अक्षत मित्तल
भारत में टीकाकरण (Vaccination) का अभियान गाजे-बाजे के साथ शुरू किया गया था। तमाम मंत्री, मुख्यमंत्री और सांसद सरकार की इस उपलब्धि पर फूले नहीं समा रहे थे। घोर आशावादी सरकार ने समय से पहले ही संक्रमण पर विजय घोषित कर दी, लेकिन बाद के हालातों में फिर एक बार फ़्रांसिस बेकन सही साबित हो गए, जिन्होंने कहा था कि “आशावाद एक अच्छा नाश्ता हो सकता है, लेकिन इससे पेट नहीं भरता।”
भारत के टीकाकरण (Vaccination) के आंकड़ों का अध्ययन करने पर हमें सूरत-ए-हाल कुछ और नजर आएगी। वैक्सीन की कम से कम एक खुराक प्राप्त करने वाली आबादी पर नजर डालते हैं। 30 अप्रैल तक Vaccination के तीन चरणों के बाद, 45 साल से ऊपर वाले 12.7 करोड़ लोगों का टीकाकरण हुआ। इन चरणों में पात्र व्यक्तियों की कुल संख्या 28.6 करोड़ थी। इस हिसाब से 30 अप्रैल तक, योग्य आबादी के लगभग 44 प्रतिशत ही लोगों का आंशिक रूप से टीकाकरण किया गया था। हालांकि, यह आंकड़ा 18 वर्ष से ऊपर की आबादी में केवल 13.5 प्रतिशत और कुल आबादी का सिर्फ 9.2 प्रतिशत ही है। इसके विपरीत, संयुक्त राज्य अमेरिका (50.4 प्रतिशत), यूनाइटेड किंगडम (43.3 प्रतिशत) और जर्मनी (26.7 प्रतिशत) में, कुल आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा 30 अप्रैल तक कम से कम एक खुराक प्राप्त कर चुका था।
समझने वाली बात यह है कि चूंकि पात्र जनसंख्या तीन करोड़ से बढ़कर 13.8 करोड़ और फिर 28.6 करोड़ हो गई, तो इस हिसाब से प्रतिदिन ली जाने वाली वैक्सीन खुराक की संख्या में भी तेजी से वृद्धि होनी चाहिए थी। मार्च 2021 में यह संख्या 13 लाख से बढ़कर अप्रैल 2021 में 25 लाख हो गई। गंभीर बात यह है कि सात अप्रैल को 46.4 लाख खुराक से, यह संख्या 30 अप्रैल को काफी घटकर 15.7 लाख रह गई। टीकों की भरसक कमी इसका कारण थी। वैक्सीन वितरण में अंतर-राज्य विविधताएं भी इस अभियान की प्रमुख समस्याओं में से एक हैं। दूसरी तरफ पूरे देश में वैक्सीन के वितरण ने सामंजस्य हासिल किया था और आपूर्ति की कमी के बावजूद यह ज्यादा सहज था, लेकिन मई से वैक्सीन खरीद को विकेंद्रीकृत करने के केंद्र सरकार के फैसले ने अब आपूर्ति श्रृंखला के साथ लोजिस्टिकल बाधाएं जैसी ताजा अड़चनें पैदा कर दी हैं।
एक और बड़ी समस्या टीका अपव्यय की भी है। इसे भी हम आंकड़ों में ही समझते हैं। भारत में एक मई से लगभग 60 करोड़ से अधिक लोग कोविड-19 (Covid) वैक्सीन प्राप्त करने के पात्र बन जाएंगे। इस 60 करोड़ की आबादी की संख्या में कुछ कमी आएगी, क्योंकि कई सारे राज्यों ने एक मई से 18 वर्ष की अधिक आयु वाले लोगों का टीकाकरण करने में अपनी असमर्थता जताई है। उत्तर प्रदेश सहित कई राज्य ऐसे हैं जहां बेहद आंशिक रूप से ही 18 वर्ष से ऊपर वालों का टीकाकरण हो रहा है। घोषणा के वक्त न्योछावर हुए जा रहे मंत्री बाद के हालातों और अव्यवस्था पर मौन हैं।
दरअसल एक मई तक कम से कम चार करोड़ लोग अपनी दूसरी खुराक के लिए पात्र हो गए थे और यह संख्या हर गुजरते दिन बढ़ेगी, जो मई के अंत तक 6.5 करोड़ से अधिक हो जाएगी। सरकारी दिशानिर्देशों के अनुसार, दूसरी खुराक को पहली खुराक के चार से आठ सप्ताह के भीतर दिया जाना चाहिए। समय पर टीकाकरण न होने पर, टीकाकरण की पूरी प्रक्रिया प्रारम्भ से शुरू करनी होगी। सरकार को स्पष्ट दिशानिर्देशों के साथ आने की जरूरत है, जिससे कोई भी पीछे न रह जाए, और न ही एक भी कीमती खुराक बर्बाद हो, खासकर तब जब भारत पहले ही 11 अप्रैल तक 46 लाख खुराक बर्बाद कर चुका है।

आंकड़ों के अध्ययन के बाद सवाल कई सारे हैं। टीकाकरण को लेकर राष्ट्रीय रणनीति क्यों नहीं बनाई गई? क्यों सारी खुराकों को केंद्र सरकार ने अधिकृत नहीं किया? केस बढ़ने के बावजूद मार्च में तेजी से वैक्सीन का निर्यात क्यों हुआ? पहले से चल रही एक सहज नीति को क्यों बदला गया? राज्य और केंद्र सरकार के लिए एक ही वैक्सीन के अलग दाम क्यों? वैक्सीन के दामों पर उपरी लिमिट क्यों नहीं निर्धारित हुई? वैक्सीन की संख्या में इजाफे की जिम्मेदारी किसकी? जो कोविशील्ड (Covishield) और कोवैक्सीन (Covaxin) केंद्रीय बजट से खरीदी गईं उसमें एक खुराक का दाम 157.50 रुपये था, वह पीएम केयर्स से 210 और 309.75 रुपये खुराक कैसे हो गया? ऐसे हालातों में क्या सेंट्रल-विस्टा (Central Vista) की जरूरत है?
सवाल कई सारे हैं, लेकिन जवाबदेही किसी की नहीं। भारत कोविड से नहीं अव्यवस्था से हार रहा है!