Vaccine Hesitancy और Vaccine Willingness पर क्या कहता है Gallup का सर्वेक्षण?

फीचर कोरोना वायरस
Spread the love

अक्षत मित्तल

भारत में जब से टीकाकरण (vaccination) अभियान धीमा पड़ा, तबसे एक बात की चर्चा खूब हुई और वह थी कि लोगों के मन में वैक्सीन (Vaccine) को लेकर बहुत विरोधाभास है। सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक पार्टियों के बयान तक में वैक्सीन हेसीटेंसी (Vaccine Hesitancy) और वैक्सीन विलिंगनेस (Vaccine Willingness) के आंकड़ों पर अलग-अलग दावे पेश किए जाते रहे हैं। सनद रहे कि भारत सरकार वैक्सीन हेसीटेंसी या वैक्सीन विलिंगनेस पर कोई डाटा नहीं बनाती। तो ये आंकड़े आ कहां से रहे हैं? सरल है, या तो ये आंकड़े किसी गैर-सरकारी संस्था के हैं या ये आंकड़े नेताओं के मन की उपज हैं। दरअसल ये बहस केवल मुख्य मुद्दों से भटकाने के लिए होती हैं। ऐसे दावों से जनता के मन में इस बात का अपराध बोध पैदा किया जाता है कि हम तो वैक्सीन लगाना चाहते हैं, लेकिन आप लोग ही लगवाना नहीं चाहते।

वैक्सीन हेसीटेंसी और वैक्सीन विलिंगनेस पर हमारे पास Gallup का एक अध्ययन उपलब्ध है। इससे हमें वैक्सीन हेसीटेंसी और वैक्सीन विलिंगनेस से संबंधित तर्कों को जानने में मदद मिलेगी। Gallup के अध्ययन आंकड़े मैं नीचे बुलेट पॉइंट्स में दे रहा हूं। आंकड़ों के साथ मैं Gallup द्वारा पब्लिक में उपलब्ध वैक्सीन विलिंगनेस पर देशों की सूची भी साझा कर रहा हूं। इसे पढ़ें और समझें-

  • विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी देश में Herd Immunity पा लेने के लिए वहां की कम से कम 70 फीसदी से 90 फीसदी तक की आबादी को टीका देने की आवश्यकता होगी।
  • दुनिया के ज्यादातर देशों में इतनी बड़ी संख्या में लोग वैक्सीन लेना नहीं चाहते।
  • Gallup के अनुसार दुनिया भर में 68 फीसदी वयस्क पिछले साल वैक्सीन लेने के इच्छुक थे।
  • वैक्सीन लेने के इच्छुक वयस्क म्यांमार में 96 फीसदी से लेकर कज़ाकिस्तान में 25 फीसदी जितने कम थे।
  • इसके अलावा पूरी दुनिया में 32 प्रतिशत वयस्क- यानी करीब 1.3 बिलियन लोग टीका नहीं लेना चाहते।
  • लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि जिन्होंने वैक्सीन लेने के लिए हामी भरी, अगर वह सभी वास्तव में कोरोनो वायरस (COVID-19) वैक्सीन ले लेते हैं, तो भी Gallup द्वारा किए गए 116 देशों के सर्वेक्षण में से सिर्फ 38 देशों की ही 70 फीसदी से ज्यादा आबादी वैक्सीन लेना चाहती थी, जो Herd Immunity पा लेने के लिए Gallup द्वारा न्यूनतम सीमा रखी गई थी। केवल एक देश, म्यांमार ने 90 फीसदी से ऊपर की Vaccine विलिंगनेस दर प्राप्त की।
  • यूनाइटेड किंगडम, जर्मनी और ब्राजील सहित 22 अन्य देशों में 70 फीसदी से 79 फीसदी लोग टीकाकरण के लिए इच्छुक थे।
  • पूर्वी यूरोप और रूस समेत पूर्व सोवियत राज्यों में प्रतिशत के अनुपात में सबसे कम लोग टीकाकरण के लिए इच्छुक थे।

अब भारत के आंकड़े भी समझते हैं-:

  • भारत उन 15 देशों में शुमार है, जहां कोरोना वायरस वैक्सीन लेने का इच्छुक लोगों का प्रतिशत यानी वैक्सीन विलिंगनेस दर 80 फीसदी से 89 फीसदी जितनी ज्यादा है।
  • भारत Gallup की इस 116 देशों की सूची में 16वें स्थान पर है।
  • भारत में 82 फीसदी लोग वैक्सीन लेने के इच्हुक थे।
  • भारत में वैक्सीन ना लेने के इच्हुक लोगों का प्रतिशत यानी वैक्सीन हेसीटेंसी दर मात्र 17 फीसदी ही है, जबकि एक प्रतिशत लोग यह तय नहीं कर पाए हैं कि उन्हें वैक्सीन लेनी है या नहीं।
  • आश्चर्य की बात यह है कि भारत में वैक्सीन लेने के इच्हुक लोगों की संख्या कई विकसित देश, जैसे: ऑस्ट्रेलिया (76 फीसदी), यूके (75 फीसदी), जर्मनी (73 फीसदी), जापान (70 फीसदी), यूएई (68 फीसदी), कनाडा (68 फीसदी), यूएस (53 फीसदी) और रूस (37 फीसदी) से भी ज्यादा है.
  • गौर करने वाली बात यह है कि Gallup का सर्वेक्षण 2020 में पूरी दुनिया में किया गया था। इसके बाद भारत में कोविड की बेहद भीषण दूसरी लहर आई, जो पहली लहर से कई गुना ज्यादा घातक साबित हुई। ऐसे में यह उम्मीद करना वाजिब है कि संक्रमण की दूसरी लहर का प्रभाव और टीके का अधिक लोगों के लिए उपलब्ध होना, वैक्सीन विलिंगनेस दर को और बढ़ाएगा।
  • उदाहरण के लिए, अमरीका में टीकों के प्रति राय पिछले एक साल में बदल गई है। 2020 में सितंबर और अक्टूबर के बीच विश्व पोल के अनुसार बमुश्किल 53 फीसदी अमेरिकियों ने कहा था कि वे टीकाकरण के लिए सहमत होंगे, लेकिन मार्च 2021 तक, वैक्सीन रोलआउट होने के कुछ ही महीनोंमें, 74 फीसदी अमरीकीयों ने यह कहा कि वे कोरोनवायरस के लिए एफडीए आपातकालीन-अनुमोदित टीकों में से एक टीका लगवाएंगे।

इन आंकड़ों के बाद मेरे कुछ सवाल हैं-

  • भारत में वैक्सीन हेसीटेंसी दर कम और वैक्सीन विलिंगनेस दर ज्यादा होने के बावजूद यह भ्रम क्यों फैलाया जा रहा है कि लोग वैक्सीन लेना नहीं चाहते?
  • वैक्सीन हेसीटेंसी और वैक्सीन विलिंगनेस पर बोलने वालों के आंकड़ों का आधार क्या है?
  • जब आंकड़े बताते हैं कि भारत में लोग वैक्सीन लेने के इच्हुक हैं, तो फिर उन्हें पर्याप्त संख्या में वैक्सीन क्यों नहीं दी जा रही?
  • वैक्सीन लगाने की संख्या में वृद्धि की बजाय जनता पर दोष क्यों डाला जा रहा है?
  • वैक्सीन हेसीटेंसी पर ऐसी अफवाहों और झूठे दावों से आखिर किसे फायदा हो रहा है?
  • और सबसे बड़ा सवाल यह है कि जनता ऐसी झूठी बातों पर विश्वास कर सरकारों (केंद्र एवं राज्य) को दोषमुक्त कर खुद अपराधबोध में क्यों जा रही है? जनता ये क्यों मानने लगी कि वैक्सीन ना लगने पर भी गलती उसकी ही है?

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *