अक्षत मित्तल
प्रथम विश्व युद्ध के समय ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे डेविड लॉयड जॉर्ज कहते थे कि संकेत मिलने पर एक बड़ा कदम उठाने से डरो मत। दो छोटी छलांगों में एक क्रॉस को पार नहीं किया जा सकता है। यदि आप कोविड-19 महामारी की शुरुआत से सरकार के नीतिगत फैसलों को देख-समझ रहे हैं, तो आपको पता होगा कि सरकार ने राजकोषीय नीति पर पर्याप्त काम नहीं किया है, यानी सरकार ने सीधे अपने खाते से खर्च नहीं किया है और काफी हद तक भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति पर (कम ब्याज दरों और ऋण) अर्थव्यवस्था को लेकर निर्भर रहे हैं।
सरकार के पर्याप्त राजकोषीय लागत ना लगाने की वजह से आज भारत दुनिया की तमाम अर्थव्यवस्थाओं में सबसे बुरी प्रभावित अर्थव्यवस्था है। इस संबंध में, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक की हालिया रिलीज कुछ और पुख्ता सबूत प्रदान करती है। इससे हमें पता चलता है कि दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में भारत का औद्योगिक उत्पादन सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। इस रिपोर्ट के अनुसार अल्पावधि (2019 से 2021) और मध्यम अवधि (2019 से 2025) में भारत को सबसे ज्यादा जीडीपी घाटा होगा। अधिकांश अर्थव्यवस्थाएं जिनसे भारत आमतौर पर अपनी तुलना करता है- जैसे कि चीन, अमरीका, पाकिस्तान, इंडोनेशिया और ब्राजील इस महामारी से कम प्रभावित होंगी।
उन पैकेजों से क्या फायदा हुआ और अर्थव्यवस्था ने तेजी पकड़ी या नहीं ये तो सबको पता है। केंद्र सरकार द्वारा हाल ही में एक और नया प्रोत्साहन पैकेज लाया गया। हालांकि एसबीआई अनुसंधान रिपोर्ट के अनुसार इस नए राजकोषीय प्रोत्साहन पैकेज से भी इस वित्त वर्ष के दौरान केंद्र से केवल 40,000 करोड़ रुपये की ही अतिरिक्त नकदी निकलेगा, जो जीडीपी के मात्र 0.21 प्रतिशत के बराबर है। अब इतने मात्र से उस अर्थव्यवस्था का क्या होगा जो इस पूरे वर्ष शून्य से 10 प्रतिशत नीचे रहने वाली है। दूसरी चीज मैं जिसका अपने काफी सारे लेखों में जिक्र कर चुका हूं, वो है रोजगार। मैं लिखता रहा हूं कि भारत की अर्थव्यवस्था में चमत्कारिक उछाल तभी संभव है जब सरकार किसी तरह की वेतन संरक्षण या जॉब गारंटी या सब्सिडी योजना लेकर आए।
दुनिया के तमाम देशों ने अपने समग्र आर्थिक उपाय रोजगारों को बचाने पर केंद्रित कर दिए हैं, जबकि भारत सरकार छंटनी और बेरोजगारी के विषय पर सवाल भी सुनना नहीं चाहती। अन्य देशों में वेतन संरक्षण या पगार सब्सिडी सरकारों के रोजगार बचाओ अभियानों का सबसे बड़ा हिस्सा है। ब्रिटेन की फर्लो, जर्मनी की कुर्जरबेट जैसी स्कीमों सहित फ्रांस, इटली, कनाडा, मलेशिया, हांगकांग, नीदरलैंड, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, डेनमार्क और सिंगापुर सहित 35 देशों में कंपनियों को सब्सिडी बोनस दिया जा रहा है। अमरीका में छोटे उद्योगों को तकरीबन मुफ्त कर्ज मिल रहा है ताकि कर्मचारियों की तनख्वाहें न कटें। इन सभी देशों में कर्मचारियों के 70 से 84 फीसद तक वेतन संरक्षित किए गए हैं। इन स्कीमों का लाभ मध्य वर्ग को मिला है जिससे बाजार में मांग बनाए रखने में मदद मिली है।
अमेरिका, दक्षिण कोरिया, चीन (प्रवासी श्रमिक), कनाडा, आयरलैंड, बेल्जियम, ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसे देशों ने बेरोजगार हुए लोगों और उनके परिवारों को बेरोजगारी भत्ते दिए हैं। इसके अलावा अमेरिका, स्वीडन, डेनमार्क, कनाडा, आयरलैंड, फ्रांस सहित करीब दो दर्जन देशों ने अपने यहां स्वरोजगारों के लिए सब्सिडी और नुकसान भरपाई की स्कीमें शुरू की हैं, जिनमें उनके हर माह हुए नुकसान का 60 से 70 फीसद हिस्सा वापस हो रहा है। ज्यादातर स्कीमें छोटे उद्योगों में रोजगार बचाने पर केंद्रित हैं, जबकि बड़ी कंपनियों को टैक्स रियायतें देकर नौकरियां और वेतन कटौती रोकने के लिए प्रेरित किया गया है।
दूसरी तरफ, इस दौरान भारत में किस्म-किस्म के टैक्स, बैंकों से मनचाहे कर्ज दर के बावजूद हमारी सरकारों के पास इस सबसे मुश्किल वक्त में हमारे लिए कुछ नहीं है। सरकार ने 20 करोड़ महिला जनधन खातों में तीन माह में केवल 1,500 रुपये डलाये गए, जो आठ दिन की मनरेगा मजदूरी के बराबर हैं और इसपर भी मंत्री और समर्थक इसे अपनी सरकार की सबसे सफलते और गाजे-बाजे के साथ इसका प्रचार करते हैं। शेक्सपियर के जूलियस सीजर में एक संवाद आज के हालातों पर एकदम सटीक बैठता है कि: खोट हमारे सितारों में नहीं है, हम ही गए बीते हैं।
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