विश्व नदी दिवस : नदी सम्पर्क योजना से जलविहीन हो जायेंगी नदियां?

फीचर चौपाल
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गुंजन मिश्रा

विश्व नदी दिवस सितंबर के अंतिम रविवार को प्रतिवर्ष मनाया जाता है। इस साल यह दिन 27 सितंबर 2020 को मनाया गया। विश्व नदी दिवस का उद्देश्य सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाने के लिए प्रयास करना है, और दुनिया भर में सभी नदियों के बेहतर संचालन को प्रोत्साहित करना है। संयुक्त राष्ट्र  ने 2005 में वाटर फॉर लाइफ दशक लॉन्च किया था। इसका उद्देश्य दुनिया भर में जल संसाधनों की बेहतर देखभाल की आवश्यकता के बारे में अधिक जागरूकता पैदा करने में मदद करना था। इस पहल के बाद, अंतरराष्ट्रीय नदियों के अधिवक्ता मार्क एंजेलो के प्रस्ताव के जवाब में विश्व नदी दिवस की स्थापना की गई।

लोगों के जीवन में नदियाँ बहुत महत्व रखती हैं। नदियों के महत्व को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। नदी केवल एक चैनल नहीं है जिसके माध्यम से पानी बहता है। यह एक गतिशील प्रणाली है, जो मछलियों सहित हजारों पौधों और जानवरों की प्रजातियों का समर्थन करती है| जो लाखों मछुआरों को आजीविका प्रदान करते हैं और लोगों को अच्छी गुणवत्ता वाले प्रोटीन के स्रोत हैं। पचास करोड़ से अधिक लोगों की आजीविका केवल गंगा जल पर निर्भर है, इसमें 25 करोड़ लोग सीधे गंगा पर पूरी तरह आश्रित हैं। स्पष्ट है क़ि गंगा आस्था का ही नहीं बल्कि आजीविका का भी स्रोत है। 

नदियों का महत्व

  • नदियाँ पोषक तत्वों और पृथ्वी के चारों ओर के क्षेत्रों में ले जाती हैं। नदियाँ के जल चक्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, सतह के पानी के लिए जल निकासी चैनलों के रूप में कार्य करती है। यह पृथ्वी की भूमि की सतह का लगभग 75 प्रतिशत भाग नालियों के रूप में भी बनाती है |
  • नदियाँ पृथ्वी के कई जीवों के लिए भोजन और आवास प्रदान करती हैं।साथ ही, कई दुर्लभ पेड़ और पौधे नदियों द्वारा विकसित होते हैं। ओटर्स, डक और बीवर नदी किनारे अपने घर बनाते हैं। नदी के किनारे बुलर और रीड जैसे पौधे उगते हैं।
  • कुछ जानवर खाने-पीने के लिए नदी का इस्तेमाल करते हैं। किंगफिशर जैसे पक्षी नदी से छोटी मछली खाते हैं। मृग, शेर और हाथी जैसे जानवर नदियों का पानी पीते हैं। भालू जैसे जानवर नदियों से मछली पकड़ते हैं।
  • वन्यजीवों की कई अलग-अलग प्रजातियां रिवर डेल्टास में मौजूद हैं। स्तनधारी, पक्षी, और कीट अपने घरों और भोजन के लिए डेल्टा का उपयोग करते हैं। नदियाँ वाणिज्य, अन्वेषण और मनोरंजन के लिए मार्ग और यात्रा मार्ग प्रदान करती हैं।
  • नदियों के पास की घाटियाँ और मैदान उपजाऊ मिट्टी प्रदान करते हैं। शुष्क क्षेत्रों में किसान पास की नदियों से सिंचाई के द्वारा किए गए पानी का उपयोग करके अपने फसल की सिंचाई करते हैं।
  • नदियाँ एक महत्वपूर्ण ऊर्जा स्रोत के रूप में कार्य करती हैं। प्रारंभिक औद्योगिक युग में, दुकानों, मिलों और कारखानों का निर्माण नदियों के पास किया गया था |

भारत की नदी प्रणालियों को 20 नदी बेसिनों में बाटा गया है।  इनमे 12 ऐसी नदियों के बेसिन है, जिनमें से प्रत्येक नदी के पानी का बहाव का क्षेत्र 20,000 वर्ग किमी से अधिक है। शेष आठ बेसिन माध्यम और कम दूरी तक बहने वाली नदियों की प्रणालियाँ है।  जिनमे गंगा का बेसिन महत्वपूर्ण है क्योंकि गंगा नदी को वर्णन वेदों, पुराणों और रामायण तथा महाभारत जैसे महाकाव्यो में किया गया है। इसके अलावा गंगा नदी की प्रणाली अपनी सहायक नदियों के साथ – साथ भारत की सबसे बड़ी नदी प्रणाली है।  यह शक्तिशाली नदी गंगोत्री ग्लेशियर के 25 किलोमीटर लम्बे क्षेत्र में गोमुख नामक स्थान से निकलती है। अपने उद्गम स्थान से लेकर समुद्र में गिरने तक की गंगा नदी की कुल लम्बाई 2525 किलोमीटर है। गंगा का बेसिन भारत का सबसे बड़ा और सबसे अधिक महत्वपूर्ण जल क्षेत्र है, जो कुल मिलकर 1,28,411 वेग किलोमीटर के इलाके को छूता हुआ निकलता है। गंगा का बेसिन देश की कुल आबादी के लगभग 37 फीसदी हिस्से का अपना योगदान देता है जिसमे 84 फीसदी लोग गाँवो में रहते है और 16 फीसदी लोग शहरों और कस्बों में। गंगा के बेसिन का क्षेत्र देश की सबसे ज्यादा कृषि योग्य भूमि का क्षेत्र है। इसमें बेसिन के कुल क्षेत्रफल में 62.5 प्रतिशत क्षेत्र में खेती होती है। गंगा की सहायक नदियों में उत्तर की सात प्रमुख नदियां है।  छह नदियां दक्षिण की ओर से आकर गंगा में मिलती है, और पांच नदियां एकदम पूर्व में है, जो हुगली में आकर मिलती है।

गंगा का आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक महत्व किसी से भी छुपा हुआ नहीं है जैसा की गंगा के 108 नाम जो गंगा स्त्रोत सात नामावली में उल्लेखित है,  वो भी गंगा को पूरी तरह परिभाषित करते है, इसके बाबजूद गंगा का क्या हाल है ये देश के लोगो से छिपा नहीं है। गंगा को साफ़ करने के लिए दशकों से भिन्न-भिन्न योजनाएं सरकार द्वारा चलाई जा रही है उसके बाबजूद गंगा निर्मल – अविरल न हो सकी।  कारण गंगा को बचपन में ही कैद कर लेना।  गंगा पर बांध उसके गंगत्व को खत्म करके इसको पूरी तरह से विलुप्त करने में सहायक सिद्ध हो रहे हैं। गंगा एक राष्ट्रीय नदी घोषित होने के बाद भी अपने जीवन के लिए बांधों के कारण जूझ रही है। जबकि पर्यावरणविद स्वामी सानंद उर्फ़ डॉ जी डी अग्रवाल ने अपने आप को गंगा को बचाने के लिए न्योछावर कर दिया, उसके बाबजूद गंगा पर सिर्फ बातें होती रही। आज जब दुनिया नदियों को संरक्षित करने के लिए उन पर बने बांधों को हटा रही है, उदाहरण के लिए वर्ष 1912 से 2018 तक, अमेरिका में 1,578 बांधों को हटाया गया ताकि मछली के मार्ग और निवास स्थान तक पहुंच बहाल हो सके, सुरक्षा खतरों को खत्म किया जा सके और आसपास के समुदायों के लिए भविष्य में जल की उपलब्धता हो  सके। लेकिन भारत में अभी भी आधुनिक विकास के मंदिरों यानी बांधों का निर्माण हो रहा है।

बांध के लिए विकल्प के रूप में ये बात सिद्ध हो चुकी है कि छोटे छोटे केचमेंटस बनाकर बांधो से ज्यादा जल संग्रहित किया जा सकता है। केंद्रीय मिटटी व् जल संरक्षण अनुसंधान संस्थान द्वारा किये गए अध्ध्यनों से पता चलता है कि छोटे तालाब बांधो की अपेक्षा पांच गुना ज्यादा पानी एकत्रित करते है। यह भी अनुमान लगाया गया है कि भारत का प्रत्येक गांव प्रतिबर्ष ३.७५ अरब लीटर पानी एकत्र कर सकता है, जिससे गांव की पानी की जरूरत पूरी हो सकती है।  

नदियों को जलविहीन करने की एक और योजना नदी गठजोड़ पर सरकार काम कर रही है, क्योंकि जिन देशों ने भी नदी पर बांध बनाये आज वो अब अरबों रुपये खर्च करके बांधों को नष्ट करने में लगे हुए हैं। इन देशो से सबक ना लेकर भारत सरकार गंगा नदी के जीवंत ही नहीं बल्कि दिव्य जल को हाइड्रो पावर प्लांट्स के जरिये नष्ट करने पर कार्य कर रही है, जबकि होना ये चाहिए कि गंगा को नुककसान पहुंचाने वाले किसी भी कार्य को राष्ट्रीय अपराध घोषित किया जाये।  वैसे भी अब दुनिया में ईकोसाइड को अंतरराष्ट्रीय अपराध में शामिल करने के लिए आंदोलन हो रहे हैं।    

सरकार और नीति निर्माताओं ने गंगा को आम आदमी की नज़र व आस्था से कभी भी नहीं देखा। इसीलिए गंगा, वर्ल्डवाइड फंड फॉर नेचर द्वारा दुनिया की 10 सबसे लुप्तप्राय नदियों में सूचीबद्ध है। कृषि और औद्योगिक कचरे के साथ सीवेज ने दुनिया की सबसे प्रदूषित नदियों की सूची में इंडोनेशिया के सिटारुम के बाद गंगा को दूसरे स्थान पर रखा है।  आकड़ों के अनुसार बनारस में प्रतिवर्ष 35000 से अधिक शव दाह होते हैं, और अनुमानतः सेकड़ों टन अधजले शव को गंगा में प्रवाहित किया जाता है। ये आंकड़े सिर्फ एक शहर के हैं।  गंगा के तटों पर दो लाख से अधिक शवों का अंतिम संस्कार किया जाता है। गंगा का कछार क्षेत्र विश्व का सबसे अधिक उपजाऊ क्षेत्र है। गंगा के कछारी क्षेत्र में कृषि में उपयोग आने वाले उर्वरकों क़ी मात्रा 100 लाख टन है। जिसका पांच लाख टन बहकर गंगा में मिल जाता है। इसके अलावा 1500 टन कीटनाशक भी गंगा के पानी में घुलित हो जाता है। इसका सीधा प्रभाव गंगा की जैवविविधता पर पड़ता है। बांधों के कारण मछलियों और झींगा आदि पर संकट के अलावा गंगा में तीन सौ तरह के शैवाल हैं। ये शैवाल मछलियों के भोजन के काम में आते हैं।शैवाल गंगा के बेड पर रहता था। अब उस पर गाद जमने की वजह से धीरे-धीरे वह समाप्त हो रहा है। यानी गंगा में रहने वाले जीव जंतुओं की खाद्य श्रृंखला बाधित हो रही है। गंगा के जलजीवों पर इसका भयानक असर पड़ रहा है।जो  शैवाल हैं, वे प्रदूषण के कारण हरित शैवाल में तब्दील हो रहे हैं जो जल – जीवों के भोजन के काम में नहीं आते क्योंकि जहरीले हो जाते हैं।

गंगा नदी के संरक्षण हेतु गंगा महासभा ने गंगा (संरक्षण व प्रबंधन ) अधिनियम 2012 का प्रारूप तैयार किया था। इसमें गंगा को किस तरह अविरल – निर्मल बनाये रखा जा सकता है उसके लिए नियम और कानूनों का उल्लेख पांच अध्यायों में किया गया है, लेकिन यह मसौदा अधिनियम जिसको देश के जाने माने न्यायधीशों, वकीलों, पर्यावरणविदों व केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के भूतपूर्व अधिकारियों द्वारा तैयार किया था, आज भी यह अधिनियम गंगा महासभा के पास सरकार की उचित कार्यवाही हेतु पिछले कई सालों से रखा हुआ है।  

नीति निर्माता बिना सर्वांगीण मूल्याकंन किये विकास की रूप रेखा बनाते हैं। विकास की इस रूप रेखा में कई तरह के निहित स्वार्थ सक्रिय रहते हैं। उन स्वार्थों को पूरा करने के क्रम में तथाकथित विकास विनाश में तब्दील हो जाता है। गंगा पर जो विकास की कहानी लिखी गयी, इसके लिए गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों के स्वभाव का अध्ययन नहीं किया गया। न ही उसका भौगोलिक व सामाजिक- सांस्कृतिक अध्ययन किया गया । हम प्रकृति की उपज हैं, और जब प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करते हैं तो इसका असर मनुष्य सहित तमाम जीवों पर पड़ता है। हम मनुष्य को केंद्र में रखकर विकास की कल्पना करते हैं। जीवों ,पेडों आदि का ख्याल रखना नहीं चाहते। मनुष्य के मन में नियंता होने का भाव है। प्रकृति ने अगर मनुष्य को विशेष गुण सौंपा है तो उस पर विशेष जिम्मेवारी भी है, लेकिन वह सिर्फ भोग में मशगूल है और प्रकृति रक्षा की महान जिम्मेदारी से अपने को मुक्त कर लिया है। इस पर विचार करने की आवश्यकता है।

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