को वैकल्पिक विनिर्माण केंद्र खोजने के लिए प्रेरित किया है भारत इसमें एक स्वाभाविक दावेदार के रूप में उभरा है। इसमें केंद्र सरकार की उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजनाएँ (पीएलआई) भी मददगार साबित हो सकती हैं। दूसरी ओर चीन की कंपनियाँ भी भारत में पैर जमाने के लिए जमीन खोज रही हैं। उदाहरण के लिए चीन की उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरण बनाने वाली कंपनी हायर भारत में स्थानीय भागीदार खोज रही है। हायर की योजना भारतीय इकाई में हिस्सेदारी को 50% से नीचे लाने की है, ताकि उसके ऊपर से चीनी कंपनी का ठप्पा हटे। रेफ्रिजरेटर, एसी, वॉशिंग मशीन आदि बनाने वाली इस कंपनी में 51% तक हिस्सा खरीदने में मुकेश अंबानी भी रुचि ले रहे हैं। भारती एयरटेल वाले सुनील मित्तल भी एक हायर के साथ बातचीत कर रहे हैं। अन्य चीनी कंपनियाँ भी ऐसा रास्ता अपना सकती हैं। वाहन कंपनी एमजी मोटर पहले ही यह काम कर चुकी है। इससे न सिर्फ भारत में नया निवेश आयेगा, बल्कि विनिर्माण में काफी तेजी आयेगी, जो निर्यात को बढ़ायेगा और अंतत: रोजगार सृजन करते हुए भारत की अर्थव्यवस्था को लंबी अवधि में उल्लेखनीय मजबूती प्रदान करेगा।
हालाँकि इसका अधिक से अधिक लाभ सुनिश्चित करने के लिए भारत को तेजी से प्रयास करने की जरूरत है। अभी अमेरिका और चीन के बीच हुए प्रारंभिक सौदे से ही भारत के हित पर कुछ असर पड़ने की आशंकाएँ उठने लगी हैं। निर्यातकों के समूह भारतीय निर्यात संगठन महासंघ (एफआईईओ) का कहना है कि अमेरिका और चीन के बीच व्यापार सुलझने से भारत को कुछ नुकसान हो सकते हैं। इससे अमेरिका और चीन के बीच इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और रसायन जैसे उच्च मूल्य वाले क्षेत्रों में आपसी व्यापार बढ़ेगा। इससे दक्षिण-पूर्वी एशिया, अफ्रीका और लातिनी अमेरिका जैसे बाजारों में भारतीय निर्यातकों को कड़ी प्रतिस्पर्धा मिल सकती है। महासंघ का कहना है कि भारत इन बाजारों में हाल ही में पैठ बनाने में कामयाब हुआ है। इसी तरह विश्वबैंक समूह के अध्यक्ष अजय बंगा का कहना है कि व्यापार युद्ध के चलते वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में जो बदलाव होने वाले हैं, उनका अधिकाधिक लाभ उठाने के लिए भारत के पास बस 5 सालों का समय है। भारत को अभी यह सोचने की जरूरत है कि वह कैसे अवरोधों को दूर करे और बदलते वैश्विक व्यापार परिदृश्य का लाभ उठाने के लिए खुद को तैयार करे।